दूसरे के धर्म से गुण रहित अपना धर्म (स्वभाव) अति उत्तम है। दूसरे का धर्म (स्वभाव) यद्यपि श्रेष्ठ हो या दूसरे के धर्म (स्वभाव) को भली प्रकार अपना भी लिया जाय तो भी उस पर चलना अपनी सरलता को खो देना है क्योंकि हठ पूर्वक ही दूसरे के स्वभाव का आचरण हो सकता है, अतः स्वाभाविकता नहीं रहती।
वसंतेश्वरी भगवद्गीता- बसंत प्रभात जोशी
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तीसरा अध्याय-कर्मयोग
ज्ञान कर्म से
श्रेष्ठ है, यही तुम्हें है मान्य
फिर हे केशव क्यों
मुझे, करवाते भय कर्म।।1।।
अर्जुन बोले- हे श्री कृष्ण1 यदि आप कर्म की अपेक्षा
ज्ञान को श्रेष्ठ मानते हैं तो फिर किस
कारण वश इस भंयकर युद्ध कर्म में,
जहाँ
स्वजनों के ही साथ युद्ध होना है,
क्यों
लगाते हैं?
केशव मिश्रत वचन से
बुद्धि भ्रमित हो जाय
एक मार्ग निश्चित करें, कल्याणम् पहुंचाय।।2।।
हे भगवन! आपके मिले जुले वचनों से मेरी भ्रमित
बुद्धि और भी भ्रमित हो गयी है।
मुझे कुछ भी रास्ता नहीं सूझ रहा है। अतः एक
बात निश्चित करके बताइए जिससे मैं कल्याण के मार्ग पर चल सकूं।
दो प्रकार की निष्ठा
जग मे, पुरा कही निष्पाप
सांख्यों का है ज्ञान
योग, योगी निष्ठा कर्म।।3।।
हे निष्पाप अर्जुन! इस संसार में दो प्रकार की निष्ठा मेरे
द्वारा पहले बताई गई हैं उनमें
सांख्य मार्ग के अनुयायी की निष्ठा
ज्ञान
योग से है। सभी गुणों का कारण प्रकृति है अतः मन, बुद्धि, अहंकार से शरीर की क्रियाओं में अहम्
भाव का त्यागकर आत्मरत होते हुए
परमतत्व की खोज करना, परमतत्व को जानना उसमें स्थित रहना सन्यास अथवा साँख्य
योग है। परन्तु जिन योगियों की निष्ठा
कर्म योग से है वे फल और आसक्ति को
त्यागकर
समस्त कर्म एवं कर्मफल प्रभु के निमित्त करते हुए निष्काम कर्म योग का आचरण करते हैं।
कर्म त्यागने मात्र
से, नहिं होता है सिद्ध
आरम्भ बिना ही कर्म
के, नहिं होता निष्काम।।4।।
मनुष्य यदि समस्त कर्मों को प्रारम्भ
किए बिना ज्ञानी की तरह निष्काम बनने का
प्रयत्न करे तो सम्भव नहीं है। इसी प्रकार सभी
कर्मों को त्याग दे और कर्म शून्य बन जाय यह भी नहीं हो सकता क्योंकि विहित कर्म आवश्यक है तथा
कर्म स्वाभाविक रूप से होते हैं। कर्म
पलायन कर्म त्याग नहीं है।
धर्म विरत क्षण मात्र
भर, रहे न कोई काल
प्रकृति जनित गुण
कर्म से, पर वश हुआ स्वभाव।।5।।
कोई भी मनुष्य किसी भी क्षण बिना कर्म
के नहीं रह सकता। सभी प्राणी प्रकृति बाध्य
हैं। सांस लेना सांस छोड़ना, सुनना देखना, चलना फिरना, उठना बैठना, शौच आदि सभी स्वाभाविक रुप से होने वाले कर्म हैं । कोई भी मनुष्य या
प्राणी स्वाभाविक कर्मों का त्याग नहीं कर
सकता है।
मन मन भावे तन से
रोके, कर्मेंन्द्रिय
व्यापार
मिथ्याचारी मूढ़
बुद्धि वह, मन से कर व्यवहार।।6।।
जो अज्ञानी मनुष्य समस्त इन्द्रियों को
बलपूर्वक जबरदस्ती से रोककर मन से इन्द्रियों
के विषयों का चिन्तन करता है; जैसे भूख लगती है खाना भी चाहता है और उपवास
का ढोंग करे। स्त्री का चिन्तन करे
और जबरन ब्रह्मचारी बने। यह आचरण मिथ्या है। ऐसा
मनुष्य मूढ़ है।
मन से वश कर इन्द्रियां, अनासक्त का योग
