Tuesday, August 23, 2011

दूसरा अध्याय-सांख्ययोग


क्रोध से सम्मोह पैदा होता है अर्थात बुद्धि सम्मोहित होकर अविचार उत्पन्न कर देती है। सम्मोह से स्मृति नष्ट हो जाती है। स्मृति नष्ट होने से बुद्धि का नाश हो जाता है और जिसकी बुद्धि का नाश हो जाय वह अपनी स्वरुप स्थिति को कभी भी प्राप्त नहीं कर सकता और जिस स्थिति को उसने प्राप्त भी किया है उससे गिर जाता है।
           

                                   वसंतेश्वरी भगवद्गीता - प्रो बसंत प्रभात जोशी
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                                     दूसरा अध्याय-सांख्ययोग

करुण दशा रोते हुए शोकाकुल अकुलान
अर्जुन के प्रति दयावश बोले श्री भगवान ।।1।।

संजय बोले- हे राजन्! युद्ध भूमि में करुणा से भरा हुआ जिसके आंखों से आंसू बह रहे थे व्याकुल नेत्र वाला, विषाद युक्त अर्जुन के प्रति मंद मंद मुस्कराते हुए श्री भगवान बोले।

विषम समय में कैसे व्यापा, मोह तुझे किस हेतु से
श्रेष्ठ पुरुष आचरण नहीं है, देता स्वर्ग न कीर्ति यह।।2।।

हे अर्जुन! तुझे यह असमय में मोह किस कारण से व्याप्त हो गया है क्योंकि इस प्रकार मोह जनित होकर कर्तव्य कर्म को छोड़ना न तो श्रेष्ठ पुरुषों का आचरण है, न स्वर्ग देने वाला है और न यश को बढ़ाने वाला है।

क्लैव्यता मत प्राप्त कर तू, यह नहीं तेरे लिए
त्याग कर दुर्बल हृदय को, उठ खड़ा संग्राम कर।।3।।

हे अर्जुन! तू क्लैव्यता (एक प्रकार की दिमागी नपुंसकता) को प्राप्त मत हो, यह बिल्कुल भी उचित नहीं है। हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर तू युद्ध के लिए खड़ा हो जा।

द्रोण, भीष्म पूज्य हैं, हे कृष्ण वे मेरे लिए
युद्ध में कैसे उन्हीं पर, बाण संचालन करूं।।4।।

हे श्रीकृष्ण! मैं इस युद्ध भूमि में अपने पितामह भीष्म, अपने गुरू द्रोणाचार्य के प्रति कैसे युद्ध करूं। यह दोनों श्रेष्ठ पुरुष मेरे अति पूज्यनीय हैं।

भिक्षान्न उपयुक्त है, गुरूजन रहें सप्राण
रुधिर भोग मोहि ना रुचे, कर गुरूजन निष्प्राण।।5।।

इन परम श्रेष्ठ गुरूजनों को न मारकर इस संसार में भिक्षा मांगकर अन्न खाना ज्यादा अच्छा है और इन गुरूजनों को मारकर इस संसार में खून से लथपथ धन सम्पदा राज्य और भोगों को ही मैं भोगूंगा ।

देखा धातृराष्ट्रों को, बोला हे भगवान
यह नहिं जानत युद्ध में, को है अति बलवान
यह भी मैं नहीं जानता को जीतेगा युद्ध
नहिं चाहूं इस देह को स्वजनों को ही मार।।6।।

मैं यह भी नहीं जानता कि मेरे लिए युद्ध करना श्रेष्ठ है अथवा युद्ध न करना श्रेष्ठ है, मैं यह भी नहीँ  जानता कि हम युद्ध जीतेंगे या कौरव युद्ध जीतेंगे। जिनको मारकर मैं जीना नहीं चाहता हूँ वे कौरव इस युद्ध भूमि में हमारे मुकाबले में खड़े हैं ।

धर्ममूढ़ कायर हुआ, पूछूं साधन विनय वत
शिष्य हूँ, हे ईश तव मैं, उपदेश  श्रेय का दीजिये।।7।।

मेरे अन्दर कायरता रूपी दोष उत्पन्न हो गया है, धर्म के विषय में मेरी बुद्धि भ्रमित हो गयी है। इसलिए मैं आपसे पूछता हूँ कि जो निश्चित और परम कल्याण कारक मार्ग है वह मेरे लिए कहिए। हे भगवन, कृपया मुझे अपने शिष्य के रूप में स्वीकारते हुए शरण में आये हुए को हे श्री गुरु, शिक्षा देकर मेरे मति भ्रम को दूर कीजिए।

निष्कंटक धन धान्य पद, आधिपत्य स्वर्ग अपार
इन्द्रिय व्याकुल शोक का, नहीं कोई उपचार।।8।।

शमशान वैराग्य को प्राप्त हुए अर्जुन, श्री भगवान से कहते हैं, हे श्री कृष्ण! मैं शत्रुओं से रहित भूमि, धन धान्य, राज्य और यहाँ तक कि देवताओं पर भी अधिकार कर लूँ  तो भी इस उपाय को नहीं देखता कि कोई भी वस्तु मेरे शोकाकुल मन की इस व्यथा को दूर कर सके।

