जिन पुरुषों व योगियों को आत्म ज्ञान नहीं होता उनके अन्दर अज्ञान की स्थिति धुएं, रात्रि, कृष्ण पक्ष एवं दक्षिणायन के छःमाह जैसी तमस युक्त (अज्ञान मय) होती है। वह तमस के कारण अन्ध लोकों अर्थात अज्ञान में भटकते रहते हैं, कालान्तर में उनके सतकर्मों के कारण जो उन्हें चन्द्र ज्योति अर्थात ज्ञान का प्रकाश मिलता है उसके परिणाम स्वरूप इस संसार में पुनः जन्म लेते हैं।
वसंतेश्वरी भगवद्गीता - प्रो बसन्त प्रभात जोशी
आठवाँ
अध्याय-अक्षरब्रह्मयोग
ब्रह्म क्या, अध्यात्म क्या, कर्म क्या पुरुषोत्तम
कहते किसे अधिभूत हैं, अधिदेव किसको जानते।।1।।
अर्जुन बोले- हे श्री कृष्ण! ब्रह्म क्या है, अध्यात्म क्या है, कर्म क्या है, अधिभूत क्या और अधिदैव किसको कहते हैं?
कौन यहाँ अधियज्ञ है, कैसे बैठा देह
अन्त समय प्रभु किस
तरह, युक्त चित्त हो
ज्ञेय।।2।।
हे मधुसूदन! अधियज्ञ किसे कहते हैं तथा इस देह में
उसका क्या स्थान है और जो आपके आत्म रूप में नित्य युक्त चित्त पुरुष हैं उन्हें
मृत्यु के समय आपका स्वरूप किस प्रकार जानने में आता है?
नाश रहित परब्रह्म है, स्वभाव अध्यात्म
ज्ञान
भाव हो भूतों का
जिससे, विसर्ग कर्म है जान।।3।।
श्री भगवान अर्जुन को बताते हुए कहते
हैं, परम अक्षर अर्थात जिसका
कभी नाश नहीं होता वह निराकर रहे अथवा देह धारण करे वह सदा नित्य रहता है। ब्रह्म
स्वभाव अध्यात्म के नाम से जाना जाता है। ब्रह्म की अपरा (जड़) और परा (जीव)
प्रकृति ही उसका स्वभाव है। इसी प्रकार जीव का स्वभाव ही उसका स्वधर्म है। अव्यक्त
जो जीव है, आत्मा है, विश्वात्मा है में
बिना किसी कर्ता के प्रत्यक्ष दिखाई देने वाला जो आकार उत्पन्न करने का कार्य चलता
जा रहा है, उसे कर्म कहते हैं, इसी प्रकार जो प्राणियों के भावों को
उत्पन्न करे वह कर्म है।
नाशवान अधिभूत हैं, पुरूष दैव अधि जान
जान देह अधियज्ञ मैं, पार्थ तत्त्व तू
जान।।4।।
सब उत्पत्ति विनाश वाले पदार्थ अधिभूत
हैं जैसे मनुष्य शरीर अधिभूत है। मनुष्य की बुद्धि अहंकार मन आदि भी अधिभूत हैं। पृथ्वी, जल अग्नि, वायु, आकाश भी अधिभूत हैं। जीवात्मा अधिदैव
है। इसे हिरण्यमय पुरुष भी कहा गया है। इसे सूत्रात्मा के रूप में भी जाना जाता
है। हे अर्जुन! मैं इस शरीर में अधियज्ञ
हूँ अर्थात विशुद्ध आत्मा, विश्वात्मा मैं ही हूँ।
इस शरीर में परमात्मा अधिदैव और अधियज्ञ दोनों रूप से प्रतिष्ठित हैं। अधिदैव के
रूप में वह कर्ता भोक्ता है तो अधियज्ञ के रूप में दृष्टा है ।
अन्त काल इस देह को, मम सुमिरन कर त्याग
इसमें संशय है नहीं, मम स्वरूप को
प्राप्त।।5।।
हे अर्जुन! मृत्यु के समय भी जो मुझ अधियज्ञ परमेश्वर
