हे अर्जुन, तू निश्चयपूर्वक जान ले कि इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला वास्तव में कुछ भी नहीं है.
वसंतेश्वरी भगवद्गीता - प्रो बसन्त प्रभात जोशी
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चौथा अध्याय-ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
इस अविनाशी योग को
कहा प्रथम मैं सूर्य
सूर्य कहा मनु से इसे, मनु इक्ष्वाकु बताय।।1।।
श्री भगवान अर्जुन को तत्त्व ज्ञान समझाते हुए कहते हैं:-
मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा
था। सूर्य ज्ञान का प्रतीक है। श्री भगवान ने यहाँ बताया है कि पृथ्वी की उत्पत्ति
से पहले भी मैंने इस योग को अनेक ज्ञानियों को दिया था। ऋषि कश्यप और माता अदिति
के बारह पुत्रों में एक श्री विष्णु और दूसरे
सूर्य माने जाते हैं। विष्णु जी द्वारा
अपने भाई सूर्य आदि को दिया ज्ञान का
सन्दर्भ भी श्री कृष्ण द्वारा यहाँ दिया जा रहा है। उन ज्ञानियों ने इसे वैवस्वत मनु को
दिया और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा।
परम्परागत प्राप्त यह, इसे राज ऋषि जान
लुप्त हो गया योग धरा
से, दीर्घ काल बलवान।।2।।
इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को
राजर्षियों ने जाना, यह योग बहुत समय से
इस पृथ्वी से लुप्त हो गया था।
पुरा योग वर्णित किया, भक्त सखा प्रिय जान
अति रहस्य उत्तम परम, हे अर्जुन तू जान।।3।।
तुझे अपना प्रिय सखा व भक्त जान कर ही
मैंने यह पुरातन योग का वर्णन किया है। यह योग परम गोपनीय तथा अत्यन्त उत्तम है। केवल तत्व के जिज्ञासु के लिए ही यह जानने योग्य है तथा निश्चय ही
कल्याणकारी होने से उत्तम है।
सूर्य पुरातन काल से, प्रभु जन्मे इह काल
कैसे मानू कथन को, कही पुरा यह बात।।4।।
अर्जुन बोला:- अपका जन्म तो अभी हाल का
है तथा सूर्य का जन्म बहुत प्राचीन है। इस बात का मैं कैसे विश्वास करूं कि आप ने ही
आदिकाल में सूर्य से यह योग कहा था।
तेरे मेरे जन्म बहु, हुए अनेकों बार
मैं जानू सब जन्म को, तू नहिं जाने हाल।।5।।
श्री भगवान बोले:- हे अर्जुन! तेरे और मेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं, उन सबको मैं जानता हूँ परन्तु तू उनको
नहीं जानता है।
मैं अविनाशी अज प्रभु, सब देहिन का ईश
अपनी माया से प्रकट, कर निज प्रकृति
अधीन।।6।।
यद्यपि मैं अजन्मा और नाश रहित हूँ तथा
समस्त प्राणियों का ईश्वर हूँ फिर भी अपनी प्रकृति को अपने आधीन करके अपनी योग
माया से प्रकट होता हूँ। अजन्मा व निराकार होने पर भी जगत के उपकार के लिए
लीला हेतु अपनी योग शक्ति से माया द्वारा रचित साकार शरीर बना लेता हूँ। माया हमेशा
ईश्वर के आधीन है जबकि जीव, माया (प्रकृति) के आधीन है क्योंकि जीव अपना
स्वरूप भूला रहता है। नित्य शुद्ध आत्मरत पुरुष जो पूर्ण ज्ञान में स्थित है को
प्रकृति भ्रम में नहीं डाल पाती अतः उसका जन्म व कार्य स्वयं की इच्छा पर निर्भर
करते हैं।