अति विशिष्ट जन सोई
है, जो करता है योग।।7।।
ज्ञानी पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में
करके अनासक्त हुआ सभी इन्द्रियों से
स्वाभाविक कर्म करता है, संसार के भोगों को त्यागते हुए भोगता है, संसार में निर्लिप्त हो कर्म करता है।
ऐसा कर्म योगी संसार के
सभी कर्मों को शौचादि कर्म की तरह मन
में
स्थान नहीं देता है तथा कर्मों को स्वाभाविक समझ कर अनासक्त हो कर्म करता है।
विधि सम्मत तू कर्म
कर, जान कर्म को श्रेष्ठ
देह धर्म नहिं सिद्ध
है, बिना कर्म हे पार्थ।।8।।
सुस्पष्ट है कर्म रहित होना असम्भव है
अतः तू शास्त्र सम्मत कर्म कर क्योंकि कर्म न
करने से कर्म करना श्रेष्ठ है शरीर संचालन भी
बिना कर्म के नहीं हो सकता है।
यज्ञ कर्म को छोड़कर
सब बांधें जंजाल
अनासक्त हो कर्म कर
यज्ञार्पण कर दे सदा।।9।।
यज्ञ ईश्वर निर्मित कर्म को कहते हैं, यज्ञ स्वधर्म आचरण को कहते हैं। स्वधर्म
ही स्वभाव है। ईश्वर के निमित्त कर्मों के अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा मनुष्य
कर्मों से बंधता है। अतः आसक्ति रहित होकर सभी कर्मों को ईश्वर अर्पण करता हुआ कर्म
कर। सहज स्वाभाविक कर्म जो उसे उसकी प्रकृति से मिले हैं को छोड़ दूसरे कर्मों में
लगा मनुष्य कर्मों में बंधता है अतः हे अर्जुन! आसक्ति रहित होकर स्वाभाविक कर्म कर।
कल्प आदि विधि ने रचा, यज्ञ सहित भू लोक
यज्ञ करें कल्याण को, पूर्ण कामना होय।।10।।
प्रजापति ब्रह्मा जी ने सृष्टि के आदि में
स्वभाव सहित प्राणियों को रचकर कहा कि अपने अपने स्वभाव के आधार पर कर्म करते हुए
तुम वृद्धि को प्राप्त हो। तुम्हारा स्वभाव तुम्हें तुम्हारे स्वभावानुसार इच्छित
भोग प्रदान करने वाला हो अर्थात स्वधर्म आचरण बिना आडम्बर के निष्काम भाव से करना
है। बाहरी दिखावे के लिए अथवा दूसरे के स्वभाव से प्रभावित होकर आचरण मत करना
क्योंकि दूसरे के स्वभाव में तुम उलझ जाओगे तथा अनासक्त आचरण नहीं हो पायेगा।
उन्नत होंगे देवगण, तुम उन्नत हो जाव
प्रति उन्नत करते हुए, परम श्रेय को पाव।।11
।।
स्वधर्म पालन स्वभाव में रहते हुए करते
हुए तुम समस्त देवताओं का पूजन करो। गुरूदेव, मातृदेव, पितृदेव, अतिथि देव आदि का पूजन करो और वह सभी देव तुम्हें
उन्नत करें। इस प्रकार परस्पर एक दूसरे को उन्नत करते हुए कल्याण को प्राप्त हो।
यज्ञ सम्मुन्नत देवगण, देंगे इच्छित भोग
भोगे अर्पित देव बिन, निश्चय ही वह चोर।।12।।
स्वधर्म पालन स्वभाव से रहते हुए करते
हुए सभी दैव तुम्हारी पूजा स्वीकार कर तुम्हें इच्छित भोग देंगे। तुम्हारी मनोकामना
पूर्ण करेंगे और देव कृपा से प्राप्त भोग को जो मनुष्य उन्हें अर्पित किये हुए बिना
भोगता है वह चोर है। यह सम्पूर्ण
सृष्टि जीव मय है, जीव स्वयं अधिदैव है।
यह जहाँ है वहाँ चैतन्य है। कहीं यह प्रकट रूप में कहीं अप्रकट रूप में है। सभी
कुछ ईश्वर का प्रसाद है, सभी में वही ईश, जीव रूप में व्याप्त है, वही दैव है, वही अधिदैव है, यह समझकर सभी भोग सभी भूतों को अर्पित
करते हुए देव यजन करना तथा स्वभाव में स्थित रहना परम कल्याण कारक बताया है।
बचे अन्न जो यज्ञ से, सन्त मुक्त परसाद
