Saturday, August 13, 2011

प्रथम अध्याय-विषाद योग


                                 क्या कोई लड़ाई का मैदान धर्म क्षेत्र हो सकता है?
                                 विषाद भी परमात्मा से जुड़ने का कारण बनता है.          

         
                                    बसंतेश्वरी भगवद्गीता - प्रो बसंत प्रभात जोशी
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                                                         प्रथम अध्याय-विषादयोग

आस लिए रण की जमा, धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्र
कर्म किया मम पाण्डु पुत्र क्या, हे संजय तू बोल।।1।।

पुत्र मोह से व्याकुल धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं - हे संजय! कुरूक्षेत्र में युद्ध की आशा से एकत्र भिन्न भिन्न जीव स्वभाव को धारण किए शूरवीर जिनकी प्रकृति एक दूसरे से नितांत अलग है मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया ?
यहाँ धर्म शब्द महत्वपूर्ण है। धर्म का अर्थ है धारण करने वाला अथवा जिसे धारण किया गया है। धारण करने वाले को आत्मा कहा जाता है और जिसे धारण किया गया है वह प्रकृति है। अतः सुस्पष्ट है इस श्लोक में धर्म शब्द का अर्थ जीव स्वभाव है जिसे प्रकृति भी कहते हैं और क्षेत्र शब्द का अर्थ शरीर है। भगवद्गीता के अन्य प्रसंगों में भी इसी बात की पुष्टि होती है. यथा स्वधर्मे निधनम् श्रेयः पर धर्मः परधर्मः भयावहः’, अपने स्वभाव में स्थित रहना, उसमें मरना ही कल्याण कारक माना है। यह धर्म शब्द गीता शास्त्र में अत्याधिक महत्वपूर्ण है। श्री भगवान ने सामान्य मनुष्य के लिए स्वधर्म पालन; स्वभाव के आधार पर जीवन जीना परम श्रेयस्कर बताया है।
महर्षि व्यास ब्रह्मज्ञानी थे। उनकी दृष्टि से धर्म का अर्थ है आत्मा और क्षेत्र का अर्थ है शरीर। इस दृष्टिकोण से पुत्र मोह से व्याकुल धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं, हे संजय, कुरूक्षेत्र में जहाँ साक्षात धर्म, शरीर रूप में भगवान श्री कृष्ण के रूप में उपस्थित है वहाँ युद्ध की इच्छा लिए मेरे और पाण्डु पुत्रों ने क्या किया?
गीता की समाप्ति पर इस उपदेश को स्वयं श्री भगवान ने धर्म संवाद कहा। धर्म, जिसने धारण किया है, वह आत्मतत्व परमात्मा शरीर रूप में जहाँ उपस्थित है, यह भी ब्रह्मर्षि व्यास जी के चिन्तन में रहा होगा। अतः व्यास जी द्वारा यहाँ धर्म क्षेत्र शब्द का प्रयोग सृष्टि को धारण करने वाले परमात्मा श्री कृष्ण चन्द्र तथा धृतराष्ट के जीव भाव (जिसे धारण किया है) को संज्ञान में लेते हुए किया गया है। धर्म संस्थापनार्थाय’, से भी इस बात की पुष्टि होती है। इस श्लोक में महर्षि व्यास ने धर्म शब्द ईश्वर एवं जीव दोनों स्वभावों के लिए प्रयोग कर और क्षेत्र शब्द जहाँ यह दोनों रहते हैं (शरीर) के लिए करते हुए सम्पूर्ण गीता का सार एक श्लोक में कह दिया है
सामान्यतःकुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र कहा जाता है, यह मात्र अज्ञानता है

व्यूहाकार पाण्डव सेना को, दुर्योधन ने देखकर
जा समीप आचार्य के, वचन कहा वह जान।।2।।

संजय बोले हे राजन! कुरूक्षेत्र के मैदान में दुर्योधन द्वारा पाण्डवों की व्यूहाकार सेना को देखकर, आचार्य द्रोण के पास जाकर यह वचन कहा।

हे आचार्य देखिये विशाल पाण्डव सैन्य बल
व्यूह है बना गजब, निपुण शिष्य द्युम्न से।।3।।

हे आचार्यद्रुपद पुत्र धृष्टद्युम्न जो आपका परम मेधावी शिष्य रहा है और जो पाण्डव सेना का नायक है के द्वारा व्यूहाकार रूप से खड़ी की हुई पाण्डवों की इस बड़ी भारी सेना को देखिये।