जिसने जीता नींद को, जिसने जीते शत्रु
बोला वह श्री कृष्ण से, नहीं करूँगा युद्ध।।9।।

संजय बोले हे राजन्! शत्रुओं को जीतने वाला यहाँ तक कि निद्रा को भी जीतने वाला परम प्रतापी और योग साधक अर्जुन, मैं युद्ध नहीं करूँगा यह स्पष्ट कहकर चुप हो गये।

दोनों सेना मध्य में, लिए मन्द मुस्कान
शोक करते पार्थ से, बोले श्री भगवान ।।10।।

हे भरत श्रेष्ठ राजन्! श्री भगवान कृष्ण ने  विषाद से व्याकुल रोते हुए अर्जुन से हंसते हुए उसकी मति भ्रम दूर करने के लिए यह वचन बोले।

पंडित जैसे वचन हैं, पर करता है शोक
प्राण रहित जिन प्राण हैं, नहिं करते हैं शोक।।11।।

श्री भगवान बोले - हे अर्जुन! तू शोक न करने वाले मनुष्य के लिए शोक करता है और विद्वानों के जैसे वचनों को कहता है, परन्तु जो विद्वान हैं, ज्ञानी हैं वह किसी भी मनुष्य के लिए शोक नहीं करते चाहे उनमें प्राण हैं अथवा प्राण चले गये हैं।

मैं तू राजा यह सभी, और न थे केहि काल
ऐसा भी निश्चित परम, हम होंगे सब काल।।12।।
मैं, तू और युद्ध भूमि में एकत्र सभी लोग इस जन्म से पहले भी थे आज भी हैं और इस जन्म के बाद भी रहेंगे। यही पक्की और सत्य बात है। यहाँ श्री भगवान् ने आत्मा की नित्यता बतायी गयी है। आत्मा नित्य है, अजर है, अमर है। उसका कभी नाश नहीं होता है। जीव भी आत्मा का ही स्वरुप है अतः वह भी नित्य है। जीव तत्व को कोई नष्ट नहीं कर सकता। सृष्टि के सभी जीव पहले भी थे, आज भी हैं और कल भी रहेंगे।

देही होता देह में बालक वृद्ध जवान
अपर देहि की प्राप्ति अस, नहीं धीर को मोह।।13।।

देह और इन्द्रिय तत्व नष्ट होने वाले हैं, मृत्यु धर्मा हैं। जीवतत्व अमर है। नाश रहित है। शरीर में हम बालक, युवा और वृद्धावस्था देखते हैं, इन सभी अवस्थाओं में देही नित्य स्थित रहता है। इसी प्रकार जीवात्मा के अनेक शरीर बदलते रहते हैं, परन्तु वह सदा रहता है। जो पुरुष आत्मा के सदा एक समान रहने वाले स्वरुप को समझ जाता है, उसकी बुद्धि विचलित नहीं होती और वह साँसारिकता में मोहित नहीं होता।

शीत उष्ण सुख दुःख प्रदा इन्द्रिय तत्व अनित्य  
उत्पत्ति और विनष्ट सब सहज करे स्वीकार ।।14।।

मनुष्य की इन्द्रियां उसकी चेतना को, संसार की ओर प्रवाहित करती हैं। इन्द्रियों की रुचि विषयों की ओर होती है, इसी कारण सुख दुःख, सर्दी गर्मी का प्रभाव हमारे अन्तःकरण पर पड़ता है। जो वस्तु हमे प्रिय लगती है उससे सुख प्राप्त होता है तथा जो हमें अप्रिय लगती है उससे दुःख प्राप्त होता है। परन्तु यह सभी इन्द्रियां और उनके विषय उत्पत्ति एवं विनाशशील हैं, इसलिए अनित्य हैं अतः इस सच्चाई को जानकर उन्हें सहज रूप से स्वीकार कर सहन और वहन करना ही उचित है।

अमृत तत्व पाता वही सुख दुख रहे समान
विषय न जेहि व्याकुल करे, अमृततत्त्व को पात ।।15।।

विषयों के आधीन जो पुरुष नहीं होता है, सुख और दुःख में जो समान रहता है वह अमृत तत्व के योग्य होता है। उसका चित्त पूर्णतया शान्त हो जाता है। वह मोक्ष का अधिकारी होता है। उसका जन्म और मृत्यु उसके हाथ में हो जाती है। यही क्षीर सागर है।

असत् की सत्ता नहीं सत् का नहीं अभाव
तत्व ज्ञानी जानता इनका विषय विचार ।।16।।

सृष्टि का मूल तत्व सत् है, वही नित्य है, सदा है। असत् जिसे जड़ या माया कहते हैं, यह वास्तव में है ही नहीं। जब तक पूर्ण ज्ञान नहीं हो जाता तब तक सत् और असत् अलग अलग दिखायी देते हैं। ज्ञान होने पर असत् का लोप हो जाता है वह ब्रह्म में तिरोहित हो जाता है। उस समय न दृष्टा रहता है न  दृश्य। केवल आत्मतत्व जो नित्य है, सत्य है, सदा है, वही रहता है।

