मैं आत्मा ही सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति का कारण हूँ मेरी आत्म शक्ति से ही यह सम्पूर्ण जगत चेष्टा करता है अर्थात श्री ब्रह्मा और श्री हरि विष्णु मेरी आत्म शक्ति से ही उत्पत्ति एवं जगत पालन का कार्य करते हैं।
परमात्मा के एक अंश परा प्रकृति ने सम्पूर्ण जगत को धारण किया है। विश्व के कण कण में मैं आत्म रूप में स्थित हूँ, सभी विभूति मेरा ही विस्तार हैं।
वसंतेश्वरी भगवद्गीत - प्रो बसन्त प्रभात जोशी
दसवाँ अध्याय-विभूतियोग
श्रवण परम इस वचन को, मम राखत अति प्रीति
महाबाहु सुन यह वचन, कहूँ तोर कल्याण ।।1।।
श्री भगवान कहते हैं कि हे दीर्घबाहु! मेरे परम ज्ञान विज्ञान युक्त वचन को
सुन, तू मेरा अत्यन्त प्रेमी
भक्त है, अतः तेरे कल्याण के
लिए अपनी योग शक्ति और विभूति को कहता हूँ।
नहिं जानत सुर जन्म
मम, नहिं ऋषि आदि महान
आदि देव सब देव का, ऋषि कारण तू जान।।2।।
मेरे जन्म को न देवता लोग जानते हैं न
बड़े ज्ञानी महर्षि जानते हैं, क्योंकि मैं अव्यक्त
निराकार परम अक्षर पुरुष हूँ। मैं समस्त देव और महर्षियों का सबसे पुरातन कारण भी हूँ।
लोक महेश्वर आदि अज, तत्व जान जो पार्थ
ज्ञानवान वह नर सभी, पाप मुक्त हो जात।।3।।
जो योगी अनेक जन्मों की साधना के फल
स्वरूप मुझ आत्मा को अजन्मा, अनादि और समस्त
सृष्टि का महान ईश्वर जानता है, वही आत्मा में स्थित
योगी मुझे तत्व से जानता है। उसके सभी कर्म बन्धन क्षय हो जाते हैं। वह आत्मस्थ
योगी मुझ परमात्मा का स्वरूप हो मुझमें स्थित हो जाता है।
बुद्धि ज्ञान दम शम
क्षमा, सत्य मूढ़ अभाव
सुख दुःख समता भय अभय, प्रभव प्रलय संतोष।।4।।
यश अपकीर्ति दान तप
और अहिंसा पार्थ
मुझसे ही उत्पन्न हों, सभी देहि सब भाव।।5।।
बुद्धि, ज्ञान, असंमूढ़ता, क्षमा, सत्य, इन्द्रियों का दमन (वश में करना), मन का निग्रह, सुख-दुःख, उत्पत्ति-प्रलय, अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान, कीर्ति, अपकीर्ति प्राणियों के नाना प्रकार के
भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं। प्राणी जिस तरह भिन्न भिन्न प्रकृति के हैं, उसी प्रकार उनके भाव भी भिन्न भिन्न
होते हैं। यह सब प्राणियों के कर्म के अनुसार होते हैं, अपरोक्ष रूप में मेरा संकल्प ही इन सबका
कारण है।
सात ऋषि, चौदह मनु, चार सृष्टि से पूर्व
मम मानस जन्मे सकल, सकल प्रजा इह लोक।।6।।
हे अर्जुन! इस सृष्टि के अत्यन्त प्राचीन सात
महर्षि जन और उनसे भी पहले होने वाले सनक सनकादि तथा चौदह मनु सब मेरे संकल्प से
उत्पन्न हुए हैं और इस संसार में जितने भी प्राणी हैं वह सब इन्हीं की प्रजा है।
सनक सनकादि- सनक, सनन्दन, सनतकुमार, और सनातन।
(अ) सात महर्षि- शतपथ ब्राह्मण के अनुसार
—गौतम, भरद्वाज, विश्वामित्र, यमदग्नि, वसिष्ठ, कष्यप और अत्रि हैं। (ब) महाभारत के
अनुसार- मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलह, क्रतु, पुलस्त्य और वसिष्ठ हैं।
चौदह मनु- स्वायंभुव, स्वारोचिष, तापस, उत्तम, रैवत, चाक्षुष, वैवस्वत, सावर्णि, दक्षसावर्णि, ब्रह्मसावर्णि, धर्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि, देवसावर्णि, इंद्रसावर्णि। मनुओं के नाम पर मनवंतर
(पृथ्वी के काल खंड)के नाम रखे गए हैं।
तत्व सहित जो जानता, मम एश्वर्य अरु योग
निश्चल भक्ति को
प्राप्त हो, इसमें नहिं संदेह।।7।।
जो मनुष्य मेरे परम ऐश्वर्य युक्त