पार्थ भीम के समान धनुष लिए शूरवीर
सात्यकी विराट हैं, महारथी द्रुपद स्वयं।।4।।
धृष्टकेतु चेकितान काशीराजा वीर्यवान
पुरुजित, कुन्तिभोज भी, मनुष्य श्रेष्ठ शैव्य है।।5।।
पराक्रमी युधामन्यु उत्तमौजा है बली
द्रोपदी सुभद्रा पुत्र, सभी हैं महारथी।।6।।

इस पाण्डवों की सेना में बड़े बड़े धनुर्धारी हैं और युद्ध में भीम और अर्जुन के समान परम बलशाली शूरवीर सात्यकी, राजविराट महारथी राजा द्रुपद, धृष्टकेतु, महारथी चेकितान, तथा बलवान राजा काशीराज, पुरुजित, कुन्तीभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैव्य, परम पराक्रमी युद्धामन्यु और बलशाली उत्तमौजा, महारानी सुभद्रा का पुत्र अभिमन्यु और पांचों पाण्डवों की पटरानी द्रौपदी के पांच पुत्र जो सभी महारथी अत्यंत पराक्रमी हैं।

हमारी सैन्य में विशिष्ट, आचार्य जान लीजिए
संज्ञान मम सैन्य में, प्रधान जो उन्हें सुनें।।7।।

हे आचार्य! हमारी सेना में जो प्रधान योद्धा और सेना नायक हैं, उन्हें मैं आपकी जानकारी के लिए आपको बताता हूँ।

एक स्वयं आप हैं, भीष्म कर्ण कृपाचार्य
सोमदत्त पुत्र है, विकर्ण द्रोण पुत्र भी ।।8।।

एक तो स्वयं आप ही हैं, दूसरे मृत्युंजयी हम सबके पितामह भीष्म हैं। उनके अलावा महावीर कर्ण, संग्राम विजयी कुल गुरु कृपाचार्य तथा उन्हीं के समान  बलशाली आपका पुत्र अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त के पुत्र भूरिश्रवा हैं।

आस तजे देह की और बहुत शूर हैं
भिन्न भिन्न शस्त्रधारी जान चतुर युद्ध में।।9।।

हे आचार्य! युद्ध में निपुण और भी बहुत से शूरवीर जिन्होंने अपना जीवन मेरे लिए दांव में लगा दिया है, अनेक प्रकार के शस्त्रों से सुसज्जित होकर सबके सब यहाँ उपस्थित हैं।

भीष्म रक्षित सैन्य मम है, सब प्रकार अजेय
भीम रक्षित सैन्य जो है, जीतने में सुगम है।।10।।

हमारी सेना जिसकी पितामह भीष्म द्वारा रक्षा की जा रही है सब प्रकार से पराक्रमी योद्धाओं के कारण अजेय है और भीम द्वारा रक्षित पाण्डवों की सेना जो मुठ्ठी भर है तथा जिसमें कुछ ही पराक्रमी योद्धा हैं, जीतने में सुगम है।

अपनी अपनी ठौर, रहें व्यवस्थित आप
सभी छोर रक्षा करें भीष्म पिता सब वीर ।।11।।

इसलिए मैं युवराज होने के कारण आप सबको आदेशित करता हूँ कि सब अपने अपने मोर्चों में स्थित रहें और सब लोग भीष्म पितामह की चारों ओर से रक्षा करें क्योंकि वही हमारी सेना के सेनापति हैं।

तब पितामह भीष्म ने दुर्योधन हर्षित किया
सिंहनाद सम गरजकर शंख बजाया उच्च स्वर ।।12।।

हे राजन! रण भूमि कुरूक्षेत्र में कौरवों में वृद्ध पितामह भीष्म ने दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिए सिंह के समान उच्च स्वर में अपना शंख नाद किया।

पणवानक गौमुख सभी, शंख नगारे साथ
सब बाजे एक साथ ही बड़ा भयंकर बोल ।।13।।

भीष्म पितामह के शंख नाद के पश्चात अनेक शंख, नगारे, ढोल, मृदंग, नरसिंघे आदि वाद्य एक साथ बजने लगे और उन सब वाद्यों का मिलाजुला शब्द बड़ा भयंकर था।

तब सफेद हय से जुड़े उत्तम रथ आसीन
माधव श्रीहरि, पार्थ ने दिव्य शंख बजाये।।14।

इसके पश्चात सफेद घोड़ों से जुते अत्यन्त बड़े और सुन्दर रथमें बैठे हुए श्री कृष्ण चन्द्र महाराज और शत्रुओं को आंतकित करने वाले अर्जुन ने अपने अपने अलौकिक शंख बजाये।