अविनाशी तू जान उसे, व्याप्त सकल संसार
नष्ट न कोई कर सके, अविनाशी का ज्ञान।।17।।

यह आत्मा सदा नाश रहित है । आत्मा ने ही सम्पूर्ण सृष्टि को व्याप्त किया है। सृष्टि में कोई भी स्थान ऐसा नहीं है जहाँ आत्मतत्व न हो। इस अविनाशी का नाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है।

नाश रहित अप्रमेय जीव यह, नित्य रूप है स्थित
इसके देह सदा ही मरते, जान युद्ध कर भारत ।।18।।

जीवात्मा इस देह में आत्मा का स्वरूप होने के कारण सदा नित्य है। इस जीवात्मा के देह मरते रहते हैं। अतः जीवन संग्राम से क्या घबराना।

जो जाने यह मारता, इसको मरता जान
वे दोनों नहिं जानते, नहिं मरता नहिं मारता।।19।।

जब देह मरता है तो समझा जाता है सब कुछ नष्ट हो गया परन्तु ऐसा नहीं होता है इसलिए भगवान श्री कृष्ण कहते हैं, जो इसे मारने वाला और मरणधर्मा मानता है, वह दोनों यथार्थ नहीं जानते हैं। यह आत्मा न किसी को मारता है, न मरता है। आत्मा अक्रिय (क्रिया रहित) है अतः किसी को नहीं मारता है। नित्य अविनाशी है अतः किसी भी काल में नहीं मरता है।

ना जन्मे ना मरण हो जीव किसी भी काल
जन्म ले नहिं जन्म दे सदा सत्य हर काल
नित्य अजन्मा शाश्वत, परम पुरा पूरन पुरुष
पार्थ हन्य इस देह के नहीं हन्य यह जीव ।।20।।

इस आत्मा का न जन्म है मरण है। न यह जन्म लेता है न किसी को जन्म देता है। हर समय नित्य रूप से स्थित है, सनातन है। इसे कोई नहीं मार सकता। केवल इसके देह नष्ट होते हैं ।

जो जाने यह आत्मा नाश रहित अरु नित्य
अव्यय अज यह आत्मा, कैसे हने शरीर।।21।।

आत्मा को जो पुरुष नित्य, अजन्मा, अव्यय जानता है, उसे बोध हो जाता है कि आत्मा जो उसमें और दूसरे में है वह नाश रहित और नित्य है फिर वह कैसे किसी को मारता है या मरवा सकता है।

धारत है नव वस्त्र को, फटे पुराने त्याग
ऐसे ही यह आत्मा, बदले अपनी देह।।22।।

जीवात्मा के शरीर उसके वस्त्र हैं वह पुराने शरीरों को उसी प्रकार त्याग कर शरीर धारण करता है जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है।

शस्त्र न छेदन कर सके, पावक नहीं जलाय
पानी इसे गला न सके, वायु नहीं सुखाय।।23।।

इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते हैं, इसे आग में जलाया नहीं जा सकता, जल इसे गीला नहीं कर सकता तथा वायु इसे सुखा नहीं सकती। यह निर्लेप है, नित्य है, शाश्वत है।

सर्वव्यापी अचल स्थित, है सनातन आत्मा
यह अदाह्य अच्छेद्य है, अक्लेद्य अशोष्य लक्षणम्।।24।।

आत्मा को छेदा नहीं जा सकता, जलाया नहीं जा सकता, गीला नहीं किया जा सकता, सुखाया नहीं जा सकता, यह आत्मा अचल है, स्थिर है और सनातन है।

अव्यक्त है, अचिन्त्य है, विकार हीन आत्मा
जानकर गुणों को इसके, शोक योग्य है नहीं ।।25।।

यह आत्मा व्यक्त नहीं किया जा सकता है क्योंकि आत्मा अनुभूति का विषय है। इसका चिन्तन नहीं किया जा सकता क्योंकि यह बुद्धि से परे है। यह आत्मा विकार रहित है क्योंकि यह सदा  अक्रिय है। आत्मतत्व को बताते हुए भगवान श्री कृष्ण चन्द्र अर्जुन से कहते हैं कि जैसा मैंने बताया वैसे लक्षणों से युक्त सनातन आत्मा को जानकर तुझे शोक नहीं करना चाहिए।

मानता यदि जन्मना, मरणधर्मा मानता
जान इसकी नित्य गति, शोक तेरे योग्य नहिं ।।26।।

परन्तु इस देह में आत्मा क्रियाशील, मरता और जन्म लेता दिखायी देता है इसलिए अर्जुन की बुद्धि में उपजे इस संशय को दूर करने के लिए भी भगवान श्री कृष्ण चन्द्र कहते हैं, हे अर्जुन यदि तू इस आत्मा को सदा जन्म लेने वाला और मरने वाला मानता है फिर शोक क्यों ?

