परमात्मा नित्य शुद्ध आत्मतत्व है, निराकार है अतः पाप पुण्य से उसका कोई वास्ता नहीं है। अज्ञान से ज्ञान ढका हुआ है; ब्रह्म माया से छिपा हुआ है, आत्मा अनात्म तत्वों से ढकी हुयी है, इस कारण जीव अपने स्वरूप को नहीं पहचान पाता.
वसंतेश्वरी भगवद्गीता - प्रो बसन्त प्रभात जोशी
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पांचवां अध्याय-कर्मसन्यासयोग
कभी प्रशंसा कर्म की, पुनः कर्म सन्यास
भली भांति कल्याण मम, करो एक ही बात।।1।।
अर्जुन बोले- हे कृष्ण! कभी आप कर्म सन्यास को उत्तम बताते हैं
और कभी कर्म योग को उत्तम
कहते हैं। कृपया इन दोनों में मेरे लिए जो भी कल्याण कारक हो उसे बताने की कृपा
करें।
परम कल्याण युक्त है, कर्मयोग सन्यास
साध्य सुगम है कर्म
अति, श्रेष्ठ योग सन्यास।।2।।
श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! कर्म सन्यास और कर्म योग दोनों ही मनुष्य
का परम कल्याण करने वाले हैं। वास्तव में यह दो अलग अलग न होकर एक ही हैं, परन्तु साधन करने में कर्म योग सरल है
और श्रेष्ठ है।
नहिं कोऊ से द्वेषरत, जा नहिं कछु है चाह
द्वन्द्व रहित योगी
सन्यासी, सरल मुक्ति को
प्राप्त।।3।।
कर्म योगी पुरुष जो न किसी से द्वेष
करता है और न किसी वस्तु की इच्छा करता है, जो संसार में रहकर भी संसार से अलग है, निमित्त मात्र ही जिसके सब कर्म हैं, वह कर्म योगी सदा सन्यासी समझने योग्य
है। वह राग द्वेष विकारों से रहित होकर संसार के कर्म बन्धन में नहीं पड़ता और
मुक्त हो जाता है।
कर्म योग, अरु सांख्य में भेद
करत हैं अज्ञ
साधक स्थित एक में, प्राप्त दोऊ का फल।।4।।
अज्ञानी मुनष्य कर्म योग और सन्यास
(सांख्य) योग को अलग अलग समझते हैं,
जिन्होंने
अच्छी प्रकार अनुभव करके आत्मतत्व को समझ लिया है, जो आत्मतत्व में स्थित हो गये हैं, वह दोनो योगों को एक ही समझते हैं।
सांख्य योगी प्राप्त
करते, कर्म योगी भी परम
सांख्य को अरु योग को, सम देखे सो विज्ञ।।5।।
ज्ञान योगियों (सन्यास) द्वारा जो
स्थिति उपलब्ध की जाती है, कर्म योग द्वारा भी
योगी उसी स्थिति को प्राप्त होता है। अतः जो कर्म योग और ज्ञान योग को एक देखता है, वह आत्मतत्व का अधिकारी पुरुष है, वही स्वरूप स्थिति को जानता है।
कर्म योग के बिना, कठिन प्राप्ति सन्यास
मुनि योगी जो कर्म का, शीघ्र प्राप्त परब्रह्म।।6।।
हे अर्जुन! कर्म योग के बिना सन्यास योग
(कर्म-सन्यास) की प्राप्ति कठिन है। कर्म योग का आचरण करने वाला मुनि (जो सदैव
जाग्रत है, साक्षी भाव में स्थित
है) ब्राह्मी स्थिति को शीघ्र व सरलता
पूर्वक प्राप्त कर लेता है।
इन्द्रिय, मन विजयी पुरुष, जिसका चित्त विशुद्ध
सकल भूत की आत्मा, निज आत्मा समरूप
योग युक्त करता हुआ, नहिं बंधता है कर्म
।।7।।
जिसने अपने मन को जीत लिया है जो
जितेन्द्रिय है, ऐसा विशुद्ध आत्मा, सम्पूर्ण प्राणियों की आत्मा परमात्मा
हो जाता है। वह सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त हो जाता है। ऐसा कर्म योगी कर्म करता
हुआ भी कर्म में लिप्त नहीं होता। क्योंकि विश्वात्मा होने