विभूति और योग शक्ति को अर्थात किस प्रकार माया स्वतः मेरे द्वारा अनुशासित होती
है, जानता है, वह मेरे परम ऐश्वर्य युक्त आत्मतत्व की
अनुभूति करता है। यह मेरा सिद्ध वचन है, इसमें
संशय करने की कोई बात नहीं है।
मैं कारण सब जगत का, जगत मोहि प्रवर्त
जान विज्ञ श्रद्धा
सहित, मुझको भजते नित्य।।8।।
मैं आत्मा ही सम्पूर्ण सृष्टि की
उत्पत्ति का कारण हूँ मेरी आत्म शक्ति से ही यह सम्पूर्ण जगत चेष्टा करता है
अर्थात श्री ब्रह्मा और श्री हरि विष्णु मेरी आत्म शक्ति से ही उत्पत्ति एवं जगत पालन
का कार्य करते हैं। यह जानकर ज्ञानी परम श्रद्धा और प्रेम से युक्त होकर मुझ
आत्मतत्व में सदा अपने को लगाये रखते हैं।
चित्त निरन्तर सोंपि
मोहि, अर्पित मुझमें प्राण
बोध परस्पर कथन से, तुष्ट रमन्ते माम्।।9।।
मैं अव्यक्त परमात्मा सम्पूर्ण सृष्टि
का कारण हूँ, मुझ से ही जगत चेष्टा
करता है अर्थात अव्यक्त परमात्मा सृष्टि के जनक ब्रह्माजी, सृष्टि के पालक श्री
विष्णु के कारण हैं। परा
प्रकृति के जन्म और चेष्टा का भी आदि कारण अव्यक्त परमात्मा हैं। इस प्रकार मेरी
परा-अपरा प्रकृति का अनुभव करते हुए जो मेरे स्वरूप को समझ जाते हैं वह सदा मुझ
आत्मरूप परमात्मा में रमण करते हैं। सदा आत्मरत हुए मुझे भजते हैं।
सतत् युक्त अति
प्रीति से, सदा जो भजते माम
बुद्धि योग देता
उन्हें, जेहि विधि मुझको
प्राप्त ।।10।।
जिन का चित्त सदा मुझ (आत्मा) में लगा
है, जिनके प्राणों में मैं
आत्म रूप परमात्मा बस गया हूँ, जिनकी समस्त क्रियाएं केवल मेरे लिए ही होती
हैं, जो आपस में सदा मेरे
आत्मस्वरूप का बोध एक दूसरे को कराते हैं, मेरे तत्व को एक दूसरे को बताते हैं और
सदा आत्मरत होते हुए सतुंष्ट होते हैं वह मुझ वासुदेव स्वरूप परमात्मा में आत्मस्थ
होकर रमण करते हैं।
आत्म रूप स्थित हुआ, करहुं कृपा तिन्ह
पार्थ
नाश करूँ अज्ञान का, ज्ञान ज्योति के
साथ।।11।।
जब मैं आत्मरूप परमात्मा उन पर कृपा
करता हूँ तो उनके अन्तःकरण में जो अज्ञान है उसे नष्ट करता हूँ। वह माया के बन्धन
से मुक्त हो जाते हैं। भासित सत्य और यथार्थ सत्य का ज्ञान उन्हें हो जाता है
क्योंकि विशुद्ध ज्ञान उन्हें प्राप्त हो जाता है। विशुद्ध ज्ञान रूपी दीपक
सम्पूर्ण तमस को नष्ट कर देता है। ऐसे योगी सम्पूर्ण जगत को अपने में देखते हुए
ब्रह्म स्वरूप हो जाते हैं।
परम ब्रह्म, परम धाम, परम शुचि आप हो
शाश्वत विभु परम
पुरुष, आदि देव अज तुम्हीं।।12।।
असित देवल, व्यास,नारद नित सदा कहते
रहें
ऋषि सभी कहते यही, आप भी मुझसे कहें।।13।।
श्री भगवान द्वारा अर्जुन को संक्षेप
में योग ऐश्वर्य युक्त विभूति को बताने पर अर्जुन की भगवान श्री कृष्ण चन्द्र में श्रद्धा
बढ़ गयी और वह श्री भगवान की स्तुति करते हुए कहने लगा हे प्रभु, आप परब्रह्म हैं, परमधाम हैं अर्थात कल्पांत में जहाँ
सम्पूर्ण परा, अपरा प्रकृति विश्राम
को प्राप्त होती है, वह आप हैं। आप इतने
पवित्र हैं कि आपके अंश मात्र से अज्ञान शुद्ध और पवित्र होकर शुद्ध ज्ञान हो जाता
है। समस्त ऋषि गण आपको सनातन, दिव्य पुरुष, देवों का भी देव अर्थात आदि देव कहते हैं।
यही नहीं आपको अजन्मा और
सर्वव्यापी कहते हैं। देवर्षि नारद, महर्षि असित, देवल ऋषि, महर्षि व्यास तथा अन्य सभी ज्ञानी, ध्यानी ऋषि गण आपको
अव्यक्त, अक्षर, सनातन, सर्वव्यापी विशुद्ध ज्ञान स्वरूप कहते