धर्म की जब हानि होती अरु अधर्म की वृद्धि बहु
योग माया से सदा ही, स्वयं को रचता
स्वयं।।7।।
जब जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की
वृद्धि होती है तब मैं तब अपने स्वरूप को रचकर अवतार लेता हूँ। धर्म का अर्थ है आत्मा
का स्वभाव। आत्मा का स्वभाव है ज्ञान। जहां ज्ञान है वहां आनन्द है, वहाँ शान्ति है, वहीं कल्याण है। इसके विपरीत जहाँ अधर्म
है वहाँ अज्ञान है, मूढ़ता है, क्लेश है, अशान्ति है। जब जब घोर अशान्ति, क्लेश, मूढ़ता का बोलबाला बढ़ जाता है तब तब
पुनः आत्मा के स्वभाव को स्थापित करने अर्थात शान्ति, आनन्द, ज्ञान की स्थापना के लिए मैं जन्म लेता हूँ।
इसको तू इस प्रकार भी जान, अत्याधिक रजोगुण व
तमोगुण की जब वृद्धि हो जाती है तो ज्ञान लुप्त हो जाता है। दम्भ, दर्प, पाखंड, अनाचार, व्याभिचार उपस्थित हो जाते हैं अतः सत्त्व, रज, तम गुणों को पुनः समरूप में स्थापित
करने के लिए, मैं अवतार लेता हूँ।
साधु के उद्धार को और
दुष्ट के संहार को
धर्म के उत्थान को, हर युग में आता मैं
स्वयं ।।8।।
सज्जन पुरुषों की रक्षा के लिए तथा घोर
अधर्म रत पाप बुद्धि जिनका तमोगुण मिश्रित रजोगुण अत्याधिक बड़ा हुआ है के विनाश के
लिए और पुनः धर्म की स्थापना के लिए (अर्थात तीनों गुण स्वाभाविक रूप से संसार के
व्यवहार में स्थापित हो जायें तथा सतोगुणी बुद्धि पुनः प्रभावशाली हो जाय) जन्म
लेता हूँ।
दिव्य अलौकिक जन्म मम, दिव्य अलौकिक कर्म
जान देह को त्याग कर, फिर से होय न जन्म।।9।।
मेरे जन्म व कर्म दिव्य और अलौकिक हैं
अर्थात अजन्मा होकर भी में जन्म लेता हूँ, अक्रिय होकर भी कर्म करता हूँ। जो
मनुष्य मेरे जन्म व कर्म के रहस्य को जानते हैं वह शरीर त्याग कर पुनः जन्म और
मृत्यु को प्राप्त नहीं होते बल्कि मुझ (आत्म स्थिति) को प्राप्त होते हैं।
तृष्णा त्यागी जिन
भक्तों ने हुआ क्रोध भय नष्ट
पूत ज्ञान तप आश्रित
मेरे, भक्त हुए मम रूप।।10।।
जिनका राग, भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गया है, जिनका मन मुझमें लगा है, वे मेरे भक्त जो मुझमें ही आश्रित हैं, ज्ञान तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप (आत्म स्वरूप) को प्राप्त हो जाते हैं। उनमें मुझमें कुछ भी भिन्नता नहीं
रहती है।
जो मुझको जेहि भजत
हैं, सदा भजूं तेहि भांति
पार्थ जान अनुसरत मम, देही सभी प्रकार।।11।।
जो मनुष्य मुझे जिस प्रकार; जिस
भावना से भजते हैं मैं उसी भावना से उनको फल
देता हूँ। सभी मनुष्य सभी प्रकार से
मेरे
ही मार्ग का अनुसरण करते हैं। नाना देवी देवताओं की उपासना भिन्न भिन्न धर्म सम्प्रदायों का
अनुसरण मेरा ही भजन है। ज्ञान के अभावमें
बुद्धि भेद करती है।
कर्म फल को चाहते जो, देव यजन करते यहां
शीघ्र फल को प्राप्त
कर, मगन में फल के सदा।।12।।
इस संसार में कर्म फल को चाहने वाले
मनुष्य देवताओं का पूजन करते हैं। जिसकी
जो इच्छा होती है वह देव पूजन से पूर्ण हो जाती है, पर वह पूर्ण हुयी इच्छा उनके कर्म फल के स्वरूप ही होती है। कर्म के सिवाय देने