पर उसमें निजी व दूसरे की भावना समाप्त हो जाती है। कर्ता, कर्म, क्रिया का स्वभावतः अभाव हो जाता है।
मैं नहिं कर्ता कर्म
का, जान तत्व का ज्ञान
दृश्य श्रवण स्पर्श
गमन भक्षण स्वपन अरु श्वास।।8।।
त्याग ग्रहण उन्मीषन, निमिष सूंघ अरु बोल
इन्द्रिय वर्ते निज
अर्थ में, रहे हमेशा बोध ।।9।।
तत्व को जानने वाला योगी, मैं पन के अभाव से रहित हो जाता है और
वह देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूघंता हुआ, भोजन करता, हुआ गमन, करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ, आँख खोलता हुआ, मूँदता हुआ किसी भी शारीरिक कर्म में
सामान्य मनुष्य की तरह लिप्त नहीं होता है। वह यह जानता है कि इन्द्रियाँ अपने
अपने कार्यों को कर रही हैं अतः उसमें कर्तापन का भाव नहीं होता है।
करे कर्म को जो आस तज, अर्पित कर सब ब्रह्म
लिप्त न हो बहु पाप में, ज्यों जल में मकरंद।।10।।
जो सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण
करके आसक्ति का त्यागकर कर्म करता है और कभी भी कर्म बन्धन में लिप्त नहीं होता है, जैसे कमल का पत्ता जल
में रहते हुए भी जल से लिप्त नहीं होता है।
त्याग कर आसक्ति निज
मन, देह धी अरु इन्द्रयाँ
योगी केवल कर्म रत, करे चित्त को शुद्ध ।।11।।
कर्म योगी केवल इन्द्रिय मन बुद्धि और शरीर
द्वारा आसक्ति को त्याग कर स्थित होकर कर्म करते हैं। ऐसा कर्म योगी स्वभावतः कर्म
करता है, उसका व्यवहार बच्चे
के समान होता है जो मिट्टी और सोने को समान समझता है। योगी अपने मन को वश करके इन्द्रियों
से व्यवहार करते हैं। अहम् व देह बुद्धि न होने से वे कर्म बन्धन में नहीं बंधते
हैं। वह निरन्तर आत्म स्थित रहते हैं।
कर्म फल को त्याग कर, पाता शान्ति विमुक्त
कर्म फल आसक्त नर, कर्म से बंधता
स्वयं।।12।।
कर्म योगी कर्म फल की आसक्ति का
पूर्णतया त्याग करके निरन्तर शान्ति को प्राप्त होता है। क्योंकि वह पूर्ण ज्ञान
को प्राप्त हो जाता है; उस सम्पूर्ण ज्ञान की
शान्तावस्था में निरन्तर रमण करता है और जो सकाम पुरुष हैं वह विभिन्न इच्छाओं के लिए
फल में आसक्त होकर कर्म बन्धन में फॅसते हैं।
नव द्वारी इस देह में, मन से त्यागे कर्म
वशी, न कर्ता और कराता, थिर स्थित आनन्द।।13।।
जो मनुष्य नवद्वार वाले शरीर में सभी
कर्मो को मन से त्यागकर अर्थात अकर्ता भाव से कर्म करते हुए फल की इच्छा त्याग
देता है और शरीर में रहते हुए भी नहीं रहता है, ऐसा वशी पुरुष जिसने मन से इन्द्रियों
का निग्रह कर लिया है; जिसकी बुद्धि स्थिर
है, जो कर्म फल की इच्छा
से मुक्त है, न करता हुआ, न करवाता हुआ आत्मानन्द में रहता है।
प्रभु नहिं रचें, वरते प्रकृति, कर्तापन का भाव
यही नियम है कर्म का, यही कर्म फल योग।।14।।
परमेश्वर वास्तव में अकर्ता है, वह संसार के जीवों के न कर्तापन की, न कर्मों की, न कर्म फल संयोग की रचना करते हैं; किन्तु स्वभाव ही इस सबका कारण है। माया का आरोपण जब ईश्वर में कर दिया जाता है तो उसे कर्ता समझने लगते हैं। परन्तु
परमात्मा अपने अकर्ता स्वरूप में स्थित रहते हुए कोटि कोटि ब्रह्माण्डों का सृजन
