Wednesday, August 24, 2011

ग्यारहवाँ अध्याय-विश्वरूपदर्शनयोग

जो मुझे विश्वात्मा भाव से देखता है, मैं आत्मा उसी के लिए सुलभ हूँ क्योंकि उसके सभी कर्म मेरे लिए होते हैं। सदा मुझमें आत्मरत हुआ वह संसार की ओर से नित्य उदासीन रहता है। उसका संसार में न कोई मित्र है न शत्रु है। सम्पूर्ण प्राणी उसे मेरा ही स्वरूप दिखायी देते हैं, उसका वैर भाव समाप्त हो जाता है। इस प्रकार वह सदा-सदा के लिए आत्म ज्ञान को प्राप्त हो जाता है जहाँ अज्ञान का अंश भी नहीं है और अक्षय शान्ति, आनन्द एवं ज्ञान का श्रोत ब्रह्म स्वरूप हो जाता है।


                           वसंतेश्वरी भगवद्गीता - प्रो बसन्त प्रभात जोशी
                                 
                                        ग्यारहवाँ अध्याय-विश्वरूपदर्शनयोग
                             
परम गूढ़ अध्यात्म वचन, कहा कृपा करि आप
नष्ट हुआ अज्ञान मम, जान तत्व हे नाथ।।1।।

अर्जुन बोले- हे भगवन्! मुझ पर अनुग्रह करने के लिए आपके द्वारा अत्यन्त गोपनीय आत्म स्वभाव विषयक वचन कहा है उससे मेरा मति भ्रम, मेरी मूढ़ता नष्ट हो गयी है।

कमल नयन तुमसे सुना अविनाशी का ज्ञान
सकल भूत का जन्म लय, मम जाना विस्तार।।2।।

हे भगवन्! आपने मुझे भूतों की उत्पत्ति प्रलय और स्थिति को विस्तार पूर्वक बताया और अविनाशी आत्मतत्व का ज्ञान दिया।

जैसा कहते स्वयं को, हे परमेश्वर आप
मैं देखन चाहूँ पुरुष, एश्वर्य रूप विस्तार।।3।।

हे परम परमेश्वर! आप जैसा अपने को योग ऐश्वर्य से युक्त कहते हैं आप निःसन्देह वैसे ही हैं। आप निज इच्छा से प्रकट हुए हैं, आप स्वयं परब्रह्म परमात्मा हैं। हे प्रभु! हे पुरुषोत्तम! आपके ऐश्वर्य स्वरूप को जो सम्पूर्ण ज्ञान, शक्ति, बल, तेज आदि से युक्त है, मैं देखना चाहता हूँ।

जानते हैं शक्य मेरा, दिव्य दर्शन आपका
योगेश्वर दर्शाइये, निज अविनाशी रूप।।4।।

हे प्रभु! यदि आप समझते हैं कि आपका विभूति ऐश्वर्य युक्त स्वरूप मेरे द्वारा देखा जाना शक्य है तो कृपा कर अपने उस आत्मस्वरूप का दर्शन मुझे कराइये।

शतत् हजारों रूप मम, देख पार्थ इह काल
बहु प्रकार बहु वर्ण के, दिव्य अलौकिक रूप।।5।।

श्री भगवान बोले- हे पार्थ! तू मेरे सैकड़ो, हजारों नाना प्रकार के नाना वर्ण नाना आकृति वाले दिव्य स्वरूपों को देख। तू भली भांति मेरे आत्मा के विस्तार को जिसने सम्पूर्ण चर-अचर को व्याप्त किया हुआ है, जो सर्वत्र दिव्य रूप में स्थित है, को देख।

देख सभी, आदित्य को, वसू रुद्र को देख
अश्विन मरुत आश्चर्य पुनि, अनदेखे मम रूप।।6।।

हे अर्जुन! सभी आदित्यों में मुझे (मेरे आत्म स्वरूप को) देख, आठ वसुओं में मुझको देख, एकादश रूद्रों में, दोनों अश्वनी कुमारों में, उन्चास मरुतगणों में तथा बहुत से पहले न देखे हुए आश्चर्य मय रूपों में, मुझ आत्मतत्व को देख।

देख जगत सम्पूर्ण में, जो चाहे सो देख
पार्थ एकस्थ मम देह में, सभी चराचर देख ।।7 ।।

हे अर्जुन! सम्पूर्ण चराचर सहित जगत को मेरे शरीर में स्थित आत्मा में देख और तू जो कुछ भी चर अचर से सम्बन्धित किसी भी तत्व, किसी भी स्वरूप, किसी भी विभूति को देखना चाहता है, वह मेरे आत्म रूप में स्थित होकर देख।

देख सके मुझको नहीं निज नेत्रों से पार्थ
दिव्य चक्षु देता तुझे देख योग एश्वर्य।। 8।।