वाला अन्य कोई नहीं है। जैसा कर्म वैसा
फल अर्थात संसार में कर्म से ही फल प्राप्ति होती है, जैसा बीज होगा या जिस प्रकृति का बीज
होगा वैसी फसल होगी। इसी प्रकार
जिस मनुष्य की पूजन सम्बन्धी जैसी भावना होती है वैसा फल उसे मिलता है।
गुण कर्म विभाग से, रचे चार मैं वर्ण
उनका कर्ता पर अकर्ता, मुझ अव्यय को जान।।13।।
इसी बात के आधार पर गुण कर्म के
विभागानुसार चार वर्णों को मैंने (मेरी परा
प्रकृति ने) उत्पन्न किया है। मनुष्य के द्वारा होने वाले कार्य चार प्रकार के होते हैं।
1- सत्त्व की प्रधानता, रज, तम गौण - ब्राह्मण
2- रज की प्रधानता, सत्त्व मध्यम और तम अल्प - क्षत्रिय
3- रजोगुण मध्यम, तम मध्यम, सत्त्व अल्प – वैश्य
4- तम की प्रधानता, रज मध्यम, सत्त्व अल्प – शूद्र
जिनमें सत्त्व की प्रधानता होती है
जिन्हें ब्राह्मण कहा गया है, वह ज्ञान की ओर लालायित रहते हैं । ईश्वर
भक्त, सरल होते हैं । रज की प्रधानता, सत्त्व मध्यम और तम अल्प क्षत्रियों की
विशेषता है यह वीर सैनानी
प्रजापालक, समाज की रक्षा करने
वाले होते हैं। इन्हें क्षत्रिय
कहा है। रजोगुण मध्यम, तम मध्यम, सत्त्व अल्प कृषि, पशुपालन, व्यापार करने वाले हैं। यह धन के प्रति लालायित रहते हैं, इन्हें वैश्य कहा है। स्वार्थ व लालच की प्रधानता होती है। तम की प्रधानता, रज मध्यम, सत्त्व अल्प, मोटी बुद्धि के सेवा करने वाले मजदूर आदि
होते हैं, इन्हें शूद्र कहा है। प्रत्येक समाज में कार्य भेद के
अनुसार चार वर्ण अवश्य मिलते हैं। यह सत्त्व, रज, तम के प्रभाव के कारण होते हैं और सत्त्व, रज, तम का मिश्रण ही इनके अलग अलग परिस्थिति
और परिवारों में जन्म लेने का कारण है। वास्तव में सब एक होते हुए भी कर्म फल के अनुसार स्वभाव वश भिन्न
भिन्न वर्णों में उत्पन्न होते हैं। इन सबका
कर्ता होने पर भी मुझ अविनाशी को अकर्ता जान
क्योंकि प्रकृति के कारण ही यह रचना हुयी है।
कर्म फल इच्छा नहीं
है, कर्म मुझमें लिप्त
नहिं
तत्व मेरा जानता जो, कर्म में बंधता
नहीं।।14।।
यह वर्ण भेद यद्यपि मेरी सत्ता द्वारा
हुआ है, परन्तु मेरे (आत्मा) द्वारा नहीं किया गया है क्योंकि कर्मो में
मेरी स्पृहा नहीं है इसलिये मुझे कर्म
लिप्त नहीं करते हैं। इस प्रकार जो आत्मतत्व (मुझे) को जान लेता है वह कर्मो में
नहीं बंधता है।
मोक्ष के इच्छुक
परमजन, पूर्व में रत कर्म के
पूर्वजों के भांति तू
भी, पूर्वतर कर ले करम।।15।।
पूर्व काल में मुमुक्ष जनों ने भी इस
प्रकार जान कर कर्म किये हैं। अपने को दृष्टा
मान सभी कर्म सकाम पुरुषों की तरह उन
मुमुक्ष
जनों द्वारा किये गये। अतः हे अर्जुन! तू
भी पूर्वजों की भांति सदा किये जाने
वाले कर्मो को कर।
कर्म क्या अकर्म क्या, धी पुरूष मोह में
कर्म तत्व जानकर, अशुभ मोक्ष हो सदा।।16।।
कर्म क्या है, अकर्म क्या है? इसका निर्णय करने में बड़े बड़े बु़द्धिमान पुरुष भी भ्रम में पड़ जाते