हैं और स्वयं आप भी मुझे यह सब कहकर बता रहे हैं।
केशव मम प्रति कहत जो, ऋतम सभी मैं मान
दानव-देव न जानते, तव व्यक्तित्व
स्वरूप।।14।।
हे केशव! जो कुछ भी आप मुझे बता रहे हैं कि आप ही
आत्मा हैं, आप ही परमात्मा हैं, आप ही परब्रह्म हैं, मैं इसको सत्य मानता हूँ क्योंकि मेरी
आप पर पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास है। हे भगवन, आपके व्यक्तित्व आत्म स्वरूप को, आपकी विभूति को, आपके योग ऐश्वर्य को न दानव जानते हैं, न देवता ही जानते हैं।
हे ईश्वर सब भूत के, हे देवों के देव
सकल भूत रचना करो, तुम हो जग के ईश
तुम समर्थ पुरुषोत्तम, तुम्हें न जानत कोय
स्वयं स्वयं से जानते, अपना आत्म स्वरूप।।15।।
हे भूतों को अपने अंश मात्र से उत्पन्न
करने वाले! हे भूतों के ईश्वर! हे देवों के देव! हे जगत के मालिकi हे पुरुषोत्तम! हे आत्मतत्व परमात्मा! आप
स्वयं ही अपने आप को जानते हैं। आपको कोई दूसरा किसी भी प्रकार नहीं जान सकता।
प्रभु समर्थ तुम
स्वयं ही, वर्णन दिव्य विभूति
सकल लोक में व्याप्त
तुम, स्थित योग विभूति।।16।।
हे भगवन! केवल आप ही अपनी दिव्य विभूतियों को
जिनके द्वारा इस सम्पूर्ण सृष्टि,
सम्पूर्ण
लोकों को आपने व्याप्त करके स्थित किया है, सम्पूर्णता से कह सकने में समर्थ हैं।
केहि विधि चिन्तन हो
सदा, कैसे जानूं तोहि
किन भावों चिन्तन
करूं, हे योगेश्वर आप।।17।।
हे योगेश्वर! हे परम योगी, मैं किस प्रकार निरन्तर चिन्तन करता हुआ
आपको जानूँ और हे महात्मन् किन किन भावों में मुझे आपको चिन्तन करना चाहिए।
कहो योग की शक्ति को
और विभूति विस्तार
अमृत वचन सुनते हुए
तृप्त नहीं तव दास।।18।।
हे श्री कृष्ण! कृपा कर अपनी योग शक्ति और विभूति को
विस्तार पूर्वक मुझे बताने की कृपा करें क्योंकि आपके अमृत मय वचनों को सुनते हुए
मेरी तृप्ति नहीं होती और बार बार आपकी विभूति, ऐश्वर्य आपके वचन
सुनने की लालसा बनी रहती है।
प्रमुख कहूँ तेरे लिए, कुरुकुल के हे
श्रेष्ठ
मेरी दिव्य विभूति का, नहीं मिलेगा अंत।।19।।
श्री भगवान- बोले हे अर्जुन! तू मुझसे मेरी आत्म विभूति और ऐश्वर्य को
कहने के लिए इच्छा कर रहा है जो अनन्त हैं, अतः मैं तेरे लिए
अपनी दिव्य आत्म विभूतियों को संक्षेप में कहता हूँ।
सब भूतों के हृदय में, स्थित सबका आत्म
आदि मघ्य अरु अन्त
मैं, जान मुझे तू पार्थ।।20।।
मैं सम्पूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अन्त हूँ अर्थात सभी भूत मुझ
आत्मतत्व परमात्मा से प्रकट होते हैं मुझमें स्थित रहते हैं और अन्त में मुझमें ही
विलीन हो जाते हैं। हे अर्जुन, मैं सब भूतों में
उनके हृदय में स्थित आत्मा हूँ,
मैं
सृष्टि के अणु-अणु में व्याप्त हूँ,
मेरे
आत्मतत्व ने इस सृष्टि को धारण किया हुआ है।
आदित्यों में विष्णु
हूँ, अंशुमान में ज्योति
मरुतों में मरीच मैं, नक्षत्रों में
चन्द्रमा ।।21।।
मैं ही बारह आदित्यों में श्री हरि
विष्णु हूँ और ज्योतियों में पृथ्वी वासियों के लिए संसार को अपनी किरणों से
आलोकित करने वाला सूर्य मैं ही हूँ।
उन्चास
वायु देवताओं में वायु को जीवन देने वाली शक्ति मैं ही हूँ और नक्षत्रों में मैं
ही चन्द्रमा हूँ।
मैं ही बारह आदित्यों में विष्णु हूँ।
विष्णु का अर्थ है जो विश्व के अणु अणु में है। यहाँ भगवान बताते हैं मैं प्रकाश में विष्णु रूप में व्याप्त हूँ।
प्रकाश के प्रत्येक परमाणु में मैं स्थित हूँ.