पाच्ञजन्य हृषिकेष ने देवदत्त ध्वनि पार्थ
पौण्ड्र बजाया भीम ने जिसके भयकर कर्म।।15।।

श्री कृष्ण चन्द्र जी ने पाच्ञजन्य शंख बजाया, अर्जुन ने देवदत्त और  भयानक कर्म करने वाले विशालदेही परम बलशाली भीम ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया।

वहां युधिष्ठिर ने किया, अनन्त विजय का घोष
मणि पुष्पक सुघोष से, सहदेव नकुल ध्वनि श्रेष्ठ ।।16।।

कुंतीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्त विजय नामक तथा नकुल और सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाये।

श्रेष्ठ धनुर्धर काशिनृप और शिखण्डी रथी महान
धृष्टद्युम्न अरु विराट, सात्यकी अजेय वीर।।17।।
द्रुपद, द्रोपदी के पुत्र, बड़ी भुजा सुभद्रा पुत्र
सभी ने शंख नाद किया, ओर छोर भूमि में।।18।।

हे राजन्! श्रेष्ठ धनुष वाले काशी के राजा और महारथी शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, राजा विराट, अजेय सात्यकी, राज द्रुपद, महारानी द्रौपदी के पांचों पुत्र और दीर्घ बाहु वाले सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु ने अलग अलग शंख बजाये।

उस भयानक घोष ने व्याप्त धरा आकाश
हृदय फटा तब सकल सुत, सुना भंयकर घोष ।।19।।

उन शंखों के घोष का इतना भयानक शब्द हुआ कि उसने आकाश और पृथ्वी को गुंजाते हुए सभी कौरवों के हृदय को अपनी आवाज और संताप से विदीर्ण कर दिया।

ठौर व्यवस्थित सुहृद मित्र, देख कपिध्वज पार्थ
शस्त्र प्रहार उद्यत सकल, धनुष उठाकर पार्थ।।20।
यह बोला श्री कृष्ण से, हे राजन तू जान
उभय सैन्य के बीच रथ, स्थापित भगवान।।21।।

हे राजन्! वानर की ध्वजा वाले अर्जुन ने मोर्चे में डटे हुए, सभी कौरवों को देखकर तथा शस्त्र चलाने के लिए तैयार सेनाओं को देखकर, धनुष उठाकर श्री कृष्ण चन्द्र महाराज से विनम्र स्वर में कहा कि हे भगवन!  मेरे रथ को इन दोनों सेनाओं के बीच में कृपा कर खड़ा कीजिए।

अपनी ठौर अवस्थित युद्ध काम प्रतिपक्ष
किन किन से रण हो उचित  कर निरीक्ष मैं  जान।।22।।

मैं युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध की इच्छा लिये इन कुरु योद्धाओं को अच्छी प्रकार देखना चाहता हूँ कि इस संग्राम में मुझे किन किन के साथ युद्ध करना है।

दुर्योधन दुर्बुद्धि के प्रिय हितकारक भूप
एकत्र हुए इस युद्ध को, देखूँ उनका रूप।।23।।

दुर्बुद्धि दुर्योधन के जो हितैषी राजा लोग इस सेना में आकर यहां जमा हैं, उन युद्ध प्रिय राजाओं और सम्बन्धियों को मैं देखना चाहता हूँ।

हे राजन श्री कृष्ण ने वचन सुने जब पार्थ
दोनो सेना मध्य में रथ स्थापित कृष्ण।।24।।
भीष्म द्रोण के सामने और सकल महिपाल
कहा पार्थ से देख ले युद्ध जुटे धातृराष्ट्र।।25।।

संजय बोले हे भरत श्रेष्ठ राजनअर्जुन के इस प्रकार कहने पर दोनों सेनाओं के बीच में, जिनमें भीष्म और द्रोणाचार्य प्रमुख हैं और अन्य राजाओं के सामने श्री कृष्ण चन्द्र ने अपने उत्तम रथ को खड़ा करके यह कहा कि युद्ध के लिए एकत्रित इन कौरवों को देख।

देखे पितृन पितामहान देखे मातुल भ्रातृ
पुत्र पौत्र अरु मित्र को, देखा स्थित पार्थ।।26।।

जब उन दोनों सेनाओं के बीच में अर्जुन ने अपने चाचा, ताऊ पितामह, मामा, भाईयों पुत्रों, पौत्रों, मित्रों को देखा।

दोनो सेना मध्य में श्वसुर सुहृद को देख
देख अवस्थित बन्धु सब, बोला तब कौन्तेय।।27।।