जन्म लिया तो मरण है, मरण हुआ तो जन्म
अपरिहार्य यह क्रम सदा, नहीं शोक के योग्य।।27।।

क्योंकि जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु होगी और जो मर गया है उसका जन्म निश्चित है, इसे रोका नहीं जा सकता यह अपरिहार्य है अतः तुझे किसी भी स्थिति में शोक नहीं करना चाहिए।

पूर्व में अव्यक्त थे, जो जन्म के अरु मृत्यु के
मध्य में जो प्रकट होते, शोक फिर किसके लिए।।28।।

सभी प्राणी जन्म से पहले दिखायी नहीं देते तथा मृत्यु के बाद भी नहीं दिखायी देते हैं, यह बीच में प्रकट होते हैं फिर इनके लिए शोक क्यों?

अचरज से देखे इसे अपर सुने आश्चर्य
अचरज से कहता इसे, श्रवण न जाने कोय।।29।।

आत्मतत्त्व एक आश्चर्य है, आश्चर्य इसे इसलिए कहा है कि अक्रिय होते हुए भी यह सब कुछ करता हुआ दिखायी  देता है। यह निराकार है, अजन्मा है, फिर भी जन्म लेते हुए, मरते हुए  दिखायी देता है। इसी कारण यह आत्मतत्त्व एक आश्चर्य है और इसकी विलक्षणता को देख सुन कर भी इसको कोई नहीं जान पाता है।

अवध्य होता देह में जो, प्राणियों के नित सदा
जानकर इसको विलक्षण, शोक तज दे तू सदा।।30।।

आत्मा इस देह में अवध्य है अर्थात इसे कैसे ही, किसी भी प्रकार, किसी के द्वारा नहीं मारा जा सकता क्योंकि यह मरण धर्मा प्राणी अथवा पदार्थ नहीं है।

देख के निज धर्म को, भय तुझे करना नहीं
धर्म युद्ध से श्रेयकर, कुछ अन्य कर्म नहीं यहाँ ।।31।।

हे अर्जुन! अपने क्षत्रिय स्वभाव के कारण भी तुझे इस युद्ध भूमि में शत्रुओं से भय नहीं मानना चाहिए क्योकि यहाँ किसी भी क्षत्रिय के लिए युद्ध से बढ़कर कोई भी कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है।

भाग्यवान ही वीर पाते, इस सृदश के युद्ध को
स्वर्ग का यह द्वार है, स्वयं प्राप्त यह कर्म है।।32।।

हे अर्जुन! तू बड़ा भाग्यवान है क्योंकि इस प्रकार के युद्ध को, जिसका परिणाम परम कल्याण कारक है, भाग्यवान क्षत्रिय ही पाते हैं। यहाँ 'इस प्रकार के युद्ध को' विषय महत्वपूर्ण है। ज्यादातर युद्ध अपनी लिप्सा और महत्वाकांक्षा की पूर्ती के लिए किये जाते हैं पर इस प्रकार का युद्ध जो मानवता की भलाई के लिए होता है, वह यदा कदा ही लड़ा जाता है। 

यदि होएगा युद्ध विरत, धर्म युद्ध से आप
धर्म कीर्ति का नाश कर, लग जाएगा पाप।।33।।

फिर भी यदि तू अपने स्वभाव के अनुरूप इस धर्म युद्ध को नहीं करेगा तो अपने स्वभाव से विरत हो जायेगा और अपने सम्मान को खो कर पाप का आचरण करेगा और दुष्परिणाम भोगेगा।

मरने से ज्यादा बुरा, यदि अपयश लग जाय
बहुत काल गाथा रहे, मरण बुरो दुख होय।।34।।

संसार के लोग लम्बे समय तक तेरी अपयश गाथा कहते रहेंगे, तुझे कायर, भगौड़ा, नपुंसक आदि कहेंगे और किसी भी सम्मानीय पुरुष के लिए अपकीर्ति, मरने से अधिक बढ़कर है।

माननीय से तुच्छ बनेगा, है अर्जुन तू सोच
भय से भागा युद्ध में, माने तेरे लोग।।35।।

तू संसार में अभी तक परम सम्माननीय है परन्तु अपने इस आचरण के कारण उन लोगों की नजरों में तू तुच्छ हो जायेगा। महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से भागा हुआ मानेंगे।


निन्दा तब सामर्थ की, वैरी नहीं अघाय
अत्याधिक दुख पायेगा, सुन अबोल तू बोल।।36।

तेरे शत्रु लोग तेरे पराक्रम की तेरे सामने और पीठ पीछे बहुत से न कहने वाले वचन अर्थात अपशब्द से निन्दा करेंगे, अब तू ही सोच कि उससे अधिक दुःख तेरे लिए क्या होगा।

मरकर मिलना स्वर्ग है, जिते धरा के भोग
निश्चय कर उतिष्ठ हो, यह अति शुभ संयोग।।37।।

इस युद्ध में यदि तू मारा जाता है तो अपने स्वभाव रत कर्म के कारण, धर्म आचरण के कारण तू स्वर्ग को प्राप्त होगा और यदि तू इस युद्ध को जीतता है तो राज्य सुख आदि का भोग करेगा। इसलिए अपनी क्लैव्यता को त्यागकर अपने स्वभाव का आचरण कर और युद्ध के लिए खड़ा हो जा।

हानि लाभ अरु जया जय, सुख दुख को सम जान
पाप नहीं तू पायेगा, मन में रण की ठान।।38।।

