Wednesday, August 12, 2026

​परमात्मा न एक है, न दो है, न बहुत है

यह विज्ञान, दर्शन और आध्यात्मिकता की एक अत्यंत गूढ़ और सुंदर उक्ति है, जो परमात्मा के अद्वैत (Non-duality), सर्वात्मकता (Omnipresence) और अनंत स्वरूप को व्यक्त करती है। ​भारतीय दर्शन—विशेष रूप से उपनिषद, अद्वैत वेदांत और जैन/बौद्ध दर्शन—में ईश्वर या परम सत्य को किसी एक सीमा या संख्या में बाँधना असंभव माना गया है। ​इसे इस प्रकार समझा जा सकता है: ​१. परमात्मा न एक है, न दो है, न बहुत है ​तार्किक और सांसारिक दृष्टि से हम हर चीज़ को गिनते हैं। लेकिन परमात्मा असीम और गुणातीत (संसार की गणना और सीमाओं से परे) है। ​न एक है: क्योंकि 'एक' कहने से 'दूसरे' का विचार पैदा होता है। ​न दो है: क्योंकि दो मानने से द्वैत (भेद/भेदभाव) पैदा होता है। ​न बहुत है: क्योंकि बहुत मानने से विभाजन और सीमाएँ बन जाती हैं। ​२. वह 'एक' भी है ​मूलत: परम सत्य एक ही चेतन सत्ता है। वही सबमें व्याप्त है। ​“एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” (ऋग्वेद) — सत्य एक ही है, ज्ञानीजन उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं। ​३. वह 'दो' भी है ​जब वही एक परमात्मा सृष्टि की रचना के लिए अभिव्यक्त होता है, तो वह द्वैत (Dualism) के रूप में प्रकट होता है: ​शिव और शक्ति (पुरुष और प्रकृति) ​आत्मा और परमात्मा ​द्रष्टा और दृश्य ​४. वह 'बहुत' भी है ​संसार के सभी जीव, रूप, रंग, कण-कण और विविधताएँ उसी परमात्मा की अभिव्यक्ति हैं। ​“एकोऽहं बहुस्याम” — मैं एक हूँ, बहुरूप हो जाऊँ। परमात्मा कोई व्यक्ति या वस्तु नहीं है जिसे गिना जा सके; वह स्वयं अनंत है जो शून्यता से लेकर अनगिनत रूपों तक में समाया हुआ है। यह भारतीय दर्शन और तात्त्विक चिंतन और विज्ञान (Metaphysics) का एक अत्यंत मौलिक और गहरा दृष्टिकोण है। ​इस विचार को मुख्य रूप से तीन प्रमुख स्तंभों के माध्यम से समझा जा सकता है: ​1. मूल आधार: चेतना (Consciousness) ​परम सत्य: चेतना ही एकमात्र निरपेक्ष सत्य (Absolute Reality) है। यह वह धरातल या प्रकाश है जिस पर संपूर्ण अस्तित्व अभिव्यक्त होता है। ​आधारभूत तत्व: जिस प्रकार समुद्र के बिना लहरों का अस्तित्व नहीं हो सकता, उसी प्रकार चेतना के बिना पदार्थ और क्रिया का कोई अनुभव या अस्तित्व संभव नहीं है। ​2. दृश्य रूप: पदार्थ (Matter) ​चेतना का स्थूल रूप: पदार्थ (Matter) चेतना से अलग कोई स्वतंत्र तत्व नहीं है, बल्कि चेतना की ही स्थूल अभिव्यक्ति (Gross Form/Manifestation) है। ​संवेद्य जगत: रूप, रंग, आकार, और द्रव्यमान सब चेतना के द्वारा ही अनुभव किए जाते हैं। विज्ञान जहाँ पदार्थ को मूल मानता है, वहीं यह दर्शन मानता है कि पदार्थ चेतना की ही सघनता (Density) का परिणाम है। ​3. गतिशीलता: क्रिया (Action / Motion / Energy) ​स्पंदन (Vibration): चेतना जब स्वयं को अभिव्यक्त करती है, तो उसमें स्पंदन या गति उत्पन्न होती है। इसी गतिशीलता को 'क्रिया' या 'शक्ति' कहा जाता है। ​सृष्टि की प्रक्रिया: क्रिया वह सेतु (Bridge) है जो सूक्ष्म चेतना को स्थूल पदार्थ में रूपांतरित करती है। बिना क्रिया के चेतना सुप्त (Dormant) रहती है और पदार्थ जड़ हो जाता है।

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