साथ ही ससुर, सुहृद आदि को दोनों सेनाओं में स्थित अपने अपने मोर्चे पर डटे हुए देखा। उन बन्धुओं को युद्ध के लिए तत्पर देखकर, कुन्तीपुत्र अर्जुन श्री भगवान से यह बोले।

अति करूणा से युक्त हो, बोला हे नर श्रेष्ठ
सभी स्वजन जो युद्ध प्रिय देख अवस्थित कृष्ण।।28।।
शिथिल हो रहे अंग मम, सूख रहा मुख नाथ
रोमांच कम्प इस देह में, हो रहा श्री कृष्ण ।।29।।

अर्जुन अपने युद्ध प्रिय बन्धुओं को युद्ध के लिए देखकर अत्यन्त करूणा से युक्त होकर श्री कृष्ण चन्द्र महाराज से इस प्रकार बोला। हे कृष्ण! हे गोविन्द! अपने बन्धुओं को देखकर मेरे हाथ पाँव ढीले हो रहे हैं और घबराहट के मारे मुख सूखा जा रहा है और मेरे शरीर में रोमांच और कम्पन हो रहा है।

गांडीव गिर रहा हाथ से, त्वचा बहुत ही दाह्य
मन भ्रमित है हो रहा, नहीं पैर स्थित समर्थ ।।30।।

मेरे हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है और मेरी त्वचा अग्नि के समान ताप से जल रही है। मेरी बुद्धि, मेरा मन भ्रमित हो रहा है और मैं खड़े रहने में समर्थ नहीं हूँ।

सब लक्षण विपरीत हैं, केशव यह मैं जान
स्वजन हते इस युद्ध में, कुछ भी नहिं कल्याण।।31।।

हे केशव! मैं अपने लक्षणों को भी विपरीत देख रहा हूँ और युद्ध में अपने बन्धु बान्धवों को मारकर कल्याण भी नहीं देखता हूँ।

नहीं चाहता विजय मैं, नहीं राज्य सुख चाह
क्या होगा इस राज्य से, जीवन से अरु भोग ।।32।।

हे श्री कृष्ण! मैं अपने बन्धुओं को मारकर न तो विजय चाहता हूँ न राज्य सुख चाहता हूँ। स्वजनों को मारकर इस राज्य का हम क्या करेंगे, क्या यह जीवन ही हमारा उद्देश्य होगा, क्या हम भोग एश्वर्य भोग पायेंगे?

हेतु राज्य सुख भोग का, जिनके प्रति है, कृष्ण
त्याग आस इस देह की वे तत्पर हैं युद्ध।।33।।

किसी भी मनुष्य को अपने परिवार बन्धु-बान्धवों के लिए राज्य सुख की इच्छा होती है। विडंबना है कि वही बन्धुगण अपना राज्य वैभव छोड़कर और प्राण की आशा त्यागकर युद्ध में खड़े हैं।

पुत्र पितर आचार्य हैं और पितामह जान
मामा साले श्वसुर हैं और सहोदर पौत्र।।34।।

ये बन्धुगण हमारे गुरूजन हैं ताऊ, चाचा, लड़के, पितामह, मामा, ससुर, साले, पौत्र और सभी निकट के सम्बन्धी लोग हैं।

मेहि मारें मधुसूदन, मिले त्रिलोकी राज
फिर भी नहिं मारूं इन्हें, पृथ्वी की क्या बात।।35।।

हे मधुसूदन! इन निकट के बन्धुओं को मैं तीन लोकों के राज्य के लिए भी नहीं मारना चाहूँगा फिर पृथ्वी की तो बात ही क्या है।

क्या प्रसन्नता होएगी, इन कुरुवों को मार
आश्रित होंगे पाप के, मार आतंकी कृष्ण।।36।।

हे श्री कृष्ण! इन कौरवों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी, इन्हें मारकर हमें केवल पाप ही लगेगा।

नहीं योग्य हैं, कृष्ण हम, बन्धु स्वजन को मार
कैसे हम सुख पायेंगे, निज कुटुम्ब को मार।।37।।

हे भगवन! मैं समझता हूँ कि अपने बन्धुओं बान्धवों तथा अपने भाई कौरवों को मारने के लिए हम योग्य नहीं हैं क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपने कुटुम्ब को मारकर कैसे सुखी हो सकता है।

भ्रष्ट हुआ चित लोभ से, करते नहीं विचार
कुल क्षय दोष न देखते, मित्र द्रोह का पाप।।38।।
हम जानत क्षय दोष कुल, हे जगदीश्वर कृष्ण
क्यों न विचारें इस विषय जिससे पाप निवृत्त।।39।।

यद्यपि इन कौरवों की बुद्धि भ्रष्ट हो गयी है और भ्रष्ट बुद्धि के कारण कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्र द्रोह के पाप को यह लोग समझ नहीं पा रहे हैं परन्तु हे जगदीश्वर! क्या हम भी कुल के नाश से उत्पन्न होने वाले दोष के बारे में न सोचें? क्या इस पाप से हटने का विचार हमें नहीं करना चाहिए?