को स्मरण करता हुआ शरीर त्यागता है वह स्वयं अधियज्ञ स्वरूप विश्वात्मा हो जाता
है। ‘यथा मति तथा गति‘ के नियम की पुष्टि की है। जो समझ जाता
है कि देह नश्वर है, जीवात्मा ब्रह्म ही है, भ्रम वश और कर्म वश आत्मा (ब्रह्म) को
जीव भाव की प्राप्ति हुयी है, वह स्वयं अपने देह
में बैठे साक्षी आत्मतत्व में स्थित होकर रमण करते हुए, इस शरीर को त्यागते हुए आत्म स्वरूप हो
जाता है क्योंकि उसके कर्म साक्षी भाव से स्थित रहने के कारण नष्ट हो जाते हैं।
अन्तकाल जिस भाव से, करें देह का त्याग
भावति भाव सदा वही, उसी भाव को प्राप्त।।6।।
हे अर्जुन! मृत्यु के समय जो जिस जिस भाव
का स्मरण करता है, देह को त्यागकर उसी
भाव को प्राप्त होता है। मरने के समय जिस विषय में बुद्धि स्थित होती है तदनुसार मरणोपरान्त
गति प्राप्त होती है। देह बुद्धि है तो देह प्राप्त होगा। इसी प्रकार जिस कर्म में
बुद्धि है, देह प्राप्त कर वह
कर्म होगा। आत्म बुद्धि है, तो आत्म स्वरूप को
प्राप्त होगा।
प्रतिपल भज मुझको सदा
और युद्ध रत होय
मम अर्पित मन बुद्धि
से प्राप्त मुझे तू होय।।7।।
अतः हे अर्जुन! तू हर समय मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। हमेशा जाग्रत भाव से साक्षी स्वरूप आत्मा द्वारा सभी कर्मों को देखता हुआ
कर्म कर। कर्म देखते हुए करेगा तो वह कर्म स्वतः निष्काम होता जायेगा क्योंकि
साक्षी भाव के कारण कर्ता भाव या जीव भाव समाप्त हो जायेगा और शुद्ध आत्मभाव या ब्रह्म भाव रहेगा। मुझमें अर्पित
मन बुद्धि से तू मुझ आत्म रूप में स्थित होकर मुझे (आत्मतत्व को) प्राप्त होगा।
पार्थ, निरन्तर दत्त चित्त, करे योग अभ्यास
पुरुषोत्तम को
प्राप्त नर, परम दिव्य प्रकाश।।8।।
हे पार्थ! निरन्तर अभ्यास करते हुए जो आत्मतत्व से
जुड़ जाता है, आत्म योग युक्त हो जाता है तथा लगातार आत्मरत रहता है, इधर उधर उसका मन नहीं भटकता, ऐसा योगी निरन्तर चिन्तन द्वारा आत्मरत
हुआ परम दिव्य पुरुष (आत्म स्वरूप) को प्राप्त होता है। आत्मरत हुआ वह स्वतः आत्मा, विश्वात्मा हुआ पर
ब्रह्म परमात्मा हो जाता है।
भज सर्वज्ञ अनादि को, अणु से अणु रवि तेज
शासक, धाता अचिन्त्य जो, तमस परे शुचि रूप।।9।।
जो परमात्मा परमाणु से भी अत्यन्त
सूक्ष्म है; आकार रहित है,
सर्वज्ञ
है, इस सृष्टि का मूल है, अनादि है, जिससे संसार के सभी चर अचर अनुशासित
होते हैं, जो सबकी उत्पत्ति का
कारण है, जो सबका धारण पोषण
करने वाला है, जो नित्य चैतन्य है, जिसका चैतन्य सूर्य
के समान अपनी चेतना से सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित कर रहा है, जहाँ अज्ञान का अंश मात्र भी नहीं है ऐसे परम परमात्मा का जो पुरुष सदा स्मरण