उन्चास वायु देवताओं में मरीचि हूँ। यहाँ भगवान कह रहे हैं कि शरीर
में सभी प्रकार के वायु को नियंत्रित और जीवन देने वाला मरीचि नाम का मरुत मैं ही हूँ। सर्वाधिक महत्वपूर्ण मरीचि नामक
वायु का स्थान गले में विशुद्ध चक्र (कंठ स्थान) माना गया है। यह वायु
शरीर में व्याप्त सभी प्रकार की वायु को जीवन देता और संचालित करता है। इसे हम सभी प्राण वायु
के नाम से भी जानते हैं। यह मरीचि नाम का मरुत
उन्चास प्रकार के मूल स्वर और व्यंजनों को ध्वनि देता है। नक्षत्रों में मैं ही
चन्द्रमा हूँ। अज्ञान में भी जो ज्ञान है, जो बोध है वह मैं हूँ जैसे रात में
चन्द्रमा।
सामवेद हूँ वेद में, देवों में हूँ इन्द्र
सब इन्द्रिय मन जान
मोहि, भूतों में चैतन्य।।22
।।
वेदों में मैं सामवेद हूँ, यहाँ भगवान श्री कृष्ण कह रहे हैं कि ज्ञान में भी जो ज्ञान का
तत्त्व है जो ज्ञान की शांत अवस्था है वह वह मैं हूँ। देवताओं में मैं
इन्द्र हूँ अर्थात मैं ही सब देवताओं का परम देवता हूँ। मैं शरीर में स्थित
इन्द्रियों का स्वामी मन हूँ और समस्त प्राणियों में जो चैतन्य है जिसके कारण जीवन
है वह आत्मतत्व मैं ही हूँ।
रूद्रों में शिव शंकर
मैं हूँ, रक्ष यक्ष धन पाल
अग्नि जान मोहि अष्ट
वसु, पर्वत जान सुमेरु।।23।।
ग्यारह रुद्रों में मैं शिव शंकर हूँ, मैं शिव रूप में परम कल्याणकारी हूँ और
शंकर रूप में रूद्र होने से सबसे ज्यादा रुलाने वाला हूँ। यक्ष और राक्षसों में धन का स्वामी
कुबेर हूँ, संसार की सभी संपदा
का स्वामी होने से मेरी कृपा से ही धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है, सेवा एवम भोग का सुख मिलता है। मैं आठ वसुओं में पवित्र करने वाली
अग्नि हूँ। वसु उनको कहते है जो
स्थान देते है, जो प्राणी के लिए
आवश्यक है। यह आठ अग्नि, पृथ्वी, वायु, प्रभा, सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, अंतरिक्ष हैं। इनमें अग्नि को प्राणी के
लिए आवश्यक होने से उसे प्रमुख वसु माना है क्योकि शरीर में व्याप्त अग्नि ताप ही
प्राणों और जीवन को बनाए रखता है। वैदिक नियमानुसार अग्नि देवताओं को हवि देने का
माध्यम है, अग्नि परमात्मा का
मुख होने से भी इसे प्रमुख वसु कहा गया है। शिखरों में सुमेरु पर्वत हूँ। सुमेरु पर्वत एक काल्पनिक पर्वत है जो
सोने का है और बहुमूल्य रत्नों का भंडार है, यह पर्वत धरती से स्वर्ग से भी अधिक
उंचाइयों तक विराट है। इसे अपनी विभूति बताते हुए श्री कृष्ण कह रहे हैं कि विराट
सुन्दर ऐश्वर्य की कल्पना भी मैं हूँ।
मेरु
अथवा सुमेरु पर्वत हमारे शरीर में मेरुदंड से लेकर सर तक फैला है। यह अपने में
बुद्धि और चैतन्य रुपी खजानों से भरपूर है। यह अद्भुत पर्वत स्वयं श्री हरि हैं क्योकि यह सदा उस पर्वत में
विराजमान रहते हैं।
सकल पुरोहित बृहस्पति, जान मुझे हे पार्थ
स्कन्द जान सेना
प्रमुख, सागर सरों में जान।।24।।
अपने यजमान का हित करने वाले पुरोहितों
में मैं इस सृष्टि का सबसे श्रेष्ठ कर्मकांडी पुरोहित वृहस्पति हूँ। इस सृष्टि में
