इस देह में स्थिति जीव आत्मा (पुरुष) ही परमात्मा है। वह साक्षी होने के कारण उपद्रष्टा, यथार्थ सम्मति देने के कारण अनुमन्ता, सबका पालन पोषण करने वाला, सभी कुछ भोगने वाला, सबका स्वामी और परमात्मा है। प्रकृति के विलक्षण प्रभाव के बाद भी पुरुष (आत्मतत्व) सदा स्थित रहता है। उसी के प्रभाव से प्रकृति का जन्म होता है और उस प्रकृति का विलक्षण प्रभाव यह है कि वह उस पुरुष को भ्रम में डाल देती है। फिर भी उसकी सत्ता देह में सदा स्थित रहती है और वह साक्षी, अनुमन्ता, भोक्ता, महेश्वर रूप से सदा स्थित रहता है।
वसंतेश्वरी भगवद्गीता
क्षेत्र देह का नाम है, जो जाने क्षेत्रज्ञ
हे अर्जुन इस तत्व से, तत्व ज्ञानि है
भिज्ञ।।1।।
यह शरीर क्षेत्र कहा गया है, जो यह जानता है वह शरीर का स्वामी है।
शरीर के स्वामी जीवात्मा को क्षेत्रज्ञ कहते हैं। हे अर्जुन! यह देह एक खेत की तरह है और क्षेत्रज्ञ, खेत के स्वामी किसान की तरह है।
सब क्षेत्रों में
पार्थ हे जान मुझे क्षेत्रज्ञ
ज्ञान क्षेत्र
क्षेत्रज्ञ का, मम मत में है
ज्ञान।।2।।
सब क्षेत्रों में (सब शरीरों में) जो यह क्षेत्रज्ञ जीवात्मा है वह तू मुझ शुद्ध अविनाशी आत्मा स्वरूप परमात्मा को
जान। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान प्रकृति और पुरुष का है उसे मैं तुझे निश्चय
पूर्वक बताता हूँ।
जो, जैसा, जिस क्षेत्र है, और विकार प्रभाव
जो जैसा क्षेत्रज्ञ
यह, जान उसे संक्षेप ।।3।।
यह क्षेत्र खेत के समान है और जैसा, जिस प्रकार का विकारों वाला है तथा जिस कारण से उत्पन्न हुआ है
अर्थात इस शरीर का क्या कारण है इसमें कौन कौन से विकार रहते हैं, इसके साथ साथ यह क्षेत्रज्ञ जो है तथा
जिस प्रभाव वाला है उसे भी जान।
ऋषियों ने गाया बहुत, वेद प्रथम बहु छंद
निश्चित युक्ति सहित
कहा, ब्रह्म सूत्र पद पार्थ।।4।।
इस क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विषय में
बहुत विचार हुआ है। अलग अलग मत इस विषय में हैं। वेदों में भी इस विषय को विभाग पूर्वक
समझाया गया है। ब्रह्म सूत्र के पदों में भी इसे स्पष्ट किया गया है। कर्मवादी इस
क्षेत्र का मालिक क्षेत्रज्ञ जीवात्मा को मानते हैं। सांख्य मत वाले जीव को
क्षेत्रज्ञ नहीं मानते वह इसे एक राहगीर की तरह
समझते हैं। प्रकृति को वह क्षेत्रज्ञ मानते हैं जो अपने गुणों से इस शरीर के सभी
कार्य सम्पादित करती है अन्य परमात्मा के संकल्प को क्षेत्र का कारण मानते हैं अतः
इस विषय में तू मेरा निश्चित मत सुन।
अहंकार अव्यक्त मन, पंच भूत अरु बुद्धि
पंच विषय दस
इन्द्रियां, इच्छा सुख दुःख
द्वेष।।5।।
स्थूल पिण्ड अरु
चेतना, धृति सब हैं ये
क्षेत्र
कहा सहित विकार के
सूक्ष्म में यह क्षेत्र।।6।।