हैं फिर साधारण मनुष्यों की तो बात ही क्या है।
अतः मैं तुझे कर्म तत्व को भलीभांति बताता हूँ
जिसे जानकर तू अशुभ से अर्थात कर्म बन्धन से मुक्त हो जायेगा।
कर्म को तू जान ले, अकर्म को तू जान ले
विकर्म रूप जान ले, गहन गति है कर्म की।।17।।
श्री भगवान कहते हैं कर्म को जानना
चाहिये अकर्म को जानना चाहिये और विकर्म को
जानना चाहिये। कर्म क्या है? ईश्वर ने जीवों के कर्म के अनुसार सृष्टि की रचना
करने का जो संकल्प किया उसका नाम कर्म
है। कर्महीनता अकर्म है और निषिद्ध कर्म ही
विकर्म है। स्वभाव के विपरीत कर्म भी, विकर्म
ही हैं। इसको अच्छी प्रकार जान
लेना चाहिए क्योंकि कर्म की गति अत्याधिक सूक्ष्म
है और उसे समझना बहुत कठिन है।
विज्ञ है जो देखता, योगी सकल कर्म कृत
कर्म में अकर्म को, अकर्म में जो कर्म
को।।18।।
जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है और अकर्म में कर्म देखता है; समस्त कर्म करता हुआ साक्षी भाव
से तटस्थ रहता है, कर्म तथा उनके फलों में
आसक्त नहीं होता है, उनको त्यागते हुए भोगता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और समस्त
कर्मों को करने वाला अकर्ता पुरुष
है।
बिना काम संकल्प के
जिसके हों सब कर्म
कर्म भस्म हो ज्ञान
अग्नि में
सो जन ज्ञानी जान।।19।।
जिसके सम्पूर्ण कर्म बिना किसी कामना और
संकल्प के होते हैं, जिस प्रकार अग्नि में
सब कुछ भस्म हो जाता है, उसी प्रकार ज्ञान अग्नि में जिसके कर्म भस्म हो गये हैं
ऐसा मनुष्य वास्तव में ब्रह्मज्ञानी है।
कर्म फलों को त्यागकर, निराश्रय जो विज्ञ
सदा कर्म में रत हुआ, नित्य अकर्ता तृप्त।।20।।
जिसने कर्म फल में आसक्ति का त्याग कर
दिया है तथा जो शरीर के प्रति उदासीन
हो गया है, जो नित्य तृप्त है; आत्मा में संतुष्ट है, वह सभी कर्मों को करता हुआ वास्तव में कुछ नहीं करता है।
छोड़ कामना, भोग सब, जो विजयी है चित्त
करे कर्म सब देह से, पाप न व्यापे पार्थ।।21।।
जिसने आशा को छोड़ दिया है, जिसका चित्त निरन्तर आत्मा में स्थित
हैं जिसने समस्त भोग सामग्री का परित्याग कर दिया है, केवल शरीर सम्बन्धी कर्म करता है अर्थात
शरीर से कार्य करता हुआ भी सदैव आत्म रूप
में स्थित रहता है, वह पाप को प्राप्त नहीं
होता और कर्म बन्धन में नहीं फंसता है।
द्वन्द्व ईर्ष्या से
विमुख, स्वतः प्राप्त संतोष
सिद्धि असिद्धि समान
जो, नहिं बधे रत कर्म।।22।।
जो पुरुष बिना इच्छा के जो मिल जाय, उसमें संतुष्ट रहता है, जिसमें दूसरे के
प्रति ईर्ष्या का भाव समाप्त हो गया है, जो
सुख दुख में, हर्ष व शोक से रहित
होकर उदासीन हो गया है, सिद्धि और असिद्धि में
समान रहने वाला है। काम सफल हो तो ठीक असफलता मिले तो ठीक, इस प्रकार सम रहते हुए कर्म करता हुआ
कर्म में नहीं बंधता है।
तृष्णा त्यागी, ममता त्यागी, चित्त ज्ञान रत है
जिसका
प्रभु निमित्त वह
कर्म रत, कर्म सिद्ध हो जाय ।।23।।
जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गयी है। गुण युक्त होने पर भी जो निर्गुण हो गया है, जो सदैव मुक्त है, जिसका चित्त सदैव आत्म ज्ञान में स्थित
है, केवल स्वाभाविक कर्म
करता है; के समस्त कर्म स्वयं
ही समाप्त हो जाते हैं और वह कर्म बन्धन से मुक्त हो जाता है।
ब्रह्म अर्पण ब्रह्म
हवि, अग्नि आहुति ब्रह्म
है
स्थित योगी ब्रह्म
कर्म में, हेतु उसका ब्रह्म
है।।24।।
अर्पण ही ब्रह्म है, हवि ब्रह्म है, अग्नि ब्रह्म है, आहुति ब्रह्म है, कर्म रूपी समाधि भी
ब्रह्म है और जिसे प्राप्त किया जाना है वह भी ब्रह्म ही है। यज्ञ परब्रह्म स्वरूप
माना गया है। इस सृष्टि से हमें जो भी प्राप्त है, जिसे अर्पण किया जा रहा है, जिसके द्वारा हो रहा है, वह सब ब्रह्म स्वरूप है। सृष्टि
का कण कण, प्रत्येक क्रिया में
जो ब्रह्म भाव रखता है वह ब्रह्म को ही पाता है अर्थात ब्रह्म स्वरूप हो जाता है ।
कुछ योगी अस यज्ञ से, देव उपासे नित्य
ब्रह्म अग्नि में ज्ञानिजन, यज्ञ यज्ञ हवि देत।।25।।
कर्म योगी देव यज्ञ का अनुष्ठान करते
हैं तथा अन्य ज्ञान योगी ब्रह्म अग्नि में यज्ञ द्वारा यज्ञ का हवन करते हैं। देव
पूजन उसे कहते हैं जिसमें योग द्वारा अधिदैव को जानने का प्रयास किया जाता है। कई
योगी ब्रह्म अग्नि में आत्मा को आत्मा में हवन करते हैं अर्थात अधियज्ञ का पूजन
करते हैं।
रोक विषय सब इन्द्रियां, संयम अग्नि जलाय
अपर, शब्द, विषय रस, इन्द्रिय अग्नि
जलाय।।26।।
कई योगी इन्द्रियों के विषयों को रोककर
अर्थात इन्द्रियों को संयमित कर हवन करते हैं, अन्य योगी शब्दादि विषयों को इन्द्रिय
रूप अग्नि में हवन करते है। वे इन्द्रिय विषयों को रोककर हवन करते है।
कुछ रोकें इन्द्रिय
क्रिया, अपर प्राण का कर्म
ज्ञान प्रकाशित संयमित, योग अगिन का संग।।27।।
अन्य कई योगी सभी इन्द्रियों की
क्रियाओं एवं प्राण क्रियाओं को एक करते हैं। इन सभी वृत्तियों को करने से ज्ञान
प्रकट होता है ज्ञान के द्वारा आत्म संयम योगाग्नि प्रज्वलित कर सम्पूर्ण विषयों की
आहुति देते हुए वह योगी आत्म यज्ञ करते हैं।
द्रव्य यज्ञ, तप यज्ञ, योग यज्ञ नित्य रत
तीक्ष्ण वृती यत्नशील, स्वाध्याय यज्ञ को
करें।।28।।
इस प्रकार भिन्न भिन्न योगी द्रव्य यज्ञ
तप यज्ञ तथा दूसरे योग यज्ञ करने वाले है और कई तीक्ष्णव्रती होकर योग करते हैं। ये शब्द में शब्द का हवन करते है। इस प्रकार यह सभी कुशल और यत्नशील योगाभ्यासी पुरुष
जीव बुद्धि का आत्म स्वरूप में हवन करते हैं।
द्रव्य यज्ञ- इस सृष्टि से जो कुछ भी
हमें प्राप्त है उसे ईश्वर को अर्पित कर ग्रहण करना।
तप यज्ञ- जप कहाँ से हो रहा है इसे
देखना तप यज्ञ है।
योग यज्ञ- प्रत्येक कर्म को ईश्वर के
लिए कर्म समझ कर निपुणता से करना योग यज्ञ है।
तीक्ष्ण वृती- यम नियम संयम आदि कठोर
शारीरिक और मानसिक क्रियाओं द्वारा मन को निग्रह करने का प्रयास. यह शम, दम, उपरति, तितीक्षा, समाधान और श्रद्धा हैं।
मन को संसार से रोकना शम है।
बाह्य इन्द्रियों को रोकना दम है.