कर देते हैं। यह सब उनकी प्रकृति के कारण होता है। मनुष्य में भी प्रकृति (स्वभाव)
उसके कर्तापन, कर्म और कर्मफल संयोग
का कारण है।
प्रभु नहिं लेते जीव
के, पुण्य पाप मय कर्म
ज्ञान ढका अज्ञान से, मोहित हैं जड़
जन्तु।।15।।
परमात्मा न किसी के पाप कर्म को न किसी
के शुभ कर्म को ग्रहण करता है। पाप और पुण्य जीवत्व भाव अथवा शरीर भाव के कारण
उत्पन्न होते हैं। परमात्मा नित्य शुद्ध आत्मतत्व है, निराकार है अतः पाप
पुण्य से उसका कोई वास्ता नहीं है। अज्ञान से ज्ञान ढका हुआ है; ब्रह्म माया से छिपा हुआ है, आत्मा अनात्म तत्वों से ढकी हुयी है, इस कारण जीव अपने स्वरूप को नहीं पहचान
पाता और वह मोहित हो रहा है।
आत्म ज्ञान से मिट
गया जिसका भी अज्ञान
आत्मा को उज्वल करे, आदित्य सृदश सो
ज्ञान।।16।।
परन्तु जिनका अज्ञान आत्म ज्ञान के कारण
नष्ट हो गया है, उसका वह आत्म ज्ञान
सूर्य के समान उस परम तत्व को प्रकाशित कर देता है। अज्ञान के विलीन होते ही देह भाव, जीव भाव नष्ट हो जाता है। ब्रह्म भाव
स्वयं ही उसमें उदित हो जाता है।
मन धी निष्ठा अरु लगन, जिसकी है तद्रूप
पाप रहित हो ज्ञान से, परमगती को पाय।।17।।
जिसका मन आत्मा में स्थित है, जो निरन्तर ब्रह्म भाव में स्थित है, सदा आत्मरत है; जिनके कर्म दोष ज्ञान द्वारा भस्म हो
गये हैं। जिनकी आसक्ति नष्ट हो गयी है उनके कर्म फल अवशेष नहीं रहते तथा माया के कारण निश्चित आवागमन समाप्त
हो जाता है। वह निज इच्छा से स्वयं प्रकट होते हैं। सांसारिक आवागमन के बन्धन से वह
सदा के लिए मुक्त हो जाते हैं।
ज्ञानी वरते भेद नहिं, द्विज विनयी विद्वान
धेनु स्वान गज जान सम, अरु पापी चांडाल।।18।।
जिसका मन सम भाव है, जीते जीता सर्ग
ब्रह्म सदा निर्दोष
सम, पार्थ ब्रह्म स्थित
स्वयं।।19।
जिनका मन सम भाव में स्थित है जो
ब्राह्मण कुत्ते व चाण्डाल में एक भाव अथवा ब्रह्म भाव रखता है; ऐसे पुरुष द्वारा वास्तव में संसार जीत
लिया गया है अर्थात वह संसार बन्धन से ऊपर हो जाते हैं। ब्रह्म, दोष रहित और सम है और वह भी समभाव के कारण
दोष रहित हो ब्रह्म स्वरूप हो जाते हैं। यही ब्राह्मी स्थिति है।
प्रिय को पा हर्षित
नहीं, अप्रिय न देते शोक
स्थित मति संशय रहित, ब्रह्म स्थित ब्रह्मवित्।।20।।
जो प्रिय को पाकर हर्षित नहीं होता, तथा अप्रिय को पाकर उद्विग्न नहीं होता
है, सदा उदासीन और परम शान्ति
में स्थित है, स्थिर बुद्धि जिसके संशय
समाप्त हो गये हैं; ब्रह्म वेत्ता पुरुष सदा
ब्रह्म में स्थित रहता है अर्थात स्वयं ब्रह्म स्वरूप होता है।
बाह्य विषय आसक्ति
तजि, ले आत्मनि आनन्द
अक्षय सुख अनुभव करे, योग युक्त परब्रह्म।।21।।
जिसका अन्तःकरण बाहरी विषयों में नहीं
डोलता है ऐसा आसक्ति रहित पुरुष आत्मानन्द को प्राप्त होता है। वह ब्रह्म स्थित
पुरुष सदा अक्षय आनन्द का अनुभव करता है।
भासे सुख इन्द्रिय
विषय, उपजे विषयेन्द्रिय
संयोग
प्रज्ञ नहीं उनमें
रमें, जान अनित्य दुःख
देत।।22।।
परन्तु जो विषयी पुरुष हैं उन्हें
इन्द्रिय तथा विषयों के संयोग से होने वाले समस्त भोग सुख रूप लगते हैं परन्तु