पाँच महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश), अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त त्रिगुणात्मक प्रकृति, इन्द्रियां (कान, नाक, आंख, मुख, त्वचा, हाथ, पांव, गुदा, लिंग, वाक), मन, इन्द्रियों की पाचं तन्मात्राएं (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध), पांच ज्ञानेन्द्रियों के विषय इच्छा- द्वेष, सुख-दुःख, जो अनेक प्रकार के
गुण दोष उत्पन्न कर देते हैं, पांच कर्मेन्द्रियों के विषय ( स्वर और वर्णों का उचारण, वस्तु को पकड़ना, वस्तु को छोड़ना, चलना, मल मूत्र का त्याग ), स्थूल देह का पिण्ड
और चेतना (जो महसूस कराती है, इसको संवेदना भी कह
सकते हैं; आत्मा की इस शरीर में
जो सत्ता है उसके परिणामस्वरूप देह की महसूस करने की शक्ति; जैसे जहाँ अग्नि होती है वहाँ उसकी
गर्मी, उसी प्रकार जहाँ
आत्मा है वहाँ चैतन्य है। जैसे सूर्य और उसकी आभा है इसी प्रकार आत्मा और आत्मा की
सत्ता का प्रभाव यह देह चेतना है। यह सम्पूर्ण शरीर में बाल से लेकर नाखून तक जाग्रत
रहती है)। धृति (पंच भूतों की आपस की मित्रता ही धैर्य है)। जैसे जल और मिट्टी का
बैर है पर वह इस शरीर में मित्रवत सम्बन्ध बनाते हुए रहते हैं इस प्रकार जल और
अग्नि, वायु और अग्नि आदि। जब
यह 36 तत्व एक साथ मिल जाते हैं तो क्षेत्र का जन्म होता है।
श्री भगवान सुस्पष्ट करते हैं - “यथा प्रकाशयत्येकः कृत्सनं लोकमिमं रविः
क्षेत्र क्षेत्री तथा कृत्सनं प्रकाशयति भारतः” जिस प्रकार एक सूर्य इस सम्पूर्ण
ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है उसी प्रकार एक आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित (ज्ञान और क्रिया शक्ति से युक्त) कर देता है। यह 36 तत्व पुरुष (क्षेत्रज्ञ)
के कारण एक स्थान में इकट्ठा हो जाते हैं और क्रियाशील हो जाते हैं।
उत्तमता का मान नहिं, दम्भाचरण अभाव
किसी जीव हिंसा नहीं
और क्षमा का भाव
मन वाणी की सरलता
गुरु सेवा अरु शौच
धी, मन की हो धीरता अरु
इन्द्रिय पर रोक ।।7।।
अपने में बड़प्पन का अभाव, अपने आचरण पर जो घमण्ड नहीं करता, अपने श्रेष्ठ गुणों एवं कार्यों को छिपाकर रखता है, जो अपने किसी आचरण से किसी भी जीव को
कष्ट नहीं देता, छोटे से छोटा जीव के
लिए भी जिसका आचरण अभय है, क्षमा भाव अर्थात
अपने दुःखों और दूसरों के प्रति क्षमा,
सब प्राणियों के प्रति सरलता, जिसमें अपने पराये का भाव नहीं है, गुरु की उपासना; अपने गुरु को
श्री भगवान समझकर अपने हृदय रूपी मन्दिर में स्थापित करता है, गुरु की सेवा; जिसका प्रत्येक कार्य
श्री गुरु महाराज के लिए होता है,
जो
बाहर भीतर से शुद्ध है, जिसके मन ने भटकना बन्द कर दिया है।
इन्द्रिय भोग वैराग्य
हो, और अंह का नाश
जन्म मृत्यु जर रोग दुःख, देखे दोष विचार।।8।।
जिसकी इन्द्रियाँ विषयों की ओर नहीं
भागती, जिसमें सतत् वैराग्य
रहता है, लोक परलोक के सुखों
के प्रति विरक्ति रहती है, जिसमें अहंकार का
अभाव रहता है, जन्म-मृत्यु, वृद्धावस्था, रोग-शोक दोषों का
बार-बार विचार कर आत्म ज्ञान में रत रहता है।
ना ममता ना आसक्ति हो, सुत नारी गृह आदि