हे अर्जुन! तू अपने इन प्रकृति जन्य नेत्रों से मुझे नहीं देख सकता अतः मैं तुझे दिव्य चक्षु प्रदान करता हूँ अर्थात मैं तेरे अन्दर व्याप्त आत्मतत्व को जाग्रत करता हूँ जिसके द्वारा ही तू मेरे आत्म स्वरूप की ईश्वरीय योग शक्ति को देख पायेगा।

तब श्री योगेश्वर हरि ने, यह कहकर हे राजन
दिखलाया प्रिय पार्थ को, दिव्य अलौकिक रूप।।9।।

संजय बोले- हे राजन्! समस्त पापों का नाश करने वाले महायोगेश्वर श्री कृष्ण चन्द्र जी ने यह कहकर अर्जुन को परम ऐश्वर्य युक्त आत्म स्वरूप के दर्शन कराये।

अनेक मुख नेत्र से, अनेक रूप को लिए
धार दिव्य भूषणादि, दिव्य शस्त्र हाथ में।।10 ।।
धार दिव्य माल वस्त्र, दिव्य गन्ध लेप किये
आश्चर्य सकल युक्त जो, अनन्त हे विराट देव।।11।।

संजय बोले- हे राजन्! प्रभु का आत्म रूप अत्यन्त विलक्षण है। उनके आत्म स्वरूप के इस चराचर जगत में सभी ओर नेत्र हैं, सभी ओर मुख हैं। उनका यह स्वरूप अत्यन्त अद्भुत है। उनके भिन्न-भिन्न स्वरूपों ने भिन्न-भिन्न प्रकार के दिव्य आभूषण धारण किये हुए हैं, अनेक दिव्य शस्त्र अस्त्रों को हाथ में उठाये हुए हैं, अनेक प्रकार की दिव्य गन्ध भिन्न भिन्न शरीरों में लेप किये हुए हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण चराचर जगत में अत्यन्त अद्भुत एंव आश्चर्य युक्त जिसकी कोई सीमा नहीं है सब ओर भिन्न भिन्न शरीरों को आत्म स्वरूप श्री भगवान में, अर्जुन ने देखा।

उदित सहस्त्रों सूर्य दिवि, उनसे प्रगटे तेज
तेज सदृष वह परम सम नहीं कदाचित होय।।12।।

आत्म स्वरूप श्री भगवान का स्वरूप अत्यन्त अद्भुत है। वह अनन्त प्रकाशमय है, वह इतना प्रकाशमय है कि यदि हजारों सूर्य एक साथ उत्पन्न हो जायें तो वह उस परम परमात्मा के प्रकाश के समान शायद ही हो। यहाँ  संजय यह बताना चाह रहे हैं कि परम परमात्मा का स्वरूप चराचर संसार के करोड़ों सूर्यों के ज्ञान से कहीं अधिक है क्योंकि परमात्मा परम ज्ञान स्वरूप हैं। सृष्टि का कोई भी ज्ञान परम ज्ञान के मुकाबले शायद ही हो।

खंड खंड बहु विधि जगत, पार्थ दृष्ट तेहि काल
एक जगह स्थित जगत, देव देव की देह।।13।।

हे राजन्! पाण्डु पुत्र अर्जुन ने भिन्न भिन्न जगत और उसके भिन्न भिन्न प्राणियों को भगवान श्री कृष्ण चन्द्र के परमात्म रूप में एक जगह स्थित देखा।

तब विस्मय से चकित वह, पुलक गात कर बद्ध
सिर प्रणाम कर देव को, यह स्वर बोला पार्थ ।।14।।

परमात्म स्वरूप के अन्दर भिन्न भिन्न चर अचर समूहों को जो भिन्न भिन्न आकृति वर्ण वेश के थे, अत्यन्त आश्चर्य से अर्जुन द्वारा देखा गया और वह श्री भगवान के दिव्य विश्वात्मा शरीर को परम श्रद्धा से अपने सम्पूर्ण ज्ञान के साथ प्रणाम करके, हाथ जोड़कर कहने लगा।

मैं देखूँ तव देह में सभी ऋषी अरु भूत
सकल देव, ब्रह्मा, शिवा दिव्य सर्प सब साथ।।15।।

अर्जुन बोले- हे भगवन! आपके इस परमात्म स्वरूप में मैं सभी  देवताओं को, समस्त चर अचर संसार को, कमल के आसन पर विराजमान ब्रह्मा को अर्थात अनाहत चक्र में स्थित जीवात्मा स्वरूप को, महादेव परम शिव को अर्थात आज्ञा चक्र में स्थित महाबुद्धि स्वरूप आत्मा को और सम्पूर्ण ऋषियों को तथा दिव्य सर्पों को देखता हूँ अर्थात प्रत्येक प्राणी में चाहे वह महान ऋषि अथवा निम्न योनी के सर्प हों सब में दिव्य आत्मा के दर्शन करता हूँ।