सेना का नेतृत्व करने और योद्धाओं में मैं
सबसे कुशल और सर्वश्रेष्ठ सेनापति कार्तिकेय हूँ और जलाशयों में अपार जलराशि का भण्डार समुद्र
हूँ।
भृगु हूँ मैं सब
ऋषियों में, अक्षर में हूँ शब्द
यज्ञों में जप जान
मोहि, अचलों में हिमवान।।25।।
महर्षियों में मैं महान तेजस्वी महर्षि भृगु
हूँ, वाणी में प्रणव
अर्थात ‘ऊँ‘ हूँ। सब यज्ञोंमें जप यज्ञ और स्थित रहने
वालों में एक जगह स्थापित
प्रकृति की अनुपम मूर्ती, सर्वाधिक जड़ स्वरुप हिमालय
हूँ।
पीपल हूँ सब वृक्ष
में, नारद हूँ देवर्षि
चित्ररथ, गन्धर्व में, कपिल जान सब सिद्ध।।26।।
सब वृक्षों में मैं पीपल का वृक्ष हूँ
अर्थात सृष्टि रूपी अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष मैं ही हूँ, देवर्षियों में सदा नारायण के चिंतन में
लगे रहने वाला नारद हूँ, सदा नारायण के चिंतन
में लगे रहने वाला मन नारद कहलाता है। गन्धर्वो में सृष्टि का सबसे उत्तम कोटि का संगीतकार प्रमुख गन्धर्व
चित्ररथ हूँ और सिद्धों में सांख्य ज्ञान देने वाला कपिल मुनि हूँ।
अश्वों में
उच्चैश्रवा ऐरावत हूँ हस्थि
सकल नरों के मध्य में, पार्थ नराधिप जान।।27।।
घोड़ों में अमृत के साथ उत्पन्न
उच्चैश्रवा अर्थात अमृत रुपी आत्मा के साथ उत्पन्न सबसे तेज गति वाला मन रुपी घोड़ा
मैं ही हूँ, हाथियों में परम
श्रेष्ठ हाथी ऐरावत हूँ। हाथी बल और जीव बुद्धि का प्रतीक है, हाथियों में ऐरावत सर्वाधिक बल और सर्वश्रेष्ठ जीव बुद्धि को रखता है, इस
कारण श्री भगवान का रहे है मैं जीव रूप मैं भी सबसे बली और सर्वश्रेष्ठ जीव बुद्धि
वाला हूँ और मनुष्यों में
प्रजापालक सर्वश्रेष्ठ राजा भी मैं ही हूँ।
मैं शस्त्रों में
वज्र हूँ, धेनुकाम हूँ धेनु
कामदेव हूँ प्रजन में, वासुकि हूँ में
सर्प।।28।।
मैं शस्त्रों में वज्र अर्थात सम्पूर्ण
सृष्टि का अचूक और सबसे शक्तिशाली हथियार हूँ, गौओं में सभी कामनाओं की पूर्ती करने
वाली गाय कामधेनु हूँ और पैदा करने वालों में श्रृंगार और प्रेम का देवता कामदेव
हूँ तथा सर्पों में सर्प राज वासुकी रूपी सर्पाकार कुण्डलिनी शक्ति हूँ।
नागों में अनन्त मैं, वरुण देव जलजीव
सब पितरन में अर्यमा, शासक में यमराज।।29।।
नागों में शेषनाग हूँ। शेषनाग वह शक्ति
है जो आत्मा को अपने में स्थान देती है। हमारा
मस्तिष्क और मेरुदंड सर्पाकार है, इसमें श्री विष्णु
निद्रावस्था में लेटे रहते हैं। श्री विष्णु
(आत्मतत्त्व) परम ज्ञान हैं जो सदा अक्रिय अवस्था में रहते हैं। चेतना के रूप में
वह सम्पूर्ण शरीर में
सर्वत्र व्याप्त हैं। सम्पूर्ण सेंट्रल नर्वस सिस्टम सर्पाकार है जहाँ ज्ञान सदा
रहता है, जो चेतना का कारण है।
हमारा मस्तिष्क नाग के फन के सामान है और
मेरुदंड का अन्त सिरा मूलाधार नाग की पूंछ है। जलचरों में उनका देवता वरूण हूँ. जल की तन मात्रा रस वरुण देव हैं। रस
के कारण ही जल प्यास बुझाता है और सभी प्रकार के अनाज, सब्जी,फल, दूध आदि को रसमय करता है। पितरों का सबसे पुरातन पिता अर्यमा और
उनका आशीर्वाद मैं ही हूँ और नियम और दण्ड से