प्रिय अप्रिय की
प्राप्ति में, सम हो जिसका चित्त ।।9।।
पुत्र, स्त्री, घर, धन आदि में जिसे आसक्ति नहीं है, केवल कर्तव्य कर्म करता है, जिसमें ममता नहीं अर्थात संसार से जो
उदासीन है, अपने पराये का भेद
मिट गया है, जिसका चित्त प्रिय
अप्रिय की प्राप्ति में सदा एक सा रहता है।
अनन्य योग से युक्त
मन सती नारी सम भक्ति
शुद्ध देश सेवन करे, प्रेम न जन सम्पर्क
।।10।।
मुझ परमेश्वर में अनन्य योग (शरीर, मन, वाणी, बुद्धि) द्वारा सतत् परमात्मा से जु़ड़ा
है, मेरी अव्यभिचारणी
भक्ति करता है अर्थात पतिव्रता पत्नी जैसे पति भक्ति करती है उसी प्रकार जो मुझसे
जुड़ा है, जो अपना कोई कार्य
कोई भाव मुझसे नहीं छिपाता है, एकान्त, पवित्र स्थान में रहना जिसका स्वभाव है, लोगों से मिलने
मिलाने में जिसे रस नहीं आता, जो संसार से उदासीन
है।
अध्यात्म ज्ञान में
रत सदा, तत्व ज्ञान दर्शन परम
यह सब जो है ज्ञान है
और अन्य अज्ञान ।।11।।
जो नित्य अध्यात्म ज्ञान में लगा रहता
है, स्वभाव में स्थित रहता है (परमात्मा का और जीव स्वभाव का विवेचन करने
वाली विद्या ही अध्यात्म विद्या है तथा दोनों को अनुभूत करने वाला ज्ञान अध्यात्म
ज्ञान है)। तत्व ज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा में स्थित और निमग्न रहना ज्ञान है, इसके विपरीत जो है, वह अज्ञान है। ज्ञान का अभाव
अज्ञान है। अज्ञानी देह को आत्मा समझता है, मिथ्या आचरण करता है, अहंकार में डूबा रहता है, परमात्मा के प्रति 1- असम्भावना, 2- विपरीत भावना रखता है।
ज्ञेय है वह जान
जिसको, अमृत को नर प्राप्त
कर
आदिमत परब्रह्म नहिं
सत्, ना असत् है जान ले।।12।।
परमतत्व ही वह उपलब्धि है, जो जानने योग्य है और जिसे जानकर मनुष्य
अमृत अर्थात परमज्ञान, परमशान्ति, परम आनन्द को प्राप्त होता है। वह परम
तत्व न सत् है न असत् है। सत् असत् से परे है, अतः उसे ऋत (निश्चित) कहा गया
है। वह ब्रह्म सत् भी है
तो असत् भी वही है, सभी कुछ उसी का
विस्तार है।
सर्वत्र जिसके नेत्र
सिर मुख, कर पैर सब दिश ओर हैं
सर्वत्र जिसके कर्ण
भी हैं, व्याप्त जग सर्वत्र
है।।13।।
वह सब ओर हाथ पैर वाला, सब ओर नेत्र, सिर, मुख वाला, सब ओर कान वाला है अर्थात सभी जगह, सूक्ष्म से सूक्ष्म और विराट से विराट
में वही आत्मतत्व स्थित है। प्रत्येक प्राणी में वही व्याप्त है। वही विश्वात्मा
है। यही नहीं जड़ प्रकृति भी उससे ओत प्रोत है। इस प्रकार परमात्मा, परा प्रकृति द्वारा सबको व्याप्त करके स्थित
है।
अभ्यास जेहि सब इन्द्री
गुणों का, इन्द्रियों से रहित
है
अनासक्त पर धर्ता भर्ता, निर्गुण भोक्ता सगुण
का।।14।।
सभी इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला
अर्थात जीव रूप में सभी विषयों को भोगने वाला जीवात्मा ही परमात्मा है परन्तु निराकार
है, निर्गुण है, इन्द्रियों से रहित है और आसक्ति रहित है।
वह अव्यक्त होने पर भी सभी का धारण और पोषण करता है और निर्गुण होने पर जीव रूप