नाना मुख भुज उदर दृग, रूप अनन्त तव दृष्ट
आदि मध्य अरु अन्त नहिं, हे विश्वेश्वर विश्व रूप।।16।।

हे सम्पूर्ण विश्व के परम स्वामी! आपके परमात्म रूप के अन्दर मैं अनके जीवों को, जो अनेक भुजा वाले, अनेक पेट वाले, अनेक मुख और नेत्रों से युक्त हैं, भिन्न भिन्न रूपों के भिन्न भिन्न प्राणियों को देखता हूँ। हे विश्वात्मन, आपके स्वरूप का न अन्त है, न मध्य है, न आदि है। सर्वत्र, आपका यह परमात्म रूप ही व्याप्त है।

दृष्ट चक्र गदा मुकुट
तेज पुंज दीप्तमान
ज्वलित अग्नि सूर्य ज्योति
दृष्टि कठिन अप्रमेय रूप।।17।।

श्री भगवान के विराट दर्शन करते समय अर्जुन सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात समाधि की बीच की स्थिति में थे और वह परमात्म स्वरूप और श्री भगवान के मानवीय स्वरूप दोनों की अनुभूति कर रहे थे और उनके मानवीय स्वरूप के दर्शन भी उस परमात्म स्वरूप के अन्दर करते हुए कहते हैं, हे भगवन, मैं आपको मुकुट युक्त, गदा धारण किये हुए, चक्र लिए सब ओर से परम आभामय, तेज पुंज, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के समान ज्योति‍‌ युक्त देखता हूँ। परम आभामय होने के कारण आपको देखना भी कठिन हो रहा है। अतः आपके अद्वितीय नर हरि स्वरूप को मैं बड़ी कठिनता से देखता हूँ।

ज्ञान ज्ञेय परम अक्षर, परम धाम हे प्रभो
रक्ष शाश्वत धर्म के, नाश रहित अनादि हो।।18।।

हे परम परमात्मा! आप अक्षर हैं आप नाश रहित परम सत् हैं। आप ही इस जगत के परम आश्रय हैं कल्पान्त में सम्पूर्ण सृष्टि प्रकृति के साथ आपमें ही विलीन होती है और पुनः आप से ही जन्म लेती है। आप ही अनादि धर्म के रक्षक हैं अर्थात आत्म स्वभाव को स्थापित करने के लिए आप अपनी इच्छा से देह धारण करते हैं, स्वभाव का आदि कारण भी आप ही हैं; आप अविनाशी सनातन पुरुष हैं अर्थात आपका न कोई आदि है, न मध्य है, न अन्त है।

आदि अन्त अरु मध्य नहिं अनन्त वीर्य भगवान
बहुत बाहु शशि सूर्य नयन दीप्त अग्नि मुख रूप
तप्त करत निज तेज से, सकल जगत को ईश।।19।।

हे विश्वात्मन! आप आदि, अन्त और मध्य से रहित हैं। महामाया भी आप में स्थान पाती है। आप अनन्त सामर्थ से युक्त हैं अर्थात परम शुद्ध ज्ञान स्वरूप होने के कारण जड़ को चेतन और चेतन को जड़ करने में आप ही समर्थ हैं। आप विश्वात्मा होकर अनेक भुजा वाले हैं, सूर्य चन्द्र आपके नेत्र हैं अर्थात ज्ञान ही आपका नेत्र है प्रज्वलित अग्नि मुख से आप इस जगत को तप्त कर रहे हैं।

स्वर्ग धरा आकाश दिश, सकल पूर्ण एक आप
देख रूप उग्र दिव्य, तीन लोक भय व्याप्त।।20 ।।

हे महात्मन्! पृथ्वी और अंतरिक्ष के बीच में चारों ओर और सम्पूर्ण दिशाएं आपके महाकाल स्वरूप आत्म रूप ने ही परिपूर्ण कर रक्खी हैं, आपके इस अलौकिक और उग्र स्वरूप को तीनों लोक सहन नहीं कर पा रहे हैं अर्थात आपके परमात्म स्वरूप को धारण करने की तीनों लोकों में किसी में शक्ति नहीं है।

करें प्रवेश सुर संघ तुम, कुछ जोड़े भय हाथ
स्तुति करें स्त्रोत बहु महर्षि सिद्ध समुदाय
उच्चारण तब नाम का, कहें होय कल्याण।।21।।