निवृत्त की गयी इन्द्रियों भटकने न देना
उपरति है।
सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख, हानि-लाभ, मान अपमान को शरीर धर्म मानकर सरलता से
सह लेना तितीक्षा है।
रोके हुए मन को आत्म चिन्तन में लगाना
समाधान है।
हवि अपान में प्राण
को, प्राण में अपान
रुद्ध प्राणगति योगी सो, प्राण प्राण हवि देत ।।29।।
कई योगी अपान वायु में प्राण वायु का
हवन करते हैं तथा कई प्राण वायु में अपान वायु का हवन करते हैं। कई दोनों प्रकार की
वायु, प्राण और अपान को
रोककर प्राणों को प्राण में हवन करते हैं।
यज्ञ विद यज्ञ से, नाश करें पाप का
हवें प्राण प्राण में, नियताहारी यज्ञ विद।।
30।।
कई सब प्रकार के आहार को जीतकर अर्थात
नियमित आहार करने वाले प्राण वायु में
प्राण
वायु का हवन करते हैं। इस प्रकार यज्ञों द्वारा काम क्रोध एवं अज्ञान रूपी पाप का
नाश करने वाले सभी; यज्ञ को जानने वाले
हैं। ये ज्ञान से परमात्मा को जान लेते हैं।
यज्ञ से बचे हुए, अमृत भोग जो करें
अनादि ब्रह्म प्राप्त
वो, पार्थ तू ये जान ले
परम पुनीत यज्ञ को, जो मनुष्य नहीं करें
इह लोक में सुखी नहीं, परलोक कैसा होएगा।।31।।
यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करने
वाले पर ब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं अर्थात यज्ञ क्रिया के परिणाम स्वरूप
जो बचता है वह ज्ञान ब्रह्म स्वरूप है। इस ज्ञान रूपी अमृत को पीकर वह योगी तृप्त
और आत्म स्थित हो जाते हैं परन्तु जो यज्ञाचरण नहीं करते उनको न इस लोक में कुछ
हाथ लगता है न परलोक में।
बहु प्रकार के यज्ञ
यह, वाणी वेद बखान
कर्म क्रिया सम्पन्न
सब, जान मुक्त हो जाय।।32।।
इस प्रकार बहुत प्रकार की यज्ञ विधियां
वेद में कही हैं। तू यह जान ले कि यह यज्ञ विधियां कर्म से ही उत्पन्न होती हैं।
इस बात को जानकर कर्म की बाधा से तू मुक्त हो जायेगा।
पार्थ द्रव्यमय यज्ञ
से, ज्ञान यज्ञ अति
श्रेष्ठ
सकल कर्म इस विश्व के, ज्ञानहिं होत
समाप्त।।33।।
हे अर्जुन! द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञान यज्ञ
अत्यन्त श्रेष्ठ है। द्रव्यमय यज्ञ सकाम यज्ञ हैं और अधिक से अधिक स्वर्ग को देने वाले
हैं परन्तु ज्ञान यज्ञ द्वारा योगी कर्म बन्धन से छुटकारा पा जाता है और परम गति
को प्राप्त होता है। प्रिय अर्जुन तू यह जान ले कि सभी कर्म ज्ञान में समाप्त हो
जाते हैं। ज्ञान से ही आत्म तृप्ति होती है और कोई कर्म अवशेष नहीं रहता है।
श्रद्धा विनय सम्पन्न
हो, करे प्रश्न जब ज्ञानि
तत्व ज्ञान तब देयंगे, पार्थ ज्ञान को जान।।34।।
हे अर्जुन! उस परम तत्व को जानने के लिए आत्मज्ञान की
जिज्ञासा के साथ तुझे ब्रह्मनिष्ठ संतो के पास जाना होगा, उनकी सेवा करनी होगी उन्हें श्रद्धा
विनयसे प्रणाम कर प्रसन्न करना होगा। वह सरलता पूर्वक प्रश्न करने पर परम ज्ञान को
जानने वाले महात्मा तुझे उस तत्व ज्ञान जिसे ब्रह्मज्ञान
या आत्मज्ञान कहते हैं, का उपदेश देंगे।
नहीं पार्थ फिर मोह
को, ज्ञान तत्व को जान
तू सब में तुझमें सभी, सब मुझमें तू जान।।35।।
उन सतपुरुषों से ज्ञान को जानकर तू इस
प्रकार मोह को प्राप्त नहीं होगा और तू निसंशय होकर पहले अपने में शुद्ध आत्म रूप को
फिर सम्पूर्ण भूतों में शुद्ध आत्म स्वरूप को देखेगा।
यदि पापी सबसे बड़ा, तो भी ऐसा जान
ज्ञान नाव चढि पार हो, पाप सिंधु बलवान।।36।।