में सभी गुणों को भोगता है।
बाहर-भीतर चर अचर, सब भूतन में जान
सूक्ष्म रूप अज्ञेय
है, अति समीप अति दूर।।15।।
वह परमात्मा जीव रूप में सभी प्राणियों
के बाहर और भीतर है, चर अचर में सभी जगह
वह स्थित है। सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म है इसलिए उसे आखों से नहीं देखा जा सकता
है, बुद्धि से भी उसे खोजा
नहीं जा सकता है अतः उसे जाना नहीं जा सकता, इसी कारण उसे निराकार अथवा अव्यक्त
कहना नितान्त उचित है। वह हमारे अत्याधिक समीप भी है तो अत्यन्त दूर भी है।
विभक्त स्थित भूत में, अव्यक्त उसे तू जान
उत्पत्ति भर्ता जगत
का और करे संहार।।16।।
वह परमात्मा जीव रूप में समस्त प्राणी
मात्र में विभक्त हुआ अलग-अलग दिखाई देता है। वह जानने योग्य परमतत्व ही उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का कारण व स्वरूप है।
देह में जब तीनों स्थितियां समाप्त हो जाती हैं तब वह परम स्थिति रहती है। वही
जानने योग्य ज्ञान है। वही परमब्रह्म परमात्मा है।
ज्योतियों की ज्योति है, माया से अति पार
ज्ञान ज्ञेय है ज्ञान
योग्य जो, सब उर अंतर वास।।17।।
वह परमात्मा का अंश परा प्रकृति
(जीवात्मा) ज्योतियों की भी ज्योति है अर्थात
सूर्य, चन्द्र, अग्नि आदि सभी का तेज उसी के तेज से प्रकाशित है। सभी के तेज का आधार
भी वह ब्रह्म अंश है। वह असत् (माया)
से अत्यन्त परे है। वह बोध स्वरूप है, उसे आत्म ज्ञान से ही जाना जा सकता और प्राप्त किया जा सकता है। वह परब्रह्म अंश आत्मा
सबके हृदय में निवास करता है।
कहा सूक्ष्म में
क्षेत्र को और कहा है ज्ञान
जान तत्व इस ज्ञान को, मम स्वरूप को
प्राप्त।।18।।
हे अर्जुन! इस क्षेत्र को तुझे भली भांति बता दिया
है, साथ ही परम ज्ञान को और जानने योग्य (ज्ञेय)
जीव (पराप्रकृति), परब्रह्म परमात्मा जो परम स्थिति है को संक्षेप
में बता दिया है। जो भी आत्मरत मेरे भक्त हैं
वह क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और परम स्थिति को जानकर आत्म स्वरूप हो जाता है।
प्रकृति पुरुष अनादि
हैं, जान दोउ हे पार्थ
सब सम्भव हैं प्रकृति
से, गुण विचार भी जान।।19।।
पुरुष और प्रकृति दोनों अनादि हैं जैसे
शरीर और उसकी छाया। इसी प्रकार परमात्मा
और उसकी छाया प्रकृति है। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ भी इसी प्रकार अभिन्न हैं। क्षेत्र अर्थात
प्रकृति, क्षेत्रज्ञ अर्थात
पुरुष, ब्रह्म अंश जीवात्मा
है और जितनी भी विकृति हैं जैसे राग द्वेष; इन सबका कारण प्रकृति
है। इसी प्रकार सभी गुण (सत्त्व,
रज, तम) भी प्रकृति से ही
उत्पन्न होते हैं।
कार्य करण उत्पत्ति
का, हेतु प्रकृति को जान
जान भोगपन हेतु है, देही सुख दुःख पार्थ
।।20।।
कार्य करण को उत्पन्न करने में प्रकृति
हेतु है। प्रकृति के कारण अहंकार और इच्छा का जन्म होता है। इच्छा के वशीभूत