सम्पूर्ण देवता गण आपके परमात्म स्वरूप में ही स्थित हैं, कई आपके महाकाल स्वरूप को देखकर भयभीत होकर हाथ जोड़कर आपका गुणगान कर रहे हैं। परम ज्ञान को प्राप्त महर्षि और सिद्धों का समूह आपके स्वरूप को देखकर परम आनन्दित हैं और वह स्वस्ति वचन और उत्तम-उत्तम स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति कर रहे हैं।

आदि रुद्र वसु मरुतगण साध्य सकल समुदाय
विश्व देव अरु अश्विनो, सिद्धों का समुदाय
यक्ष रक्ष गन्धर्व सब देख रहे आश्चर्य ।।22।।

हे परम आत्मन्!!, ग्यारह रूद्र, बारह आदित्य, आठ वसु, साध्य, विश्वदेव, अश्विनी कुमार, उन्चास मरुतगण, पितृ ब्राह्मण, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सिद्ध आदि सभी दिव्य पुरुष आपके महाकाल स्वरूप को विस्मित होकर देख रहे हैं।

बहुत नेत्र बहु जङ्घ मुख, बहुत बाहु बहु पेट
दंत काल विकराल हैं बड़ा भयंकर रूप
देख लोक भय व्याप्त हैं, मैं भी भय से व्याप्त।।23।।

हे विश्वात्मन् मैं देख रहा हूँ कि सृष्टि में सर्वत्र व्याप्त आप ही बहुत मुख वाले, नेत्रों वाले, बहुत जंघा और पैरों वाले, बहुत पेट वाले, बहुत सी विकराल दाढ़ों वाले होकर अनेक रूपों में व्याप्त हैं। आपको देखकर सभी लोक व्याकुल हो रहे हैं और मैं भी व्याकुल हूँ क्योंकि श्री भगवान का काल रूप अत्यन्त भयानक था।

फैलाये मुख को लिए, छूते तुम आकाश
दीप्त तुम्हारा रूप यह, बहुत वर्ण से व्याप्त
दीप्त विशाल नयन हरि, देख तुम्हारा रूप
व्यथित आत्म धीरज नहीं, नहीं शान्ति को प्राप्त।।24।।

हे विष्णो! विश्व के अणु अणु में व्याप्त हे ईश्वर! आपका स्वरूप आकाश को स्पर्श कर रहा है, परम आभामय है। आपका विश्वात्मा स्वरूप अनेक वर्णों से युक्त है, आपके फैलाये हुए मुख और दीप्त विशाल नेत्रों को देखकर मेरा चित्त स्थिर नहीं है और मैं न धैर्य रख पा रहा हूँ और मेरे मन में हलचल मची हुई है क्योंकि युद्ध भूमि में श्री भगवान काल रूप में प्रकट हुए थे।

दाढ़ विकराल हैं प्रलय काल अग्नि सम
जान नहिं दिशा आदि, आनन को देख के
सुख नहिं पाता ईश, हो प्रसीद नाथ तुम
हे जगत के स्वामी, हे जगत के ईश ।।25।।

हे आत्मन्! हे महाकाल! प्रलय काल की अग्नि के समान प्रज्वलित मुखों को देखकर मेरा दिशा ज्ञान भी लुप्त हो गया है और आपका महाकाल स्वरुप इतना भंयकर है कि मेरा आनन्द भी गायब हो गया है इसलिए हे परमदेव आप कृपा कर प्रसन्न हों।

सभी पुत्र धृतराष्ट्र के और सभी नरपाल
भीष्म द्रोण अरु कर्ण भी और रथी मम पक्ष।।26।।
बड़े वेग से दौड़कर, विकराल दाढ़ मुख पैठ
अन्य चूर्ण सिर से हुए, दंत मध्य अस दृश्य।।27।।

हे महाकाल! मैं देख रहा हूँ हमारे ज्येष्ठ पिता महाराजा धृतराष्ट्र के पुत्र, राजाओं का समुदाय आप में प्रवेश कर रहा है, भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कर्ण और हमारे पक्ष के भी प्रधान योद्धा और अनेक सैनिक आपके विकराल दाढ़ों वाले भयानक मुख में बड़े वेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं और कई एक, अपने सिरों सहित आपके विकराल दाढ़ों से चबाकर चूर्ण किये दातों के बीच में लगे हुए दिखाई दे रहे हैं।

जैसे नदियां बहुत जल, धावति जलनिधि पास
तैसे धावत ज्वलित मुख, वीर ऐहि संसार।।28।।

बहुत से योद्धा आपके मुख की ओर वैसे ही जा रहे हैं जैसे नदियाँ समुद्र में प्रवेश करती हैं। इस पृथ्वी के अनेक वीर आपके विकराल मुख में, जो अग्नि के समान प्रज्वलित है, प्रवेश कर रहे हैं।