आत्मा अबध्य है और नित्य है। देह को मरना है तथा एक देह के बाद दूसरा देह, यह क्रम सदा चलना है। अतः भगवान कहते हैं कि हे अर्जुन जो कुछ भी है क्षणिक है इसलिए सुख दुःख, जय पराजय, हानि लाभ को समान समझ और समत्व योग में स्थित हो जा। जो हो रहा है उसे होने दे, कोई सारोकार मत रख। उसके बाद युद्ध के लिए तैयार हो जा, तू पाप को (समत्व होने के कारण) प्राप्त नहीं होगा।

यह था दर्शन सांख्य का, जिसमें बुद्धि का योग
अब सुन तू उस योग को, छूटे बन्धन कर्म।।39।।

भगवान श्री कृष्ण चन्द्र द्वारा धनुर्धर अर्जुन को ज्ञान योग जिसे सांख्य योग अथवा सन्यास योग कहा है, का ज्ञान दिया। अब कर्म योग का ज्ञान देने जा रहे हैं जिसे जानकर अथवा जिस बुद्धि से युक्त होकर प्राणी कर्म बन्धन से मुक्त हो जाता है।

बीज तत्व न विनसता, ना फल दोष समाय
जन्म मृत्यु यह भय हरे, कर्म योग उपाय।।40।।

इस कर्म योग में बीज का नाश नहीं होता, अर्थात लौकिक कार्य भी होते हैं, उनका सुख भी होता है तथा कर्म दोष भी नहीं होता है। समता योग स्वतः सिद्ध होने लगता है और मोक्ष का मार्ग सरल हो जाता है।

इस कल्याणी मार्ग में, व्यवसायी धी एक
अव्यवसायी धी बहुत हैं, इनमें भेद अनेक।।41।।

इस कर्म योग की साधना के लिए एक निश्चयात्मक बुद्धि का होना आवश्यक है। निश्चयात्मक बुद्धि से तात्पर्य है साधक की बुद्धि आत्मतत्व में स्थित हो। आत्म ज्ञान के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है। इसे हरि बोधमयी बुद्धि भी कहते हैं। सब कुछ ईश्वर का है अतः उसी को अर्पण करते हुए सभी कर्म करे । सुख दुख में समरूप से स्थित रहे। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाउपनिषद वचन की श्री भगवान ने पुष्टि की है। जहाँ तक सांसारिक बुद्धि का प्रश्न है वह अनेक है और प्रतिक्षण इधर उधर जाती रहती है। वह सदा मन को चंचल किये रहती हैं।

अविवेकी भासित करे, कृत्रिम वाणी पार्थ
वेद वाद में रम रहे, नहीं अन्य कोई वस्तु ।।42।।
परम स्वर्ग है, भोग रत, जन्म कर्म फल प्राप्त
भोग ऐश्वर्य प्राप्ति का नाना विधि विस्तार।।43।।
जिनका चित चंचल हुआ, भोग ऐश्वर्य आसक्त
जान परम में निश्चित धी का, होता सदा अभाव।।44।।

श्री भगवान अर्जुन से बोले जो मनुष्य सदा भोगों में लगे रहते हैं जिन्हें नित नवीन भोग चाहिए, जो कर्मफल के प्रशसंक हैं और विभिन्न भोगों के लिए वेदों के बताये हुए मार्ग में चलते हैं, उनके लिए स्वर्ग से बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है। उनकी बुद्धि यहाँ भी भोगों में रत रहती है और मरने के बाद भी उन्हें स्वर्ग आदि के भोग चाहिए। ऐसे अविवेकी जन भोगों की प्राप्ति के लिए मीठी मीठी वाणी का प्रयोग करते हैं और ऐसी विद्या और वाणी से जिनकी बुद्धि का हरण हो गया है वह भोग ऐश्वर्य को प्राप्त करने वाली, संसार बन्धन में बांधने वाली विद्या को सबसे श्रेष्ठ मानते हैं। भोग ऐश्वर्य के लिए बताई वेद वाणी में आसक्त पुरुषों की बुद्धि आत्म ज्ञान की ओर नहीं होती। वह आत्मतत्व परमात्मा को नहीं जान पाते।

त्रिगुण विषय वेद तजि, द्वन्द्व रहित हो आत्मवान
निर्योग क्षेम स्वीकार कर परम सत्य चित आप।।45।।

वेदों में अधिकांशतः कर्म काण्ड का प्रतिपादन हुआ है अतः वेद का विषय सत्त्व, रज, तम से युक्त है। परन्तु हे अर्जुन तूने वेद विषय में ध्यान नहीं देना है। तुझे स्वाधीन अन्तःकरण वाला होकर कर्म फल को न चाहते हुए नित्य आत्मा में स्थित होना है। कर्म काण्ड आसक्ति योग का प्रतिपादन करते हैं, जबकि तुझे अनासक्त होना है।

ताल तलैया लघु अर्थ हों, पाकर सिन्धु अपार
पाकर बोध पर ब्रह्म का, वेद बूँद हो जाय।।46।।

अपार जलराशि के प्राप्त होने पर ताल तलैया का प्रयोजन सीमित हो जाता है उसी प्रकार जो विद्वान आत्मतत्व को जान लेते हैं उनका वेदों में प्रयोजन सीमित हो जाता है।