शासन करने वालों में यमराज हूँ क्योंकि मैं ही धर्म हूँ।
दैत्यों में प्रहलाद
हूँ, गणकों में हूँ काल
पशुओं में मृगराज मैं, गरुड़ खगों में
पार्थ।।30।।
मैं दैत्यों में आत्मतत्व को प्राप्त
परम भक्त प्रहलाद हूँ, काल का भी काल अर्थात
समय का समय अर्थात प्रत्येक क्षण मैं हूँ, पशुओं में सिंह मैं हूँ, नरसिंह अवतार मेरा ही
स्वरूप है। पक्षियों में गरुड़ हूँ अर्थात मैं संसार के सभी जहरीले विषधर रुपी
बुराइयों को खा जाता हूँ और संसार को सुरक्षित रखता हूँ।
पावन कर्ता पवन में, शस्त्रवान में राम
सकल मीन में मकर मैं, सरिता गंगा जान।।31।।
मैं शीतलता देने वालों में वायु हूँ, वायु की तन मात्रा स्पर्श है वह मैं ही
हूँ. शस्त्र धारण करने
वालों में मैं राम हूँ, मछलियों में मकर हूँ। मकर ऐसा काल्पनिक जलीय प्राणी है जिसका
शरीर तो मछली का है किंतु सिर हाथी का है। मछली चंचलता का प्रतीक है और मकर चंचलता के
साथ विवेक बुद्धि का प्रतीक है। श्री भगवान यहाँ कह रहे हैं कि मैं विवेक बुद्धि
युक्त चंचलता हूँ. नदियों में पवित्र
नदी गंगा जी मैं ही हूँ। गंगा देव नदी कहलाती
है। यह देवत्व प्रदान करती है। यह तीन रास्तो में जाने के कारण त्रिपथ गामिनी है।
योगी जानते हैं कि यह गंगाजी हमारी इड़ा
नाड़ी है जिसे बायाँ अथवा चन्द्र स्वर कहते है। यह शीतल और शान्ति प्रदान करने वाला
स्वर है। नाक के बाएं स्वर से जो वायु जाती है वह शीतल और शान्ति प्रदान करने वाली
होती है। इसका जब सही प्रवाह होता है तो रजोगुण नष्ट होने लगता है और यह रजोगुण-यमुना(
पिगला नाड़ी) के रजोगुण को विलीन कर सतोगुण का द्वार खोलती है। तब सुषुम्ना नाड़ी
जिसे सरस्वती नदी कहते हैं जो अदृश्य है जाग्रत हो जाती है और दायाँ बायाँ स्वर
इकठ्ठा चलने लगते हैं। इस गंगा जी के लिए
श्री भगवान् कहते हैं मैं नदियों मैं गंगा हूँ जो अमृत (ज्ञान) का द्वार
खोलती है। इसलिए कहा गया है 'गंगे तव दर्शनात मुक्ति’।
आदि अन्त अरु मध्य
हूँ, सभी सर्ग का पार्थ
विद्या हूँ अध्यात्म
की, वाद हूँ विवाद ।।32।।
हे अर्जुन! इस सृष्टि का आदि अन्त और मध्य मैं ही
हूँ अर्थात सम्पूर्ण सृष्टि मुझसे जन्मती है, मुझमें स्थित रहती है और मुझमें ही लय
हो जाती है। मैं सृष्टि का बीज हूँ और सृष्टि का विस्तार भी मैं ही हूँ और यह जगत
मेरा ही रूप है। मैं विद्याओं में अध्यात्म विद्या हूँ जिससे जीव स्वभाव और आत्म
स्वभाव को जाना जाता है और परस्पर विवाद विषय में विवाद का तत्व मैं ही हूँ।
अक्षरों में अकार मैं, द्वन्द्व हूँ समास
अक्षय हूँ मैं काल
में, धाता मैं हि विराट।।33।।
मैं अक्षरों में अकार हूँ, सृष्टि अथवा जीवन सभी का प्रारम्भ मैं
हूँ, मैं ही ज्ञान का
प्रारम्भ हूँ। समास में द्वन्द्व नामक
समास हूँ, इस समास में दो पद
होते हैं तथा दोनों पदों की प्रधानता होती है. पाप-पुण्य, सीता-राम, ऊँच-नीच, राधा-कृष्ण अर्थात सभी कुछ मैं ही हूँ। मैं कभी नाश न होने वाला काल हूँ और
सृष्टि में भिन्न भिन्न मुखों से जीवों का धारण पोषण करने वाला भी मैं ही हूँ।