धावत वेग प्रवेश कर ज्वलित अग्नि में नाश
तैसे लोग पतंग सम, करें वेग तव दाढ़।।29।।

जैसे पतंगे नष्ट होने के लिए प्रज्वलित अग्नि में अत्यन्त वेग से उड़ते हुए प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार यह कौरव और अनेक योद्धा भी अपने नाश के लिए आपके मुख में अति वेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं ।

ज्वलित वदन से ग्रास कर चाट रहे सब ओर
विष्णु पूर्ण कर जगत को तप्त तेज तव रूप।।30 ।।

हे महाकाल! आप सम्पूर्ण लोकों को अपने तेजोमय मुखों द्वारा ग्रास करते हुए सब ओर से बार-बार चाट रहे हैं। हे परमात्मा, हे विष्णु, महाकाल के रूप में आपका यह उग्र प्रभामय स्वरूप सम्पूर्ण जगत को तेज के द्वारा परिपूर्ण करके तपा रहा है।

उग्र रूप तुम कौन हो, बतलायें प्रभु आप
देव श्रेष्ठ तुमको नमन, हो प्रसीद प्रसीद
आदि पुरुष को आप हैं, तत्व ज्ञान मैं आस
नहिं जानत तव प्रवृत्ति को, कहा पार्थ यदुनाथ।।31।।

हे विश्वात्मा! हे भगवन! कृपा कर बतलाइये परम उग्र रूप वाले आप कौन हैं? हे देवताओं में श्रेष्ठ! आपको नमस्कार है, आप प्रसन्न हों। हे आदि पुरुष! मैं आपको जानना चाहता हूँ क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति को नहीं जानता।

लोक नाश को प्रकट हूँ फैला काल कराल
रणी सकल प्रतिपक्ष में नष्ट तोर बिन पार्थ।।32।

अर्जुन के पूछने पर श्री भगवान बोले मैं लोकों का नाश करने वाला बड़ा हुआ काल अर्थात महाकाल हूँ इस समय इन योद्धाओं को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ इसलिए प्रतिपक्ष में जो योद्धा लोग इस युद्ध भूमि में हैं वह सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे, तू यह जान ले कि उनकी मृत्यु निश्चित है।

उठ जीत शत्रु यश प्राप्त कर, भोग राज्य समृद्धि
पहले ही मैंने हते, निमित्त मात्र भव पार्थ।।33।।

अतः हे अर्जुन! तू युद्ध के लिए उठ खड़ा हो और मेरे द्वारा मारे हुए इन प्रतिपक्षी योद्धाओं को मारने के लिए निमित्त मात्र बन जा। इन मेरे द्वारा मारे हुओं को मारकर तू यश प्राप्त कर और शत्रुओं को जीतकर धनधान्य से सम्पन्न राज्य को भोग।

द्रोण, भीष्म, कर्ण जयद्रथ और अन्य बहु वीर
भय मत कर जय युद्ध में, हते हुए को मार।।34।।

द्रोणाचार्य, पितामह भीष्म, जयद्रथ, कर्ण और भी बहुत से मेरी महाकाल प्रकृति द्वारा मारे हुए शूरवीर योद्धाओं को तू मार। हे अर्जुन! अब किस बात का भय। तूने वास्तविकता देख ली है, युद्ध का परिणाम देख लिया है अतः तू युद्ध कर क्योंकि तू वैरियों को जीतेगा।

केशव के इस वचन को, हाथ जोड़ सुन पार्थ
कंपित नमस, सभीत अति, कर प्रणाम श्री कृष्ण
गद्गद वाणी से कहा, सुनो जगत के नाथ।।35।।

संजय बोले- हे राजन्! भगवान श्री कृष्ण चन्द्र जो महाकाल रूप में युद्ध भूमि में उपस्थित थे, के इस वचन को सुनकर अर्जुन हाथ जोड़कर भय से कांपता हुआ बार बार प्रणाम करके श्री भगवान के प्रति गदगद वाणी से बोला।

जग हरषे तव नाम गुण और प्राप्त हो प्रीत
रक्ष भाग सब ओर को, हृषीकेश यह योग्य
सिद्ध संघ सब मिल कहें  नमः नमः श्री कृष्ण।।36।।

हे अन्तर्यामीहे आत्म स्वरूप परमात्मा! आपके नाम-गुण और प्रभाव के वर्णन से यह जगत अत्यन्त हर्षित हो रहा है और आपके प्रति प्रेम भी बढ़ रहा है। आपके महाकाल स्वरूप को देखकर राक्षस भयभीत होकर भिन्न भिन्न दिशाओं में भाग रहे हैं और निश्चयात्मक बुद्धि वाले सिद्ध गण आपको नमस्कार कर रहे हैं।

ब्रह्मा के तुम हो पिता और बड़े सब देव
सत् असत् पर अक्षर तुम्ही, क्यों न नवायें शीश
हे देवश हे जगन्निवास, हे महात्मन नमः नमः।।37।।