कर्म में अधिकार होवे, फल की इच्छा छोड़ दे
कर्म फल का हेतु मत बन, अनासक्त अकर्म में।।47।।

तेरा कर्म में अधिकार हो अर्थात तेरा कर्म में नियन्त्रण हो। कर्म नियन्त्रण होने पर ही फल की इच्छा में नियन्त्रण हो जाता है । कर्म फल की इच्छा नहीं होनी है, फल की इच्छा से कर्म और उसके फल में आसक्ति हो जाती है। मन सदैव उस ओर दौड़ता है। आसक्त व्यक्ति का मन में नियन्त्रण नहीं रहता है। कर्म फलका हेतु भी नहीं होना है और कर्म करने में आसक्ति भी नहीं होनी है। किसी कर्म करने का तू साधन भी मत बन, यह मत सोच तेरे बिना यह कर्म नहीं होगा। कर्म बन्धन के डर से कर्म त्याग दे ऐसा भी नहीं करना है। कर्म अनासक्त होकर, कर्म अपने नियन्त्रण में रखते हुए करना है।

आसक्ति को तू त्याग कर, सम बुद्धि सिद्धि असिद्धि में
योग स्थित कर्म कर समत्व नाम योग है।।48।।

कर्म फल की आसक्ति को त्याग कर, यदि कार्य सिद्ध हो जाय तो ठीक है और यदि बिगड़ जाय तो ठीक है, दोनो में सम होकर आत्मा (ईश्वर) से अपने को प्रतिपल जुड़ा हुआ महसूस करना है अर्थात निरन्तर आत्म योग में स्थित होता हुआ सभी कर्मों को कर। यही समत्व योग है।

बुद्धि योग अति श्रेष्ठ है, अवर है सकाम
जान सकामी दीन अति, शरणांगत सम बुद्धि।।49।।

सकाम कर्म अत्यन्त निम्न श्रेणी के हैं। चाहे सकाम कर्म ईश्वर उपासना भक्ति अथवा योग क्यों न हो। बुद्धि योग अत्यन्त श्रेष्ठ है। बुद्धि योग का तात्पर्य है निरन्तर बुद्धि से आत्म स्थित रहना। इसे ही परमात्मा से जुड़े रहना कहते हैं। बुद्धि योग का आश्रय लेकर ही कर्म करना है। सकाम कर्मी अत्यन्त दीन हैं।

बुद्धियोगी त्याग देता, शुभ अशुभ सब कर्म को
बुद्धि योग ही राह है, कर्म कौशल की यहाँ ।।50।।

बुद्धि से जो आत्मा में स्थित है उसके लिए पाप और पुण्य निरर्थक हो जाते हैं, क्योंकि वह अकर्ता हो जाता है। यही समता योग है। इस बुद्धि योग द्वारा ही कर्म बन्धन से छूटा जा सकता है। बुद्धि ही ऐसा माध्यम है जिससे अनासक्त होकर शरीर से कर्म किये जा सकते हैं।

विज्ञ, बुद्धि से फल को त्यागे, जन्म लें जो कर्म से
निर्विकार परम पद पावे, जन्म बन्ध विमुक्त हो।।51।।

ज्ञानवान ही बुद्धि द्वारा कर्म फल को त्याग करने में सक्षम होते हैं। अनासक्त होते ही चित्त की उद्विग्नता समाप्त हो जाती है और मन शान्त हो जाता है। इसलिए बुद्धियोगी जन्म बन्धन से मुक्त होकर निर्विकार परम पद को प्राप्त करते हैं।

मोह के सागर से यह, बुद्धि जब तर जायेगी
सुन के जाना जिनको तूने, भोग वैराग्य पायेगा।।52।।

मोह ही संसार है, मोह के त्यागते ही तुझे संसार तथा उसके सभी भोगों से स्वतः वैराग्य हो जायेगा।

श्रुति प्रतिपादित ज्ञान से, तब धी स्थित होय
अचल समाधि को प्राप्त कर, योग पुरुष तू होय।।53।।

अनेक श्रुति प्रतिपादित सिद्धान्तों से उपलब्ध जब तेरी बुद्धि समाधि में स्थिर हो जायेगी तब तू समता योग को प्राप्त होगा अर्थात संसार में प्रचलित किसी एक अथवा बहुत विधियों का सहारा लेकर निरन्तर साधना करते हुए जब तेरी बुद्धि समाधि में अचल और स्थिर हो जायेगी तभी तेरा आत्मा से योग हो जायेगा, तू आत्मा में स्थित हो जायेगा।

समाधि स्थित प्रज्ञ के, लक्षण क्या हैं कृष्ण
कैसे चलता बोलता, बैठे स्थिर बुद्धि।।54।।

अर्जुन वोले- हे कृष्ण! स्थितप्रज्ञ मनुष्य के क्या लक्षण हैं? उसको कैसे पहचाना जा सकता है, वह कैसे चलता बोलता है? वह स्थिर बुद्धि पुरुष किस स्थिति में रहता है?