प्राणी कर्म में लग जाता है। जैसी प्रकृति वैसा अहंकार वैसी इच्छा वैसा ही कर्म।
जैसे सत्त्व ज्ञान की ओर लगाता है,
तम
भ्रम उत्पन्न कर अज्ञान की ओर ले जाता है। पुरुष प्रकृति से उत्पन्न सभी अच्छे-बुरे
कर्म, सुख-दुःख को भोगता
है। पुरुष प्रकृति साथ रहते हैं परन्तु उनका कार्य और व्यवहार अलग-अलग है। पुरुष (जीवात्मा) चुपचाप भोग करता है, प्रकृति कार्य करती है।
देही भोगे त्रिगुण रस, थिर जन्मे अव्यक्त
संग गुणों का हेतु है, जन्म श्रेष्ठ अघ
योनि।।21।।
पुरुष, (जीवात्मा) प्रकृति में स्थित रहकर प्रकृति से
उत्पन्न अच्छे बुरे, सुख-दुख सभी गुणों को
भोगता है। यद्यपि पुरुष अकर्ता, उदासीन अभोक्ता है
फिर भी प्रकृति अपने गुणों से उसको मोहित कर गुणों का संग कराती है। इस कारण
अविनाशी ब्रह्म प्रकृति के आधीन हो जाता है और उसे अच्छी बुरी योनियों में जन्म
लेना (दिखायी) पड़ता है। इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है ब्रह्म में कोई विकार
नहीं होता, प्रकृति स्वयं उसका विकार
बन जाती है। वह उसकी इच्छा बन जाती है। अपने गुणों से वह ब्रह्म तेज को आच्छादित
कर (ढक) देती है। निरहंकार ब्रह्म का अहंकार भी वह बन जाती है। साधारण मनुष्य जिस प्रकार
स्त्री के चालों के आगे बेबस हो जाता है उसी प्रकार शुद्ध ब्रह्म तेज प्रकृति की
चालों से उसके गुण दुर्गणों से बेबस हो जाता है।
देह स्थित पुरुष ही
पर परमात्मा मान
उपदृष्टा अनुमन्ता
भर्ता भोक्ता ईश्वर जान।।22।।
इस देह में स्थिति जीवात्मा (पुरुष) ही परमात्मा है। वह साक्षी होने
के कारण उपदृष्टा, यथार्थ सम्मति देने
के कारण अनुमन्ता, सबका पालन पोषण करने
वाला, सभी कुछ भोगने वाला, सबका स्वामी और परमात्मा है। प्रकृति के
विलक्षण प्रभाव के बाद भी पुरुष (आत्मतत्व) सदा स्थित रहता है। उसी के प्रभाव से
प्रकृति का जन्म होता है और उस प्रकृति का विलक्षण प्रभाव यह है कि वह उस पुरुष को
भ्रम में डाल देती है। फिर भी उसकी सत्ता देह में सदा स्थित रहती है और वह साक्षी, अनुमन्ता, भोक्ता, महेश्वर रूप से सदा
स्थित रहता है।
जो जानत है पुरुष को और
प्रकृति गुण आदि
सभी कर्म करता हुआ, जन्म नहीं जग माहि।।23।।
इस प्रकार पुरुष जो कि परमात्मा का ही
अंश है माया के कारण उसे जीव भाव की प्राप्ति हुई है, इस प्रकार गुणों सहित
प्रकृति को जो मनुष्य तत्व से जानता है, उसे
भ्रान्ति नहीं होती, उसे जीव भाव प्राप्त
नही होता, वह प्रकृति और उसके
आधीन नहीं होता, उसका अन्तःकरण सदा
ज्ञान से प्रकाशित रहता है। वह सभी कर्मों को करता हुआ कर्म और उनके फल में आसक्त
नहीं होता है, इस कारण कर्मबन्धन
क्षय होने से उसका जन्म नहीं होता है और वह माया
(प्रकृति) के बन्धन से मुक्त हो जाता है।
कितने देखें आत्म को, स्वयं आत्म से आत्म
कितने जग में ज्ञान
से, योग कर्म से अन्य।।24।।
कोई योगी आत्मा को आत्मा में, आत्म ध्यान अर्थात आत्मरत होकर देखते
हैं। कई योगी ज्ञान योग द्वारा और कई निष्काम कर्मयोग द्वारा आत्म साक्षात्कार