हे आत्मदेव! आप पितामह ब्रह्मा के भी आदि कर्ता (पिता) हैं। आप जीवात्मा के पिता परमात्मा हैं अतः सबसे परम होने के कारण आपको कैसे न प्रणाम किया जाय। हे विश्वरूप में व्याप्त, हे अनन्त! हे देवताओं के स्वामी! हे जगत के स्वामी! आप सत् असत् से परे, नाश न होने वाले निश्चित परब्रह्म परमात्मा हैं।

आदि देव तू परम पुरुष तू परमाश्रय भी तू
ज्ञाता भी तू ज्ञेय भी तू है तू अनन्त स्वरूप
जगत पूर्ण परिपूर्ण तुम्ही से, परम धाम भी तू।।38।।

हे भगवन! आप समस्त देवताओं के आदि हैं, आप ही अनादि पुरुष हैं। आप ही इस जगत के परम आश्रय हैं अर्थात व्यक्त और अव्यक्त प्रकृति आप ही में स्थान पाती है। आप जानने वाले और जानने योग्य हैं क्योंकि आप पूर्ण विशुद्ध ज्ञान हैं अतः आपसे कहीं भी कुछ भी नहीं छिपा है और जानने योग्य भी आप ही हैं क्योंकि आप ही परम सत् हैं, आपके अलावा सब नाशवान होने के कारण, उनके जानने का कुछ भी प्रयोजन नहीं है। आप परम धाम हैं, आप ही परम स्थिति हैं और हे अनन्त रूप, हे विश्वात्मन, आपसे यह जगत परिपूर्ण है।

धर्मराज तू वरूण देव तू अग्नि चन्द्र भी तू
प्रजापती तू ब्रहम पिता तू नमन हजारों बार
नमः नमः हे, नमः नमः हे नमः नमः भगवान।।39।।

हे विश्वात्मन! आप ही वायु हैं, आप ही यमराज हैं, अग्नि, वरूण, चन्द्रमा, प्रजापति, ब्रह्मा और ब्रह्मा जी के पिता भी आप ही हैं। आपको हजारों हजारों बार नमस्कार है। आपको फिर बार बार नमस्कार है।

नमः अग्र से नमः पृष्ठ से नमः सर्व चहुँ ओर
सर्वआत्म तू अनन्त वीर्य तू व्याप्त सकल भगवान
सर्वरूप हे नमः नमः हे नमः नमः भगवान ।।40।।

हे अनन्त शक्ति सम्पन्न आत्मदेव! आपको आगे से भी नमस्कार है, आपको पीछे से भी नमस्कार है, हे विश्वात्मन आपको सब ओर से नमस्कार है। हे अनन्त पराक्रमशाली श्री भगवान! आप सम्पूर्ण संसार के कण कण को व्याप्त किये हुए हैं, इसलिए प्रत्येक स्वरुप आप ही का है।

सखा कहा यादव कहा, कहा कृष्ण अज्ञान
तव प्रभाव जाना नहीं हुआ मोह अपराध
नहिं सोचे समझे कहा और कहा हठधर्म
और प्रेम से कह सखा अच्युत तुमको मित्र।।41।।
सखा जान सम्मुख कहा और कहा एकांत
भोजन शयन विनोद में कृष्ण कहा भगवान
और कहा यादव तुम्हें आसन और विहार
अपमानित अज्ञान से क्षमा करो अपराध।।42।।

हे आत्मदेव! हे भगवांन! मैं आपके परम योग ऐश्वर्य युक्त आत्म स्वरूप के प्रभाव को नहीं जानता था इसलिए मेरे द्वारा आपको सखा मानकर प्रेम से अथवा बुद्धि भ्रम से हे कृष्ण, हे सखा, हे यादव इस प्रकार बिना सोचे विचारे और हठ पूर्वक कहा गया। हे अच्युत मेरे द्वारा विनोद के समय, विहार करते हुए, सोते हुए, बैठते हुए, भोजन आदि करते हुए, अकेले में अथवा मित्र और सम्बन्धियों के सामने, आपको कृष्ण, यादव, सखा शब्दों से अपमानित किया गया। हे अप्रमेय स्वभाव वाले, हे विश्व देव, मैं आपके प्रभाव को नहीं जानता था इसलिए हे परमात्मा, मैं आपसे अपने अपराध की क्षमा चाहता हूँ और अपने अपराधों को क्षमा करवाता हूँ।

पिता चराचर जगत के, गुरु गुरु अति से पूज्य
अमित प्रभाव त्रिलोक में, सम नहीं अन्य न श्रेष्ठ।।43।।