करता है।
अन्तकाल वह योग बल, प्राण भृकुटि कर थाप
निश्चल मन भज दिव्य
को, परम पुरुष को
प्राप्त।।10।।
वह स्वरूप स्थिति पुरुष अन्त काल में भी
योग बल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके अर्थात सम्पूर्ण
चिन्तन भौंहों के मध्य में स्थित करके ध्यानस्थ हो, न डिगने वाले मन से दिव्य आत्म स्वरूप
परब्रह्म का स्मरण करता हुआ उससे तदाकार हो जाता है। इस विषय में महत्वपूर्ण बात
यह है कि विचार और क्रिया पर प्राण वायु की गति कम और अधिक होती है, विचार रूकते ही प्राण रुक जाता है और किसी एक स्थान पर विचार
केन्द्रित करने पर प्राण उस स्थान पर केन्द्रित हो जाता है।
जिसे वेद विद अक्षर
कहें, रागवीत जँह जात
ब्रह्मचर्य जिसके लिए, सुन लघु में वह पाद।।11।।
जिस परमात्मा को ज्ञानीजन अक्षर, जिसका कभी नाश नहीं होता है, कहते हैं; जिस दुर्लभ पद में कामना रहित होकर, यत्नशील सन्यासी और
निष्काम कर्म योगी प्रवेश करते हैं अर्थात परमात्मा से तदाकार होकर उसका स्वरूप हो
जाते हैं, जिस परम पद की इच्छा
वाले सदा ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं, वह
परम पद कैसा है? कैसे प्राप्त होता है? उसे हे अर्जुन तू ध्यान पूर्वक सुन।
सब द्वारों को रोककर, मन को हृदि में थाप
प्राणधार मस्तक परम
आत्मयोग स्थाय।।12।।
ओंकार पर ब्रह्म है, व्यवहार मम चिन्तन
करे
अन्तकाल तजि देह वह, परमगती को पाय।।13।।
इन्द्रियों के द्वारों को बन्द
करके मन को हृदय हृदय द्वारा रोककर, प्राण को मस्तक में स्थापित करे। मन को हृदय से
रोकना क्या है? यह सूत्र
ध्यान की कुंजी है। मन का अर्थ है विचारों के संघर्ष का केंद्र। मनुष्य के लिए यह किस प्रकार
सम्भव है की वह मन द्वारा मन को वश में करे। इसलिए श्री कृष्ण कहते हैं मन को हृदय द्वारा निरुद्ध करे। यहाँ हृदय का मतलब
मनोवैज्ञानिक ह्रदय से है जहाँ कोई संघर्ष नहीं होता है। यह भौतिक हृदय के दायीं और
छाती के बीचों बीच होता है। कुण्डलिनी योग की भाषा में इस
मनोवैज्ञानिक हृदय स्थल को अनाहत चक्र कहते हैं। मनुष्य के पास ऐसा क्या है
जहाँ कोई संघर्ष न हो? वह है
मनुष्य की शुद्ध बुद्धि। शुद्ध बुद्धि होते ही
इन्द्रियाँ भटकना बंद कर देती हैं, उनकी वृत्ति समाप्त हो जाती है
और मन संघर्ष रहित होकर शांत हो जाता है। कुण्डलिनी योग में वर्णित
अनाहत चक्र के नीचे के चक्रों में अशुद्ध और सांसारिक बुद्धि होती है। अनाहत चक्र और इसके ऊपर बुद्धि
शुद्ध होती है और अनाहत चक्र या ह्रदय स्थल से नीचे के चक्रों में मन का नियंत्रण
है जहाँ बुद्धि मिश्रित और अशद्ध होने से सदा संघर्ष रहता है।. इस स्पष्टीकरण से तात्पर्य है कि साधक द्वारा