यदि तू पापियों से भी अधिक पाप करने
वाला है, तो भी इस ज्ञान के
प्रभाव से सम्पूर्ण पाप समुद्र से उसी प्रकार पार हो जायेगा जैसे नौका समुद्र को
पार कर जाती है।
ज्वलित अग्नि जस भस्म
कर, सकल काष्ठ हे पार्थ
ज्ञान अग्नि तस भस्म
कर, सकल कर्म हो ज्ञात।।37।।
तू इसे इस प्रकार भी जान ले कि जैसे प्रज्ज्वलित
अग्नि सभी काष्ठ को भस्म कर देती है उसी प्रकार ज्ञानाग्नि सभी कर्म फलों को, उनकी आसक्ति को भस्म कर देती है।
परम पुनीत ज्ञान है, नहिं पवित्र कुछ
ज्ञान
दीर्घ योग सिद्धि से, आत्म आत्म में
प्राप्त।।38।।
हे अर्जुन! तू निश्चयपूर्वक जान ले कि इस संसार में
ज्ञान के समान पवित्र करने वाला वास्तव में कुछ भी नहीं है क्योंकि जल, अग्नि आदि से यदि
किसी मनुष्य अथवा वस्तु को पवित्र किया जाय तो वह शुद्धता और पवित्रता थोड़े समय
के लिए ही होती है, जबकि ज्ञान से जो
मनुष्य पवित्र हो जाय वह पवित्रता सदैव के लिए हो जाती है। ज्ञान ही अमृत है और इस
ज्ञान को लम्बे समय तक योगाभ्यासी पुरुष अपने आप अपनी आत्मा में प्राप्त करता है
क्योंकि आत्मा ही अक्षय ज्ञान का श्रोत है।
इन्द्रिय जयी ज्ञान
को पाता, साधक श्रद्धावान
ज्ञान प्राप्त कर
तुरत ही, परम शान्ति सोपान।।39।
जिसने अपनी इन्द्रियों का वश में कर
लिया है तथा निरन्तर उन्हें वश में रखता है, जो निरन्तर आत्म ज्ञान में तथा उसके उपायों
में श्रद्धा रखता है, जिसकी ज्ञान में
श्रृद्धा है जो ज्ञान के लिए लालायित रहता है, उसकी खोज करता है, इसी जिज्ञासा के साथ शास्त्र को टटोलता
है, गुरु, संत से जिज्ञासा करता है और निरंतर मनन चिंतन करता है उसके अन्दर
ज्ञान स्वतः ही आते जाता है और ज्ञान की लालसा
बड़ने के साथ ज्ञान का अवतरण स्वाभाविक रूप से होता जाता है। ऐसा मनुष्य उस अक्षय
ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होते ही परम शान्ति को प्राप्त
होता है। ज्ञान प्राप्त होने के बाद उसका मन नहीं भटकता, इन्द्रियों के विषय उसे आकर्षित नहीं करते, लोभ मोह से वह दूर हो जाता है तथा
निरन्तर ज्ञान की पूर्णता में रमता हुआ आनन्द को प्राप्त होता है।
अज्ञ, अश्रद्धा युक्त जो, संशय से पथ भ्रष्ट
ऐसे को है सुख नहीं, नहीं लोक परलोक।।40।।
जो मनुष्य ज्ञान हीन है और जिस मनुष्य को
ज्ञान के प्रति श्रद्धा नहीं है,
न
ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा रखता है,
संशयग्रस्त
ऐसा मनुष्य परमार्थ से भ्रष्ट हो जाता है। जिस मनुष्य में ज्ञान नहीं, अज्ञानरूपी अन्धकार ने जिसे जकड़ लिया
है, जो संशय मन वाला है
उसे न इस संसार में सुख मिलता है न परलोक में सुख मिलता है।
कर्म सन्यास योग से, ज्ञान से संशय कटे
वश में जिसके चित्त
है, पार्थ कर्म नहिं लिप्त।।41।।
हे अर्जुन! जिसने योग और सन्यास से सभी
कर्म बन्धन से छुटकारा पा लिया है,
जिसके
सभी कर्म ईश्वर के निमित्त हैं, जिसने ज्ञान रूपी
तलवार से समस्त संशयों का काट डाला है,
जिसका
अन्तःकरण उसके वश में है उसे कर्म बन्धन नहीं बांधते हैं।
ज्ञान की तलवार से मन
अज्ञान संशय काट दे
योग में स्थित हुआ, रण के लिए तू हो
खड़ा।।42।।
अतः हे अर्जुन! तू मन में रहने वाले इस अज्ञान से
उत्पन्न संशय को ज्ञान रूपी तलवार से काट कर समभाव से कर्म करता हुआ आत्म स्थित हो
जा और युद्ध के लिए खड़ा हो।
..................................
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