हे विश्वात्मन! आप इस चराचर जगत के पिता हैं और परम श्रेष्ठ गुरु भी आप ही हैं, आप अति पूज्यनीय हैं, तीनों लोकों में आपके समान कोई नहीं है, आप अनुपम प्रभाव वाले हैं, फिर आपसे अधिक दूसरा कौन और कैसे हो सकता है।

देह चरण में राखि के, कर प्रणाम हे ईश
तुम वन्दन के योग्य हो, प्रभु प्रसीद प्रसीद
मित्र मित्र सुत के पिता क्षमा करे अपराध
जैसे प्रिय अपनी प्रिया, सहन करो अपराध।।44।।

हे परमात्मा! हे स्तुति के योग्य हे ईश्वर! आपको प्रसन्न होने के लिए मैं दण्डवत प्रणाम करके प्रार्थना करता हूँ। हे आत्म देव, हे परमदेव, पिता जैसे पुत्र के, सखा जैसे सखा के, पति जैसे अपनी प्रिया के अपराध को सहन कर लेता है और क्षमा कर देता है उसी प्रकार हे प्रभु, आप मेरे अपराधों को सहन करते हुए क्षमा कीजिए।

जो नहिं देखा पूर्व में, देखि रूप मैं हर्ष
पर व्याकुल है मोर मन, देव रूप दर्शाय
हो प्रसन्न हे जगन्निवास हे देवों के ईश।।45।।

हे आत्मदेव! आपके पहले न देखे हुआ योग ऐश्वर्य स्वरूप जो इस युद्ध भूमि में महाकाल प्रकृति को लेकर सर्वत्र व्याप्त है, मैं देखकर हर्षित हो रहा हूँ परन्तु मेरा मन आपके महाकाल स्वरूप के कारण व्याकुल भी हो रहा है। इसलिए हे प्रभु कृपा कर मुझे अपने दिव्य नर हरि रूप को दिखलाइये। हे देवताओं के स्वामी, हे जगत के स्वामी, मुझ पर प्रसन्न हों।

हाथ लिए गदा चक्र मकुट धरे शीश पर
चार भुजा युक्त दृष्ट, विश्वरूप सहस बाहु।।46।।

हे प्रभु! मैं आपको मुकुट धारण किये हुए और हाथ में गदा और चक्र लिए हुए देखना चाहता हूँ इसलिए हे विश्व रूप, हे अनन्त भुजा वाले भगवन, कृपा कर नर हरि (चर्तुभुज) रूप में प्रकट होइये। श्री भगवान विष्णु शंख, चक्र गदा पद्म  धारण करते हैं।. उनका यह चतुर्भज स्वरुप क्या है? शंख शब्द का प्रतीक है, शब्द का तात्पर्य ज्ञान से है जो सृष्टि का मूल तत्त्व है। चक्र का अभिप्राय माया चक्र से है जो जड़ चेतन सभी को मोहित कर रही है। गदा ईश्वर की अनंत शक्ति का प्रतीक है और पद्म से तात्पर्य नाभि कमल से है जो सृष्टि का कारण है। इन चार शक्तियों से संपन्न होने के कारण श्री हरि को चतुर्भुज कहा है।

अति प्रसन्न दर्शित तुझे, आत्म योग हे पार्थ
परम तेज मय आदि यह सीमा रहित विराट
पूर्व अन्य देखा नहीं तेजोमय यह रूप।।47।।

इस प्रकार अर्जुन की विनय सुनकर श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! मैंने अत्यन्त प्रसन्न होकर अपनी योग शक्ति के प्रभाव से अपना परम ज्ञान व सीमा रहित, सबका कारण, सबका आदि, विराट स्वरूप तुझे दिखलाया है, जिसे तेरे अतिरिक्त अन्य किसी के द्वारा पहले कभी नहीं देखा गया।

नहीं रूप यह दृश्य है, तव समान नर लोक
वेद यज्ञ अध्ययन तप, क्रिया दान हे वीर।।48।।

हे अर्जुन! इस पृथ्वी लोक में इस प्रकार विश्व रूप वाला मेरा विराट स्वरूप न वेदों के अध्ययन से, न दान से, न भिन्न-भिन्न प्रकार की ईश्वर निमित्त क्रियाओं से, न उग्र तपों से, तेरे अलावा दूसरे के द्वारा देखा जाना शक्य नहीं है।

नहि व्यथा अरु मू़ढ़ता देख रूप विकराल
प्रीत युक्त हो भय रहित देख चतुर्भुज रूप।।49।।

मेरे इस विराट और विकराल स्वरूप को देखकर तुझे व्याकुलता नहीं होनी चाहिए और तुझे मूढ़ भाव भी नहीं होना चाहिए। तू भय रहित और अति प्रेम युक्त मन से मेरे उसी नर हरि श्री कृष्ण स्वरूप को फिर से देख।