करते हैं।
जो अज्ञानी अन्य जन, नहिं जानत एहि भांति
अन्य श्रवण उपास्य मम, श्रवण जगत से पार।।25।।
कोई इस प्रकार कर्म योग, ज्ञान योग आदि को न जानते हुए, अहंकार को छोड़कर
श्रद्धा विनय से युक्त साधक किसी कर्म योगी, ज्ञान योगी या अन्य तत्व वेत्ता की
बातों में विश्वास कर उपासना करते हैं और श्रवण करके तथा श्रवण से उत्पन्न श्रद्धा
से परमात्मा के निमित्त (जो भी उपासना उन्हें बतायी है) अपना धन, कोई सेवा, कोई अपना तन आदि लगा देते हैं। इस प्रकार
वह श्रद्धावान पुरुष स्वाभाविक रूप से मुझ आत्म स्वरूप परमात्मा से जुड़ जाते हैं
और माया बन्धन से मुक्त हो जाते हैं।
सकल चराचर प्राणिजग, जन्मत हैं हे पार्थ
क्षेत्रज्ञ क्षेत्र
संयोग से, जन्म सभी का जान।।26।।
इस संसार में जितने भी स्थित और चलने
फिरने वाले प्राणी हैं (जीव हैं) वह प्रकृति और पुरुष के संयोग से उत्पन्न होते
हैं।
नष्ट होत सब भूत में, अविनाशी भगवान
जो देखे समभाव से
सत्य दृष्टि वह जान।।27।।
जो सब भूतों में परमात्मा को स्थित
देखता है। समस्त भूत पुरुष और प्रकृति के संयोग से उत्पन्न होते हैं फिर सब में
परमात्मा अकेला कैसे? प्रकृति के कारण
सृष्टि में भिन्न भिन्न प्रकार के जीव हैं, 84 लाख योनियाँ हैं सब का कार्य व्यवहार
अलग-अलग हैं फिर एकता किस प्रकार?
इस
अद्वैत को जानने के लिए परमात्मा और प्रकृति की एकता जानना आवश्यक है। परमात्मा परम
विशुद्ध ज्ञान है। परमात्मा की ज्ञान शक्ति तत्पश्चात उत्पन्न क्रिया शक्ति ही
प्रकृति है अर्थात परमात्मा की छाया प्रकृति है। यही क्रिया शक्ति विभिन्न ज्ञान शक्ति
से मिलकर विभिन्न गुणों को जन्म देती है। परन्तु इस प्रकृति का मूल भी परमज्ञान
है। उस परम ज्ञान के कारण ही प्रकृति के 36 तत्व उत्पन्न होते हैं और उसकी मौजूदगी
के कारण देह में स्थित रहते हैं। उन तत्वों का आदि कारण भी परमात्मा ही है।
महाप्रलय में सभी अव्यक्त में स्थित हो जाते हैं। इस प्रकार जान कर जो सम भाव से
परमात्मा को सभी प्राणियों में देखता है, वही
वास्तव में देखता है। यदि इतना सूक्ष्म न भी देखा जाय तो परमात्मा की क्रियाशील
ज्ञान शक्ति जीवरूप में सभी भूतों में व्याप्त है। जो ज्ञानी यह जानता है उसे ही
यथार्थ ज्ञान है।
जो सब में समभाव सम
स्थित देखे ईश
नष्ट नहीं करता स्वयं, परम गती को प्राप्त।।28।।
जो समभाव में स्थित होकर परमात्मा को सब
में समान रूप से देखता है उसे न किसी से मोह होता है न किसी से द्वेष होता है।
उससे कोई त्रास नहीं पाता है वह किसी से उद्विग्न नहीं होता है। यह भाव जिस ज्ञानी
का हो जाता है वह अपने आत्म स्वरूप को भ्रम में नहीं डालता, वह जीव भाव को
प्राप्त नहीं होता। उसका परमतत्व सदा जाग्रत रहता है, वह कभी भी नष्ट नही होता और वह परम
स्थान, परम गति का अधिकारी
होता है।
जो देखे सब कर्म को
प्रकृति करे सब कर्म
देख अकर्ता आत्म को, सत्य दृष्टि वह