केवल भरते पेट जो, पाप भक्ष्य वे लोग।।13।।
यज्ञ से बचे अन्न का सेवन करने वाले
मनुष्य अर्थात स्वभावगत कर्मों के आचरण करते
हुए सभी देवों यथा माता, पिता, गुरु, अतिथि आदि सभी भूतों को तृप्त करता हुआ
अन्न का सेवन करने वाले मनुष्य
के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं तथा जो
पापी
लोग अपना शरीर पोषण के लिए भोजन कमाते व पकाते हैं, वह पाप को खाते हैं अर्थात स्वभाव गत
कर्म करते हुए अपने कमाये अन्न से सभी जीवों को तृप्त करते हुए भोजन करना चाहिए। इसी यज्ञ से ईश्वर संतुष्ट होते
हैं, इसी से हरि बोध मयी दृष्टि उत्पन्न होती है। लोक कल्याण परहित ही देव पूजन है, क्योंकि सभी भूतों में जीव अधिदैव के
रूप में स्थित है।
प्राणी उपजे अन्न से, वर्षा उपजे अन्न।
होती वर्षा यज्ञ से, यज्ञ कर्म उत्पन्न।।14।।
कर्म उपजे ब्रह्म से, ब्रह्म उपज अक्षर परम।
ब्रह्म सर्वगत सर्वदा, नित्य यज्ञ स्थित स्वयं।।15।।
सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं अन्न की उत्पत्ति वर्षा से होती है और वर्षा यज्ञ से होती है अर्थात वर्षा स्वभावानुसार होती है वर्षा होना प्रकृति का नियम है। स्वभाव कर्म से उत्पन्न होता है। कर्म ब्रह्म से उत्पन्न होता है, तात्पर्य है ब्रह्म की स्वाभाविक ज्ञान शक्ति से कर्म उत्पन्न होता है और ब्रह्म, अक्षर अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न होता है।इससे सिद्ध होता है परम अक्षर परमात्मा सदा यज्ञ-स्वभाव में प्रतिष्ठित है।
विधि सम्मत इस चक्र
को, नहि वरते अनुकूल
वह विषयी पापायु नर, व्यर्थ जिये जग जान।।16।।
हे पार्थ! जो मनुष्य संसार में इस
प्रचलित सृष्टि चक्र के अनुसार नहीं चलता है, स्वभाव के विपरीत आचरण करता है या कहें स्वधर्म पालन
नहीं करता वह इन्द्रियों द्वारा नित नवीन भोगों में लगा पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता
है।
आत्म रत अरु तृप्त है, आत्मा में संतुष्ट
नहीं कर्म अवशेष हैं, सच्चे परमानन्द।।17।।
जो पुरुष आत्मा में रमण करता है आत्मा में
ही तृप्त है और आत्म बोध से संतुष्ट
है वह कर्म करता हुआ भी कर्म नहीं करता इसलिए
उसके लिए कोई कर्तव्य, कर्म नहीं है।
जिसका कुछ नहिं अर्थ
है, कर्म और अकर्म
किचिन्मात्र न होता
उसका, भूत स्वार्थ
सम्बन्ध।।18।।
अपने स्वरुप में स्थित हो जाने पर उस
पुरुष का न कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता
है न कर्म, न करने से प्रयोजन रहता है। उसका
सभी प्राणियों से किसी प्रकार का कोई स्वार्थ सम्बन्ध भी नहीं रहता है।
अनासक्त का भाव रख, कर्तव्य कर्म कर
पार्थ
अनासक्त जो कर्मरत रत, परमात्मा को
प्राप्त।।19।।
अतः फल की आसक्ति को त्यागकर कर्तव्य
कर्म को कर क्योंकि अनासक्त (फल की इच्छा
से रहित) होकर कर्म करता हुआ मनुष्य
परम
आत्मतत्व को प्राप्त होता है।
अनासक्त जनकादि थे, परम सिद्धि को
प्राप्त
उसी भाव से कर्म कर, यही धर्म का मार्ग ।।20।।
राजा जनक आदि महापुरुष कर्म का अंश भर
भी त्याग न करके परम सिद्धि को
प्राप्त हुए थे। लोक आचरण को देखते समझते हुए