त्यागे मन की कामना, सकल पार्थ जेहि काल
आत्म संतुष्ट आत्म में, स्थित प्रज्ञ कहात।।55।।

जिस समय मनुष्य मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं का त्याग कर देता है, उस समय स्वतः बुद्धि स्थिर हो जाती है और वह आत्मा से आत्मा में संतुष्ट रहता है। वही स्थित प्रज्ञ कहा जाता है।

दु:ख में मन उद्विग्न नहिं, सुख में नहीं है राग
राग क्रोध भय मुक्त जो, स्थित प्रज्ञ है पार्थ ।।56।।

जिसका मन दु:ख में उद्विग्नता को प्राप्त नहीं होता, जिसकी सुखों से कोई प्रीति नहीं है, दोनो अवस्थाओं में जो निस्पृह है, जिसके राग, क्रोध, भय समाप्त हो गये हैं, जो अनासक्त हो गया है, उसकी बुद्धि स्थिर कही जाती है।

स्थिर  उसकी बुद्धि है, उदासीन रह जाय
शुभ और अशुभ पाय के, हर्ष न द्वेष समाय।।57।।

जो इस संसार में उदासीन होकर विचरता है, सभी वस्तुओं में वह स्नेह रहित होता हैशुभ और अशुभ की प्राप्ति होने पर उसे न हर्ष होता है न वह द्वेष रखता है, वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।

अंगो को समेटता, कश्यप चारों ओर
ऐसे ही सब इन्द्रियां, सिकुड़े स्थित बुद्धि ।।58 ।।

जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को सब ओर से समेट कर अन्दर कर लेता है वैसे ही जब मनुष्य इन्द्रियों  को सब विषयों से समेट लेता है, तब स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।

निराहारी देही भी होता विषय निवृत्त
रस नहिं होत निवृत्त देहि का
परम बोध जब होत नहिं।।59।।

जो मनुष्य इन्द्रियों से विषयों को ग्रहण नहीं करता है उस पुरुष के विषय निवृत्त हो जाते हैं। किसी भी इन्द्रिय को रोककर उसके विषय को हठ पूर्वक ग्रहण नहीं करने से वह विषय निवृत्त हो जाता है परन्तु उस विषय में उसकी आसक्ति निवृत्त नहीं होती है। उस पुरुष की परम आत्मा में स्थित होने पर ही आसक्ति निवृत्त होती है।

रस का नाश न होता जिसका, यत्नशील धियवान
चंचल उसकी इन्द्रियां, मन हरती बलवान।।60।।

पुरुष में आसक्ति इतनी प्रबल है कि यह आसक्ति नाश न होने के कारण चंचल स्वभाव वाली इन्द्रियां, रात दिन प्रयत्न करने वाले बुद्धिमान साधक के मन को अपने प्रभाव से बल पूर्वक हर लेती हैं अर्थात यत्नशील बुद्धिमान पुरुष भी इन्द्रियों के वेग के सामने लाचार हो जाता है।

वश में करके इन्द्रियां, मम पारायण होय
जो राखे वश इन्द्रियां, धी थिर वाकी होय।।61।।

अतः जो मनुष्य सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके मुझमें अर्थात आत्मतत्व की साधना में स्थित रहता है, उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है।

विषयों का चिन्तन करे, तदाकार हो जाय
संग जन्म दे काम को, काम क्रोध संचार।।62।।

विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है। यदि किसी एक इन्द्रिय विषय का थोड़ा भी चिन्तन हो तो निरन्तर अभ्यासी पुरुष भी उस विषय की ओर बहने लगता है। सकामी पुरुषों की अनेक इच्छायें और उनकी आसक्ति से उत्पन्न संवेग का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। आसक्ति से काम उत्पन्न होता है, कामना पूर्ति में यदि बाधा होती है तो क्रोध उत्पन्न होता है।

क्रोध से सम्मोह होता
सम्मोह मति भ्रम जन्म दे   
मति भ्रम करती नाश बुद्धि का
बुद्धि नाश विनाश है।।63।।

क्रोध से सम्मोह पैदा होता है; बुद्धि सम्मोहित होकर अविचार उत्पन्न कर देती है। सम्मोह से स्मृति नष्ट हो जाती है। स्मृति नष्ट होने से बुद्धि का नाश हो जाता है और जिसकी बुद्धि का नाश हो जाय वह अपनी स्वरुप स्थिति को कभी भी प्राप्त नहीं कर सकता और जिस स्थिति को उसने प्राप्त भी किया है उससे गिर जाता है।

जिस साधक के वश में मन है
जिसके वश में इन्द्रियां
राग द्वेष से मुक्त वह
भोग विचरता परम शान्ति से।। 64।।

जिस पुरुष का मन उसके वश में है तथा सभी इन्द्रियां जिसके वश में है, उसे न किसी से राग है न किसी से द्वेष अर्थात जिसकी आसक्ति का नाश समूल रुप से हो गया है ऐसा पुरुष संसार के समस्त विषयों को राजा जनक के समान भोगता हुआ भी आत्मानन्द को प्राप्त होता है। उसका अन्तःकरण निरन्तर प्रसन्न रहता है।