उनका परिणाम मात्र दुःख है। यह सभी सांसारिक भोग थोडे़ समय के होते है। इनका
प्रारम्भ और अन्त है अतः ज्ञानी पुरुष इन विषयों को मन से ग्रहण नहीं करता है।
जीवित जारे देह में, काम, क्रोध, को ज्वार
वह योगी, वह है सुखी, यही सत्य है पार्थ।।23।।
जो पुरुष शरीर के नाश होने से पहले काम
क्रोध से उत्पन्न वेग को सहने में समर्थ हो जाता है वह पुरुष आत्म स्थित योगी है, वही सुखी है। आत्म
स्थित पुरुष का अहंकार समाप्त हो जाता है, अहंकार समाप्त होते ही स्वरूप स्थिति
प्राप्त होती है। जहाँ केवल ज्ञान है, आनन्द
है। अतः उनमें काम क्रोध का अंश मात्र भी नहीं होता है।
अन्तः राम अन्तः सुखी, अन्तः ज्योति जो
पार्थ
नित्य ब्रह्म स्थित
स्वयं, सांख्य शान्त को
प्राप्त।।24।।
जो पुरुष अपनी आत्मा से सुखी हैं सदा
अपनी आत्मा में रमण करते हैं, आत्म ज्ञान से जो
स्वयं प्रकाशित है वह ब्रह्म स्थित योगी सर्वोतम, नाश न होने वाले असीम ब्रह्म सुख को
प्राप्त होते हैं। यही ब्रह्म निर्वाण है।
पाप नष्ट संशय निवृत्त, सर्व भूत रत माहि
जेहि जीता मन आपना, शान्त ब्रह्म को
पात।।25।।
जिनके समस्त कर्म फल दोष समाप्त हो गये
हैं, जिनके सब संशय समाप्त
हो गये हैं अर्थात जिन्हें कोई भ्रान्ति नहीं है, जो सभी प्राणियों का हित करने वाले हैं, सभी को अभय देना जिनका स्वभाव है, जो साधना से आत्मा में स्थित हैं, ऐसे ब्रह्मवेता पुरुष ब्रह्म निर्वाण को
प्राप्त होते हैं ।
काम क्रोध से मुक्त
है जिसका आत्मा ज्ञान
मन विजयी ज्ञानी लिए, शान्त ब्रह्म
परिपूर्ण।।26।।
जो काम क्रोध से मुक्त हैं, जिन्होंने अपना चित्त वश में कर लिया है, जो नित्य आत्म स्थित होकर आत्मा को
जानते हैं ऐसे ज्ञानी पुरुषों के लिए ब्रह्म निर्वाण ही परम श्रेय है और इसी ब्राह्मी
स्थिति में वह सतत् बने रहते हैं।
बाह्य विषय तज बाह्य
ही, नेत्र भृकुटि के मध्य
सम कर प्राण अपान को
विचरे नासा पार्थ ।।27।।
जीता मन अरु इन्द्रयां, तजे क्रोध भय काम
मोक्ष परायण ज्ञानी
मुनि, सदा मुक्त निष्काम।।28।।
वैराग्य द्वारा बाहर के विषयों को बाहर
निकालकर, मन को संयमित करते
हुए, नेत्रों को भृकुटी के
मध्य में स्थित कर तथा नासिका में विचरने वाले प्राण अपान वायु को प्राणायाम
द्वारा सम करके ब्रह्मरंघ्र की ओर ले जाने वाले योगी, जिसने इन्द्रिय, मन, बुद्धि को यत्न करके
अपने वश में कर लिया है; जो केवल मोक्ष की
कामना करता है ऐसा मननशील योगी इच्छा भय और क्रोध से रहित होकर सदा सदा के लिए
मुक्त हो जाता है। उसका माया बन्धन कट जाता है और वह स्वरूप स्थिति को प्राप्त कर लेता
है।
सकल यज्ञ तप भोक्ता, सब लोकन का ईश
सकल भूत का परम प्रिय
परम शान्ति का ईश।।29।।
हे अर्जुन! मैं समस्त यज्ञ और तपों को भोगने वाला
सम्पूर्ण लोकों का महेश्वर तथा सभी प्राणियों को सदा अभय देने वाला, कृपा करने वाला
स्वार्थ रहित मित्र हूँ। जो आत्म स्थित मुझे इस प्रकार तत्व से जानता है वह आत्म
स्वरूप होकर स्वयं ज्ञान को प्राप्त कर परमशान्ति को प्राप्त हो जाता है।
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