भी तू कर्म करने योग्य है क्योंकि जैसा श्रेष्ठ जन आचरण करते हैं संसार उसी प्रकार चलता है अथवा आचरण
करता है।
महानुभाव का आचरण, दे लोकन में सीख
करें अनुसरण लोग सब, दे जाते जो सीख।।21।।
श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, संसार भी उसी का अनुसरण करते हुए चलता है। उनका आचरण अन्य लोगों को शिक्षा देता है, वह जो कुछ निश्चित कर देते हैं मनुष्य
समुदाय उसी प्रकार आचरण करने लगता है।
नहीं शेष कुछ कर्म मम, तीन लोक जग माँहि
तब भी हूं मैं कर्मरत, दुर्लभ कुछ भी
नाहिं।।22।
अर्जुन को अपना परम प्रिय जानकर अपने ऐश्वर्य
एवं प्रभाव को बताते हुए लोकहित में
कर्म के महत्ता को समझाते हैं कि हे
अर्जुन! मुझे तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है
और न कोई ऐसी वस्तु नहीं है जो
मुझे अप्राप्त है, फिर भी मैं लोकहित के लिए कर्म करता हूँ।
सावधान नहिं कर्मरत, सुना पार्थ चित लाय
बरतेंगे तस लोग सब, मार्ग मोर वह जान।।23।।
यदि मैं सावधानी पूर्वक लोक हित में
कार्य न करूं तो लोगों में इस का संदेश गलत
जाएगा, क्योंकि मनुष्य मेरे
मार्ग का अनुसरण करते हैं। अतः
मैं लोक हित में कर्म उसी प्रकार करता
हूँ
जिस प्रकार सकाम पुरुष कर्म करते हैं।
विरत कर्म से मैं रहूँ, भ्रष्ट लोक हो जांय
संकर बढ़े, प्रजा मरे, हनन दोष लग जाय।।24।।
यदि मैं लोक हित में कर्म न करूं और कर्मों
से उदासीन हो जाऊँ तो मेरे व्यवहार
को देखते हुए अन्य लोग भी मेरी तरह ही
आचरण
करेंगे और कर्म नहीं करेंगे परिणाम स्वरूप संसार नहीं चलेगा अतः कर्म त्याग उचित नहीं है।
हे भारत, आसक्त जन, रहे कर्म में लीन
अनासक्त विद्वान जन, करे लोक में कर्म।।25।।
फल की इच्छा रखने वाले अज्ञानी मनुष्य
जिस प्रकार कर्म करते हैं अनासक्त ज्ञानी
पुरुष को भी लोक कल्याण को देखते हुए
सकाम
पुरुष की तरह कर्म करना चाहिए।
आत्म ज्ञान से युक्त
जो, करे कर्म तद्भाव
नहिं टारे आसक्त मति, भ्रम नहिं डारे
बुद्धि।।26।।
परमात्मा में जिसका चित्त लगा है ऐसे
ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह आसक्त होकर कर्म
करने वाले अज्ञानी पुरुषों की बुद्धि को न भटकाये, उसमें भ्रम पैदा न करे। बल्कि स्वयं भी
सभी कर्म करता हुआ उनसे वैसा
करवाये। सकामी मनुष्य जिन्हें ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है अपने स्वभाव वश कर्म में
लगे रहते हैं, ऐसे अनाधिकारी
मनुष्यों को निष्कामता का उपदेश बेकार है। कच्ची बुद्धि होने के कारण वह अपने स्वाभाविक
धर्म से भटक सकते है।
जानो गुण तुम प्रकृति
के, सब कर्मन का मूल
होकर मोहित अहम् से, मैं कर्ता हठ मान।।27।।
सभी कर्म प्रकृति के गुणों के द्वारा
किये जाते हैं। सत्त्व, रज और तम की विभिन्न
मात्रा के अनुसार प्रत्येक प्राणी अलग
अलग
स्वाभाविक कर्म करता है परन्तु अहंकार के कारण अज्ञानी जीवात्मा स्वयं को कर्ता मानता है और कर्म बन्धन में फॅसता है।
गुण ही गुण के गुण
रहे, गुण कर्मों को जान
पड़ा भाव आसक्ति का, जान तत्व का ज्ञान।।28।।
ज्ञान योगी गुण विभाग और कर्म विभाग के
तत्व को जानता है। सम्पूर्ण गुण गुणों में
वर्तते हैं, ऐसा समझकर वह आसक्त
नहीं होता है। संसार की