मन को जहाँ केवल संघर्ष है, ऐसी
संघर्ष युक्त बुद्धि को, शुद्ध
बुद्धि में लय करना आवश्यक है। इससे पहले कोई भी कभी भी साधक
ध्यान में स्थित नहीं हो सकता है। शुद्ध बुद्धि से नियंत्रित
किया गया मन स्वतः शांत हो जाता है।
अब कृष्ण कहते हैं अब प्राण
अर्थात जीवन शक्ति को को मस्तक में स्थापित करे। जैसे ही शुद्ध बुद्धि द्वारा
पकड़ा हुआ मन संघर्ष रहित होकर शांत हो जाता है, उस समय
एक अद्धभुत शक्ति उत्त्पन्न होती है जिसे हम कुण्डलिनी शक्ति के नाम से जानते हैं। इस शक्ति को मस्तक में धारण
करे। इसके मस्तक में पहुंचते ही योग
हो जाता है। जब यह कुण्डलिनी शक्ति मस्तक
में पहुँच जाती है तब साधक को सत्य का ज्ञान हो जाता है और वह उस सर्वोच्च दिव्यसत्ता
का अनुभव करता है।. वह साधक जब सत्य की अनुभूति कर लेता है तब वह जान जाता है
कि मैं ही ओंकार हूँ, मैं ही
ब्रह्म हूँ, मैं ही
हूँ और इस सत्य जागृति को वह जीवन पर्यन्त सदा अनुभव करता है, जब जागृति में ही अपनी इच्छा अनुसार अपने देह का त्याग करता
है और सर्वोच्च सत्ता से तदाकार हुआ हमेशा उस गति को अर्थात उस अवस्था को अनुभव
करता है।
सर्वप्रथम यह जानना आवश्यक है
कि बुद्धि क्या है? लोग मन
को ही बुद्धि समझते हैं। मन तीन शक्तियों से निर्मित
होता है, यह हैं अज्ञान, विक्षेप शक्ति और बुद्धि।. मन में अज्ञान और विक्षेप
शक्ति बुद्धि का हरण कर लेते हैं. सरल भाषा में मन वह है जो या तो पिछला सोचता है या आगे
की सोचता है। यह हमेशा सोचता है। यहाँ बुद्धि सदा भ्रमित रहती
है. बुद्धि वह है जो पिछला देख सकती है, वर्तमान देखती है और उच्च स्तर
पर भविष्य भी देखती है। प्रश्न यह है कि हमारा सामजिक
ढांचा मन का विकास करता है और जब समझ आती है तब तक आयु का बड़ा हिस्सा निकल जाता
है। फिर भी निरीक्षण करते हैं कि बुद्धि किस प्रकार
विकसित की जाय या बुद्धि में किस प्रकार टिका जाय। सामान्य उत्तर तो यह है कि
अज्ञान और विक्षेप शक्ति का नाश कर दिया जाय। पर क्या यह सरल है? हम यहाँ सरल उपाय खोजेंगे। 1-भोजन सरल और सात्विक हो जो आयु
और स्वास्थ्य बढ़ाने वाला करना चाहिए। न अधिक खाना चाहिए न भूखा रहना
चाहिए. संतुलित भोजन करना पहला कार्य है। प्रति दिन स्नान और शरीर की
सफाई, नियमित
रूप से घूमना तथा व्यायाम या योगासन और प्राणायाम करना चाहिए। 2-प्रति दिन अच्छा स्वाध्याय करना, भजन सुनना और भजन करना चाहिए।. 3-अकारण नहीं बोलना, कोई भी चेष्टा अकारण न करना, अकारण कर्म न करना. दूसरे की
निंदा, चुगली से
बचना. आडम्बर न करना, पाखण्ड नहीं
करना चाहिए। 4- सभी मनुष्यों चाहे वह गरीब हो, अमीर हो, छोटा हो बड़ा हो, सबका आदर करना. पशु ,पक्षियों और वनस्पति जगत से से प्रेम और