होत नाश कुल जाति का, कुल धर्म सनातन नष्ट
पाप सकल व्यापे तहाँ, होत धर्म के नष्ट ।। 40।।

हे श्री कृष्ण! कुल के नाश होने से सनातन काल से चला आ रहा कुल धर्म नष्ट हो जाता है। सम्पूर्ण कुल में पाप ही पाप फैल जाता है और धर्म का लोप हो जाता है।

बड़े पाप दावानल, नारी पापी होंय
नारी दूषित होंय जब, तेहि कुल संकर होय।। 41।।

हे कृष्ण! अधर्म के बढ़जाने से कुल की स्त्रियाँ व्यभिचारिणी हो जाती हैं क्योंकि युद्ध में पुरुषों के मारे जाने के कारण कुछ नाम मात्र के पुरुष ही बचे रह जाते हैं। स्त्रियों के दूषित हो जाने पर कुल में वर्ण संकर पैदा हो जाते हैं।

कुल घाती, कुल नरक में, संकर का परिणाम
पिण्ड श्राद्ध तर्पण नहीं, पितर अधोगति जान।। 42।।

वर्ण संकर कुल को नष्ट करने वालों सहित समस्त कुल को नरक में ले जाते हैं क्योंकि उन जन्म लेने वाले बच्चों के कुल और पिता का कुछ पता नहीं होता है। इसलिए वह श्राद्ध तर्पण और पिंड देने के अधिकारी नहीं होते हैं और यदि वह श्राद्ध तर्पण और पिंड क्रिया करते हैं तो भी उसका लाभ मृत आत्माओं को नहीं मिलता जिससे पितर नीच गति को प्राप्त होते हैं।  

वर्ण संकर दोष से, कुल धातिन अस हाल
जाति सनातन धर्म कुल, होय शीघ्र ही नाश ।। 43।।

कुल को नष्ट करने वाले मनुष्यों के वर्ण संकर दोष के कारण अनादि काल से चला आ रहा सनातन कुल धर्म नष्ट हो जाता और जाति धर्म भी नष्ट हो जाते हैं ।

जिनका कुल धर्म नष्ट है, सुनो द्वारिका नाथ
सुना अनिश्चय काल तक, करें नरक में वास ।। 44।।

हे द्वारिका नाथ! हे जनार्दन! जिन मनुष्यों का कुल धर्म नष्ट हो जाता है उस कुल के पितर और स्वयं वह मृत्यु के पश्चात अनिश्चित काल तक नरक में रहते हैं, इस बात को हम सुनते आये हैं।

राज लोभ से हम यहाँ, स्वजनों का ही घात
महापाप को हम हुए, करने को तैयार।। 45।।

यह बहुत ही शोक और दुःख की बात है कि हम लोग महान पाप करने को तैयार हो गये हैं और राज्य एवं सुख के लोभ से वशीभूत होकर अपने बन्धु बान्धवों को मारने के लिए तैयार हो गये हैं।

सामना न युद्ध में, शस्त्र हाथ में नहीं
धातृराष्ट्र मार दें, कल्याणकारी वह कहीं ।। 46।।

हे श्री कृष्ण! अतः मैं समझता हूँ कि युद्ध करना बेकार है और यदि मुझ शस्त्र रहित और युद्ध में सामना न करने वाले की कौरव हत्या कर दें तो भी मरना मेरे लिए परम कल्याण कारक होगा।

रण भूमि में संतप्त अर्जुन सर धनुष को त्यागकर
शोक से उद्विग्न मन ले, बैठ रथ के पृष्ठ में।। 47।।

संजय बोले हे राजन! युद्धभूमि कुरुक्षेत्र में शोक से उदिग्न मन वाला अर्जुन यह कहकर कि मैं युद्ध नहीं करूँगा चाहे कौरव मुझे मार डालें और वह बाण सहित धनुष को त्यागकर रथ के पिछले हिस्से में बैठ गया।


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1 comment:

  1. AAP KA GYAN BAHUT DEEP HAI KRIPYA KARKE APNE GYAN KI DHARA AUR BHAGWAN KE SRI VACHNO KA PRASAD MUJHE DENE KI KRIPA KAREN.

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