समस्त जड़ प्रकृति तीन गुणों से रचित है, सभी
में तीन गुण समाये हुए हैं। पंचमहाभूत, आकाश, वायु अग्नि, जल, पृथ्वी सभी में तीन गुण कम या अधिक
मात्रा में समाये हैं। मन, बुद्धि, अहंकार, इन्द्रियां भी तीन गुणों के कम अधिक मात्रा के आधार पर भिन्न भिन्न
चेष्टा करती हैं। आत्मा सदा निर्लिप्त और गुणातीत है अतः ज्ञानी गुणों से आसक्त
नहीं होते हैं। वह हमेशा
साक्षी भाव से गुणों को देखते हैं।
हों मोहित गुण
प्रकृति से, धरें कर्म विश्वास
विज्ञ न विचलित मूढ़
को, तोड़ न उनकी आस।।29।।
अज्ञानी पुरुष प्रकृति के गुणों से
मोहित हुए गुण व कर्मों में आसक्त रहते हैं और
सदा कर्म बन्धन में फॅसे रहते हैं। ज्ञानी पुरुष
इन अज्ञानी मनुष्यों को स्वभाव वश लगे हुए कर्मों से विचलित न करे क्योंकि कर्म आसक्त किसी
भी सामान्य अथवा अज्ञानी मनुष्य के
समझ में जड़ व चेतन प्रकृति का खेल नहीं आ सकता
है।
अर्पित कर सब कर्म मम, चित्त लगा परमात्म
आस मोह तजि, दुःख ज्वर, पार्थ युद्ध की ठान।।30।।
तू समस्त कर्मों को मुझमें अर्पित कर दे
तथा अपनी चित्त वृत्ति को सदैव आत्म स्वरूप में
लगाये रख । कर्तापन को छोड़कर बिना फल की आशा के, ममता रहित और संताप रहित होकर युद्ध कर। आत्म स्वरूप में स्थित होकर यह समझ
ले कि तू अविनाशी, अव्यक्त आत्मा है, तू विकार रहित है अतः निमित्त मात्र युद्ध कर।
द्वेष बुद्धि से रहित
हो, श्रद्धा से हो युक्त
कटे कर्म बन्धन सभी, जो माने उपदेश।।31।।
जो मनुष्य मेरे इस मत में दोष नहीं
देखते हैं तथा श्रद्धायुक्त होकर आदर पूर्वक इस
मत के अनुसार चलते हैं वह कर्म बन्धन
से
छूट जाते हैं।
जो नहिं विचरें एहि
मत, दोष देखिये मोर
मोहित चित सब ज्ञान
से, करें आपना नाश।।32।।
जो मनुष्य मेरे इस मत में दोष दृष्टि
रखते हैं तथा इस मत के अनुसार नहीं चलते, जिनका चित्त भिन्न भिन्न साँसारिक ज्ञानों से मोहित है, उन्हें तू नष्ट हुआ समझ अर्थात वे कभी
भी आत्मतत्व को नहीं पा
सकते।
प्रकृति प्राप्त होते
सभी, ज्ञानी का यह भाव
क्या कर सकता हठ यहाँ
, परवश हुआ स्वभाव।।33।।
सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते है। सत्त्व, रज, तम की मात्रा के अनुसार चेष्टा करते हैं।
ज्ञानी भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता
है फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा।
चेष्टाएं
स्वाभाविक रुप से होनी हैं फिर उन्हें क्यों हठ पूर्वक बढ़ाया जाय। अतः अधिक परिश्रम करके दिन
रात काम करते हुए भोग प्राप्त करने की
विशेष चेष्टा (हठ) बुद्धिमानी नहीं है।
राग द्वेष से युक्त
हैं, इन्द्रिय इन्द्रिय
तत्व
महाशत्रु कल्याण के, नहिं वश इनके होय ।।34।।
प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और
द्वेष छिपे हुए हैं, इन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए अन्यथा मकड़ी
की तरह स्वयं अपने जाल में जीव फॅस जाता
है। ये दोनों कल्याण मार्ग में विघ्न
करने
वाले शत्रु हैं अतः राग और द्वेष को हृदय में स्थान नहीं देना चाहिए।
गुण रहित निज धर्म भी, महत् जान पर धर्म
मरण भला निज धर्म में, अपर धर्म भय जान।।35।।