सौम्य रूप धारण किया दर्शाया, श्री कृष्ण
भीत पार्थ धीरज दिया वासुदेव भगवान।।50।।

संजय बोले- हे राजन्! वासुदेव भगवान श्री कृष्ण चन्द्र ने, अर्जुन के प्रति यह कर अपना नर हरि स्वरूप दिखलाया और इस प्रकार भयभीत अर्जुन को श्री कृष्ण महाराजा ने धीरज दिया।

तव रूप नर हरि शान्त अति, देख चित स्थित हुआ
प्राप्त हूँ अपनी प्रकृति को, जगत पिता हे ईश।।51।।

अर्जुन बोले- हे भगवन! आपके अति शान्त मनुष्य, नर हरि स्वरूप को देखकर मैं स्थित चित्त हो गया हूँ और अपने स्वभाव को प्राप्त हो गया हूँ।

अति सुदर्शन रूप यह जो देखा तू पार्थ
मन राखे सुर लालसा देखन नर हरि रूप।।52।।

श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! मेरा यह नर हरि स्वरूप भी अत्यन्त दुर्लभ है। देवता भी इस मनोहारी स्वरूप को देखने की सदा इच्छा करते रहते हैं परन्तु यह स्वरूप उनके लिए भी दुर्लभ है।

नहीं रूप यह दृश्य है तव समान नर लोक
वेद यज्ञ तप दान से, नर हरि दिव्य स्वरूप।।53।।

हे अर्जुन! जिस प्रकार तूने मेरा योग ऐश्वर्य युक्त विराट स्वरूपको देखा और अब नर हरि स्वरूप को देख रहा है, मेरे यह दोनो स्वरूप न वेद ज्ञान से, न तप से, न दान से, न यज्ञ से देखे जा सकते हैं।

किन्तु पार्थ अति सुगम है श्री नर हरि का रूप
राखे भक्ति अनन्य जो तत्व ज्ञान से एक।।54।।

परन्तु हे अर्जुन! जो मेरा अनन्य भक्त है, जो तेरे समान ही मुझे प्रिय है ऐसे प्रिय भक्त द्वारा ही मेरा विभूतिमय विराट स्वरूप और मेरा नर हरि स्वरूप प्रत्यक्ष देखने के लिए शक्य है। मेरा अनन्य प्रेमी ही मुझे तत्व से जान सकता है और वही मुझमें प्रवेश पा सकता है आत्म स्वरूप होना, ब्राह्मी स्थिति को पाना, मेरे अनन्य प्रेमी के लिए ही संभव है।

करे समर्पित कर्म मम, मम परायण होय
आस रहित निर्वैर वह मुझको पाता भक्त ।।55।।

श्री भगवान द्वारा यहाँ  पुनः बताया है कि मेरा आत्म स्वरूप अनन्य भक्ति से अर्थात जो निरन्तर स्वरूप स्थिति की खोज करता हुआ आत्मरत रहता है, जो मुझे विश्वात्मा भाव से देखता है, मैं आत्मा उसी के लिए सुलभ हूँ क्योंकि उसके सभी कर्म मेरे लिए होते हैं। सदा मुझमें आत्मरत हुआ वह संसार की ओर से नित्य उदासीन रहता है। उसका संसार में न कोई मित्र है न शत्रु है। सम्पूर्ण प्राणी उसे मेरा ही स्वरूप दिखायी देते हैं, उसका वैर भाव समाप्त हो जाता है। इस प्रकार वह सदा-सदा के लिए आत्म ज्ञान को प्राप्त हो जाता है जहाँ अज्ञान का अंश भी नहीं है और अक्षय शान्ति, आनन्द एवं ज्ञान का श्रोत ब्रह्म स्वरूप हो जाता है।
यहाँ  एक महत्वपूर्ण बात श्री भगवान ने बतायी है, मेरे मानवीय शरीर का सानिध्य एवं दर्शन भी सबके लिए सुलभ नहीं है। इसे भी केवल वही व्यक्ति देख पाता है अर्थात मेरा (मेरे मानवीय शरीर का) सानिध्य भी उसे ही मिलता है जो मेरे लिए ही अर्थात आत्मा के लिए निष्काम कर्म करता है, आत्मरत है (मेरा भक्त है), समस्त प्राणियों से वैरभाव से रहित है क्योंकि सभी में वह आत्म स्वरूप के दर्शन करता है। यह बताते हुए श्री भगवान ने यह संकेत किया है कि इस संसार में ब्रह्म ज्ञानी का दर्शन भी सबके लिए सुलभ नहीं है। उसका सानिध्य केवल स्वाभाविक कर्म करते हुए धर्माचरण करने वाला, सदा आत्म ज्ञान के लिए लालायित अनेक जन्मों का योगभ्रष्ट पुरुष ही प्राप्त करते हैं।



                 .....................................

No comments:

Post a Comment