निर्मल चित दुख दूर हों, ना कुछ रहे अभाव
ऐसे धीर प्रसन्न की, बुद्धि अचल हो जाय ।।65।।

जिसका चित्त निर्मल हो जाता है, जिसका अन्तःकरण स्वतः प्रफुल्लित रहता है उसके सभी दुःख नष्ट हो जाते हैं और प्रसन्न चित योगी की बुद्धि शीघ्र  ही आत्म स्थित हो जाती है और आत्म स्वरूप में भलीभांति स्थिर हो जाती है।

भाव हीन को शान्ति नहिं, शान्ति रहित सुख नाहिं
प्रज्ञा नहिं अयुक्त में, आस्था भाव भी नाहिं।।66।।

जो मनुष्य निरंतर आत्म साधन में लगा हुआ नहीं है, उसकी बुद्धि कभी भी शुद्ध और निश्चयात्मक नहीं हो सकती है। वह भटकती रहती है। आयुक्त पुरुष में अपने इष्ट, अपने साधन मार्ग के प्रति दृड़ भाव नहीं होता है। इसलिए अयुक्त मनुष्य के अन्तःकरण में आत्म भावना भी नहीं होतीहै। आत्म भाव का अभाव होने से मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती । कबीर कहते हैं शान्ति भई जब गोविन्द जान्याऔर जिसे शान्ति नहीं है, वहाँ आनन्द कैसे हो सकता है।

विषय विचरती इन्द्रियां, जब मन उनके साथ
इन्द्रिय हरण करे प्रज्ञा का, वायु नाव जल में हरे।।67।।

विषयों में विचरती हुयी इन्द्रियों के साथ अथवा किसी एक इन्द्रीय के साथ मन रहता है, वह एक इन्द्रीय पुरुष की बुद्धि का हरण उसी प्रकार कर लेती है जैसे पानी में नाव का वायु हरण कर लेती है और साधक पथ भ्रष्ट हो जाता है। नाव विपरीत दिशा की ओर वायु वेग से बहने लगती है, उसी प्रकार साधक की बुद्धि विपरीत हो जाती है।

जिसने जीती इन्द्रियां, कर वश में सब विषय रस
प्रज्ञा उसकी स्थित रहती, हे अजान भुज वीर ।।68।।

अतः इन्द्रियों को वश में करना सबसे ज्यादा आवश्यक है। इन्द्रियों को वश में करने के लिए महर्षि पातंजलि ने अष्टांगयोग बताया है। जिस साधक की मन सहित समस्त इन्द्रियां सब प्रकार से वश में हैं उसकी बुद्धि स्थिर है, उसे स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।

जब सोये संसार सब, संयम योगी जाग
जब जागे संसार सब, तब सो मुनिवर सोय।।69।।

जब संसार के समस्त प्राणी सोते हैं तब स्थितप्रज्ञ योगी आत्म ज्ञान में जागता है। सुसुप्ति में भी वह योगी आत्म रस में निरन्तर मगन रहता है। जब इस संसार के समस्त प्राणी जागते हैं अर्थात विषय व इद्रियों के वश में हुए संसार के कर्म करते हैं, स्थितप्रज्ञ मुनि के लिए वह समय रात्रि के समान है अर्थात वह संसार से अनासक्त हुआ कर्मों में विचरता है।

नदी नदों से भरता हुआ भी,
समुद्र ज्यों है स्थित प्रतिष्ठित
त्यों काम सारे जिसमें समाये,
पाता वही शान्ति न काम कामी।।70।।

नदी नालों का समस्त पानी समुद्र में समा जाता है फिर भी समुद्र अचल रहता है, उसमें बाढ़ नहीं आती, वह जस का तस बना रहता है। इसी प्रकार स्थित प्रज्ञ पुरुष में भी संसार के समस्त कर्म, समस्त भोग समा जाते हैं, वह परम शान्ति, परम आनन्द को प्राप्त होता है। जो व्यक्ति भोगों को चाहने वाला है उसे शान्ति नहीं प्राप्त होती है क्योंकि कामना में विघ्न पड़ने से उसका चित्त उद्विग्न रहता है।

तृष्णा त्यागी सकल जिन, करें मोह का नाश
अंहकार स्पृह रहित, पाता शान्ति का साथ।।71।।

जिस पुरुष ने अपनी सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग दिया है जो सांसारिक ममता, मोह से रहित हो गया है, उदासीन है, जो अहंकार से रहित है, जिसे किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं है, ऐसा आत्मवान पुरुष परम शान्ति, परम आनन्द को प्राप्त होता है।

स्थित हुवा ब्रह्म में, मोहित कभी न होय
अतं काल स्थित हुआ, पाता परमानन्द ।।72।।

आत्म स्थित ही ब्राह्मी स्थिति है। जब बुद्धि और आत्मा एक हो जाती है तब यह ब्राह्मी स्थिति प्राप्त होती है। जो भी योगी इस ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त हो जाता है, उसे सांसारिक और परमार्थिक मोह व्याप्त नहीं होते और अन्त में आत्म स्थित हुआ वह पुरुष आत्मा को ही प्राप्त होता है। इसे ही ब्रह्म निर्वाण कहते हैं।
          

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