दूसरे के धर्म से गुण रहित अपना धर्म
(स्वभाव) अति उत्तम है। दूसरे का धर्म (स्वभाव) यद्यपि श्रेष्ठ हो या दूसरे के
धर्म (स्वभाव) को भली प्रकार अपना भी लिया जाय तो भी उस पर चलना अपनी सरलता को खो
देना है क्योंकि हठ पूर्वक ही दूसरे के स्वभाव का आचरण हो सकता है, अतः स्वाभाविकता नहीं रहती। अपने धर्म
(स्वभाव) में मरना भी कल्याण कारक है दूसरे का स्वभाव भय देने वाला है अर्थात
तुम्हारे अन्दर सत्त्व, रज, तम की मात्रा के अनुसार तुम्हारा जो स्वाभाविक
स्वभाव है उसका सरलता पूर्वक
निर्वहन करो।
कहो कृष्ण, यह जीव क्यों, करे अनिच्छित पाप
जबरन यह दुष्कर्म रत, कहाँ से प्रेरित आप।।36।।
अर्जुन बोला:- हे कृष्ण! फिर यह मनुष्य न चाहता हुआ भी बलपूर्वक
लगाए हुए की तरह किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है। साधारण मनुष्य गलत
रास्ते पर चले तो समझा जा सकता है परन्तु विद्वान व्यक्ति भी गलत रास्ते पर चले
जाते हैं।
रजोगुण से जन्म है, काम क्रोध यह रूप
बहु भक्षी, बड़ पापि यह, इसको तू रिपु जान।।37।।
श्री भगवान बोले:- रजोगुण से जन्म लिए
काम और क्रोध ही मनुष्य को पाप की ओर ले चलते हैं। यह बहुत खाने वाले हैं और कभी
तृप्त नहीं होते हैं। यह बड़े पापी हैं तथा आत्मोन्नति के मार्ग में यह प्रबल शत्रु
हैं।
मल से दर्पण है ढका, अग्नि धुएं से जान
गर्भ ढका ज्यों जेर
से, ज्ञान काम से जान।।38।।
जिस प्रकार धुएं से अग्नि ढकी रहती है
तथा दर्पण मैले से ढक जाता है, जेर से गर्भ ढका रहता
है उसी प्रकार ज्ञान हमेशा काम-क्रोध से ढका रहता है।
काम महारिपु ज्ञानि
का, घेरा जिसने ज्ञान
पावक सम यह काम है, कभी नहीं संतुष्ट।।39।।
हे अर्जुन!अग्नि के समान सदैव असंतुष्ट यह काम, जो सदा ज्ञानियों का प्रबल शत्रु है
उन्हें भटकाता रहता है।
इन्द्रिय मन अरु
बुद्धि हैं, सदा काम के वास
इनके द्वारा ढके
ज्ञान को, करे जीव का नाश।।40।।
यह काम क्रोध इन्द्रिय मन बुद्धि में
सदा बैठे रहते हैं यहाँ बैठकर यह सदैव नित्य शुद्ध ज्ञान को ग्रहण की तरह आच्छादित
कर जीवात्मा को मोहित करते हैं।
नष्ट ज्ञान विज्ञान
को, करता पापी काम
करके वश में इन्द्रियां, बल से इसको मार।।41।।
इसलिए हे अर्जुन! काम क्रोध के मूल स्थान इन्द्रियों को वश
में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी काम क्रोध को तू बल पूर्वक मार डाल।
इन्द्रियां बलवान हैं, मन और भी बलवान है
बुद्धि है मन से बड़ी, और जीव है सबसे
बड़ा।।42।।
स्थूल शरीर से इन्द्रियां बलवान और
सूक्ष्म हैं, इन्द्रियों से मन अधिक
शक्तिशाली है, मन से भी परे बुद्धि
है और जो बुद्धि से भी परे है, जो बुद्धि से शक्तिशाली है तथा बुद्धि द्वारा
नहीं पकड़ा जा सकता वह आत्मा है।
बुद्धि से बढ़कर है
जो
अति श्रेष्ठ है यह
आत्मा
बुद्धि से कर वश मना
प्रबल काम रिपु जीत
ले।। 43।।
इस प्रकार बुद्धि से अत्यन्त श्रेष्ठ
आत्मा को जान कर बुद्धि के द्वारा मन को वश में करके हे अर्जुन! इस काम, क्रोध रुपी प्रबल शत्रुओं को मार डाल।
......................................
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