आदर करना। जड़ प्रकृति के प्रति भी आदर
भाव होना चाहिए. 5- हृदय में सब प्राणियों के प्रति
करुणा रखना। 6-एक वैज्ञानिक का स्वाभाव रखना
जो नई वस्तु खोजता है। 6-प्रति
दिन जितना हो सके अपने मस्तक में दोनों भोंहों के मध्य अपने को स्तिथ करना इससे
विक्षेप शक्ति का नाश होता है।. यह उपाय इतने सरल हैं कि कोई भी मनुष्य कर सकता है, तभी बुद्धि विकसित होगी और मन शांत होकर स्थिर हो जाएगा।
अनन्य चित्त से युक्त
हो, भजे सदा मम नाम
सहज सदा हूँ मैं सुलभ, नित्ययुक्त सो योगी।।14।।
हे अर्जुन! इसलिए जो पुरुष अनन्यता से सदा आत्मरत
हैं, सदा आत्म चिन्तन करता
है, (यही पुरुषोत्तम
परमात्मा का चिन्तन है) उस नित्य निरन्तर आत्मरत योगी के लिए मैं आत्मतत्व सहज ही सुलभ
हूँ।
परम सिद्धि को
प्राप्त जन, पाते मेरा धाम
पुनर्जन्म बन्धन कटे, दुख से हो विश्राम ।।15।।
परम सिद्धि को पाकर अर्थात आत्म स्थित
होकर स्वरूप लाभ प्राप्त कर महात्मा जन ब्रह्म स्वरूप हो जाते हैं और ब्रह्म योगी पुनः
पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होते अर्थात उनका देह धारण व देह त्याग उनकी इच्छा से
होता है। वह जन्म नहीं लेते वह प्रकट होते हैं। पूर्ण ज्ञान को उपलब्ध यह योगी
पुरुष माया के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं।
ब्रह्म लोक पर्यन्त
तक पुनरावर्ती लोक
पार्थ प्राप्त होकर
मुझे पुनर्जन्म विश्राम।।16।।
हे अर्जुन! ब्रह्मा जी के लोक तक जितने भी लोक हैं
उन सबका समय निश्चित है। सभी पुनर्जन्म के
चक्र में जकड़े हैं। केवल मुझे प्राप्त होकर अर्थात जो आत्म स्वरूप होकर अपने को
मुझमें लीन कर देता है, वह देह धारण व देह
त्याग के बन्धन से मुक्त हो जाता है। अनाहत चक्र तक जिस स्थान में चिन्तन होता है तदनुसार
जीव की गति होती है, यहाँ तक जीव माया के
बन्धन में रहता है, वह परवश होकर जन्म
मृत्यु के चक्र में फंसा रहता है। चिन्तन जब भृकुटि के मध्य होकर आत्म स्वरूप में
लय हो जाता है तो माया बन्धन से मुक्त हो जाता है उसका माया के द्वारा आवागमन
समाप्त हो जाता है वह निज इच्छा से ही प्रकट होकर देह धारण करता है।
रात्रि दिवस ब्रह्मा
रचा सहस चतुर युग काल
जो जानत इस तत्व को, जान काल का हाल।।17।।
ब्रह्मा जी के दिन-रात्रि के विषय में
बताते हुए श्री भगवान कहते हैं,
कि
ब्रह्मा जी का एक दिन एक हजार चतुर्युगी अवधि का होता है। सतयुग 1,72,8000
वर्ष + त्रेता 12,96,000
वर्ष + द्वापर 8,64,000 वर्ष
+ कलियुग 4,32,000 वर्ष
गुणा 1000 वर्ष = कुल 4,32,00,00,000
वर्ष।
इसी प्रकार एक रात्रि