सर्वहरों में मृत्यु
हूँ और जनम का हेतु
कीर्ति वाक स्मृति
क्षमा, धृति श्री मेधा
नारि।।34।।
मैं सबका नाश करने वाली मृत्यु हूँ और
भविष्य का हेतु भी मैं ही हूँ, स्त्रियों में र्कीति, श्री, वाक, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा यह सात गुणों में मैं ही
हूँ अथवा इनको तू मुझसे ही उत्पन्न जान।
श्रुतियों में मैं
बृहत्साम हूँ, गायत्री में छन्द
मार्गषीर्ष सब माह
में, ऋतुओं में बसन्त।।35।।
गायन करने वाली श्रुतियों में मैं
बृहत्साम हूँ, भारद्वाज ऋषि ने
द्युस्थान (दिव्यलोक ) के धाता,
सूर्य, विष्णु और अग्नि देवता से ही बृहत्साम
का ज्ञान प्राप्त किया। ऋचाओं के आधार पर स्वर प्रधान ऐसा गायन जो मनको दिव्यता और
श्रेष्ठता और तेज की और स्वर-आलाप द्वारा ले जाता हो, 'बृहत्साम' कहा जाता है। छन्दों में गायत्री छन्द हूँ। ऋग्वेद के इस मंत्र में सूर्य-प्रकाश
अर्थात ज्ञान की उपासना है, गायत्री का मूल और
तत्त्व मंत्र ॐ है।
ॐकार अ, ऊ, म तीन पाद हैं और मात्रा रहित ॐकार
चौथा पाद है। यह चार पाद जाग्रत,
स्वप्नवत, सुसुप्त और अनिर्वचनीय हैं, अनिर्वचनीय पाद आत्मा कहा गया है।
अ-ब्रह्म का जागृत स्वरूप जगत है यह
वैश्वानर कहलाता है, यह जगत को रात्रि
दिन भोगता है। उ- स्वप्न के सामान
जो जगत में व्याप्त है वह ब्रह्म का दूसर पाद तैजस है। म- सुप्तवत जब कोई कामना नहीं होती न
कोई स्वप्न के सामान दृश्य होता है केवल ज्ञान रहता है। यह चैतन्य परब्रह्म जो आनन्द भोग का
भोक्ता है ब्रह्म का तीसरा पाद है।
मात्रा रहित ॐकार- जब बहार भीतर शून्य
हो जाता है, न कोई चिन्तन रहता है न शब्द रहता है, प्रपंच समाप्त हो जाते हैं, केवल शान्त, शिवम, अद्वितीय स्थिति रहती है। यहाँ आत्म ज्ञान होता है, यही ब्रह्म का चतुर्थ पाद है। महीनों में मैं मार्गशीर्ष माह हूँ। सत्ताइस
नक्षत्रों में से एक नक्षत्र मृगशिरा है, मार्गशीर्ष
मास की पूर्णिमा मृगशिरा नक्षत्र से युक्त होती है। इस कारण इस मास को मार्गशीर्ष मास कहा गया है। इस समय
चांदनी किसी भी रात्रि की तुलना में
सर्वाधिक दिव्य होती है। सम्पूर्ण प्रकृति
दिव्यता लिए होती है। ऋतुओं में फूलों को
अंकुरित करने वाला, जीवन देने वाला, जीवन में प्रेम भरने वाला ऋतुराज वसन्त
हूँ।
द्यूत जान मोहि
छलियों में सब, तेजस्विन में तेज
मैं जय, निश्चय सत्य हूँ, सात्विक नर का भाव।।36।।
मैं छल करने वालों में जुआ हूँ, तेजस्वी जो पुरुष हैं उनका तेज मैं ही
हूँ, जीतने वालों की विजय
हूँ, निश्चय करने वाले का
निश्चय हूँ और सात्विक पुरुषों का सत्त्व मैं ही हूँ।
यहाँ श्री कृष्ण बता रहे हैं कि मनुष्य
का जीवन पासे की तरह है जो कभी छह देता है कभी पांच कभी एक, जो निरंतर बदल रहा है, यह ताश के पत्तो की तरह रंग-बदरंग होता
है, निरंतर बदलता है। कभी
जीत है कभी हार है। जो और जिसके कारण हार जीत हो रही है, दुःख सुख हो रहे हैं, ऊँच नीच हो रही है, नित्य परिवर्तन हो रहा है वह मैं हूँ। हार-जीत