दृष्ट।।29।।
जो पुरुष यह जानता है कि सभी कर्म प्रकृति
द्वारा किये जाते हैं, आत्मा की ज्ञान शक्ति
ही क्रियाशक्ति उत्पन्न करती है। उससे सभी प्रकृति के तत्व बुद्धि मन इन्द्रियाँ
अनेकानेक कार्य करने लगती हैं। आत्मा सदा अकर्ता अक्रिय है। जो इस बात को जानता है वह यथार्थ जानता
है।
भूतों के सब भाव को, स्थित देखे ईश
अरु देखे विस्तार ईश
से, तत् क्षण ब्रह्म
स्वरूप।।30।।
जिस समय योगी भूतों के भिन्न भिन्न भाव
को एक (परमात्मा) में स्थित देखता है और उस एक (परमात्मा) से सबका विस्तार देखता
है।‘एकोहम् द्वितियो
नास्ति’ और ‘हरि बोध मयी दृष्टि’ रखता है, सम्पूर्ण सृष्टि के सभी प्राणियों को
अपने अन्दर आत्मतत्व में समाहित देखता है, अपनी आत्मा को सभी भूतों मे व्याप्त
देखता है, वह योगी ब्रह्म
स्वरूप हो जाता है। परम ज्ञान को अनुभूत करने पर ही यह स्थिति आती है।
नाश रहित अनादि
निर्गुण परमात्मा हे पार्थ
नहिं करता नहिं
लिपटता, स्थित रहता देह।।31।।
हे अर्जुन! अनादि, निर्गुण और अविनाशी परमात्मा इस शरीर
में स्थित होने पर न कुछ करता है न लिप्त होता है। परमात्मा शुद्ध परम ज्ञान है, उसकी ज्ञान और क्रिया शक्ति के कारण
उसकी प्रकृति द्वारा कार्य होते हैं परन्तु उसका उस क्रिया और फल से कोई सम्बन्ध
नहीं होता जैसे सूर्य का बिम्ब जल में पड़ता है परन्तु पानी से उसका कोई सम्बन्ध
नहीं होता। इसी प्रकार परमात्मा अथवा आत्मा का देहस्थ होने पर शरीर से कोई सम्बन्ध
नहीं होता है।
आकाश व्याप्त सर्वत्र
है, सूक्ष्म जान नहिं
लिप्त
सम्पूर्ण देहस्थ यह
आत्मा, वैसे ही निर्लिप्त ।।32।।
जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त आकाश
सूक्ष्म होने के कारण अपने भीतर स्थित वायु, अग्नि, स्थूल पदार्थ, जल आदि से लिप्त नहीं होता उसी प्रकार
देह (क्षेत्र) में सभी जगह स्थित आत्मा निराकार और अक्रिय होने के कारण देह के
गुणों से न लिप्त होता है न कुछ करता है।
पार्थ सूर्य
ब्रह्माण्ड को, ज्योर्तिमय कर देत
वैसे ही यह आत्मा, क्षेत्र ज्योति भर
देत।।33।।
जिस प्रकार सूर्य इस सम्पूर्ण सौर मण्डल
को प्रकाशित करता है अर्थात सूर्य के कारण संसार है, जीवन है, उसी प्रकार एक आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्र
को जीवन देता है, ज्ञानवान बना देता है
क्रियाशील बना देता है।
क्षेत्रज्ञ क्षेत्र
का भेद अरु भूत प्रकृति से मोक्ष
ज्ञान चक्षु विदु
जानते, परम ब्रह्म को
प्राप्त।।34।।
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ अर्थात देह और
उसके स्वामी सम्बन्धी ज्ञान को, उनके अन्तर को जो
जानता है तथा प्रकृति के बन्धन से जीव की मुक्ति के उपाय को जानता है वह तत्व
ज्ञानी सतत् प्रयास करते हुए आत्म बोध को उपलब्ध हो परम स्थिति को प्राप्त होते हैं।
....................................
Thanks lot of my God
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