महसूस करते हुए और यह भी जानते हुए कि मैं छला जा रहा हूँ मैं बर्बाद हो रहा हूँ
जुआरी जुआ नहीं छोड़ता है। इसी प्रकार हम देखते
हैं मनुष्य निरंतर माया द्वारा छला जा रहा है, जो कुछ हो रहा है वह असत होते हुए सत
दिखाई देता है। देह निरंतर मृत्यु की
ओर जा रहा है फिर भी नाशवान देह और
सम्बन्धों से जुआरी की तरह हमें प्रबल आसक्ति होती है इसलिए सबसे बड़ा छल जुआ है जो
जीवन सत्य को उजागर करता है जो प्रतिपल घटित हो रहा है। इस कारण श्री भगवान् अपनी
दिव्य विभूतियों को बताते हुए कहते हैं कि मैं छल करने वालों में जुआ हूँ।
वृष्णीयों में
वासुदेव मैं, पाण्डव में हूँ पार्थ
मुनियों में हूँ
व्यास मैं, कवि में शुक्राचार्य।।37।।
वृष्णी वंशियों में
मैं वासुदेव पुत्र कृष्ण हूँ, पाण्डवों में मैं
पुरातन नर ऋषि का वर्तमान जीवात्मा जो अर्जुन रूप में मेरे समक्ष है मैं ही हूँ, मनन और चिंतन करने वालों में मैं जाग्रत
मुनि वेद व्यास और परम बुद्धिमानो में परम बुद्धिमान शुक्राचार्य भी मैं ही हूँ।
दमनवान का दण्ड मैं, जीतवान की नीति
गुहय भाव का मौन हूँ, ज्ञानी का हूँ
ज्ञान।।38।।
दमन करने वालों का दण्ड विधान और दण्ड
शक्ति मैं ही हूँ, जीतने की इच्छा वालों
की इच्छा शक्ति और तरीका मैं हूँ,
गुप्त
रखने वाली वस्तुओं में मैं मौन हूँ और ज्ञानवानों का तत्व ज्ञान (आत्मज्ञान) मैं
ही हूँ।
सकल भूत का बीज मैं
और बीज का बीज
पार्थ, चराचर भूत नहिं जो
मुझसे हो रिक्त।।39।।
हे अर्जुन! सब भूतों की उत्पत्ति का कारण मैं ही
हूँ अर्थात मैं बीजप्रद पिता हूँ जो इस प्रकृति में गर्भ स्थापित करता है, इस संसार में चर अचर कोई भी ऐसा नहीं है
जिसमें मैं नहीं हूँ और वह मुझमें नहीं है, मैं आत्मरूप में सृष्टि के प्रत्येक
परमाणु में स्थित हूँ। सृष्टि की कोई वस्तु कोई स्थान ऐसा नहीं है जहाँ आत्मतत्व
का विस्तार, आत्मतत्व (विशुद्ध
ज्ञान) की उपस्थिति न हो।
मेरी दिव्य विभूति का, अन्त नहीं है पार्थ
तेरे से संक्षेप में
कहा विभूति विस्तार ।।40।।
हे अर्जुन! मेरे योग ऐश्वर्य और विभूति का कोई अन्त
नहीं है, मेंने अपने दिव्य
विभूतियों को बहुत संक्षेप में तेरे लिए कहा है।
जो जो वस्तु विभूतिमय, शक्ति कान्तिमय पार्थ
अल्प अंश मम तेज से, उसका उद्भव जान।।41।।
हे अर्जुन! तू यह जान ले कि इस सृष्टि
में जो भी विभूति युक्त, कान्ति युक्त और
शक्ति युक्त वस्तु है वह सब मेरे आत्म तेज के एक अंश की अभिव्यक्ति है अर्थात
परमात्मा के एक अंश मात्र ने सृष्टि के कण कण को व्याप्त किया हुआ है, सृष्टि का प्रत्येक कण परमात्मा को
भासित करता है।
क्या करेगा जानकर, बहुत जानकर बात
स्थित मैं धारण जगत, एक अंश सुन पार्थ।।42।।
श्री भगवान कहते हैं मेरी विभूतियों का
अन्त नहीं है, मुझ अव्यक्त परमात्मा
के एक अंश परा प्रकृति ने सम्पूर्ण जगत को धारण किया है। विश्व के कण कण में मैं
आत्म रूप में स्थित हूँ, सभी विभूति मेरा ही
विस्तार हैं। चर अचर में मैं ही व्याप्त हूँ। सबका कारण भी मैं ही परमात्मा हूँ।
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