4,32,00,00,000 वर्ष की होती है। इस प्रकार जो पृथ्वी की कुल आयु को जानते हैं वह
काल तत्व को जानते है। इस गणना के आधार पर यदि एक दिन (12 घण्टे) के आधार पर गणना
की जाय तो पृथ्वी की कुल आयु 4,32,00,00,000 निश्चित है। यदि रात दिन (24 घण्टे) की
अवधि के आधार पर पृथ्वी आयु मानी जाए तो यह 8,64,00,00,000 वर्ष निश्चित है।
यहाँ पृथ्वी की आयु बताते हुए नश्वरता
को बताया है। कोई वस्तु आज नष्ट हो रही है कोई कल नष्ट होगी तो कोई चार, छह, हजार, लाख वर्ष बाद। सृष्टि नाशवान है और
अविनाशी केवल परमात्मा है।
सभी व्यक्त अव्यक्त
से, प्रकट दिवस आरम्भ
रात्रि विलय होते
पुनः, सूक्ष्म ब्रह्म के
देह।।18।।
सभी भूत उत्पन्न हों, आरम्भ रात्रि में लीन
दिन प्रवेश उत्पन्न
फिर, वशी प्रकृति सुन
पार्थ।।19।
ब्रह्मा जी के दिन के प्रारम्भ होते ही
अव्यक्त; निराकार सूत्रात्मा से चराचर भूत गण उत्पन्न होते हैं और जब रात्रि
होती है तब उसी अव्यक्त सूत्रात्मा में सभी भूत लीन हो जाते हैं, पुनः माया (प्रकृति) के वश हुए रात्रि में
प्रवेश तथा दिन के आगमन पर पुनः उत्पन्न होते हैं अर्थात परमात्मा की जीव शक्ति ही
जन्म और लय का कारण है।
अपर भाव अव्यक्त से, अव्यक्त सनातन भाव
सकल भूत के नाश पर, उसका होय न नाश।।20।।
परन्तु जो उस अव्यक्त जीवात्मा से भी
अव्यक्त (आत्मा, ब्रह्म, परमात्मा) है, वह समस्त भूतों के नष्ट होने पर भी नष्ट
नहीं होता अर्थात सभी जीवात्मा सहित ब्रह्मा जी भी उसी अव्यक्त परमात्मा में समा
जाते हैं।
अव्यक्त अक्षर है कहा, परमगती वह जान
जिसे पाय लौटे नहीं, परम है मेरा धाम।।21।।
अव्यक्त परमात्मा अक्षर कहा जाता है।
अव्यक्त शब्द से परमात्मा के विषय में कुछ नहीं जाना जाता उसे जानने के लिए उसे अक्षर
अर्थात जिसका नाश नहीं होता है कहा गया। इसी अव्यक्त की प्राप्ति परम गति है। इसे
स्वरूप स्थिति भी कहते हैं। इसे ही आत्म स्थित होना, विश्वात्मा होना भी कहा गया है।
यही ब्राह्मी स्थिति भी है। यह वह स्थिति है जिसे प्राप्त कर माया के बन्धन से
मुक्ति मिल जाती है। प्रकृति द्वारा उसकी जन्म-मृत्यु नहीं होती बल्कि वह स्वयं वह
अपने कारण हो जाते हैं। इसी परम स्थिति को परमात्मा का स्थान कहा गया है।
जिसके भीतर भूत हैं, जग जिससे परिपूर्ण
एक भक्ति से लब्ध वो, परम पुरा पूरन पुरुष।।22।।
हे अर्जुन! जिस अव्यक्त परमात्मा के
अन्दर ब्रह्मा जी सहित समस्त जीव और समस्त प्रकृति स्थित हैं, जो परमात्मा इस सृष्टि में सर्वत्र
व्याप्त है, वह पुरुष अनन्य भक्ति
से ही प्राप्त किया जा सकता है। अनन्यता अर्थात निरन्तर यत्न, अभ्यास करना, स्वरूप अनुसंधान को भक्ति कहते हैं। मैं
कौन हूँ ? इस आत्म तत्व की खोज करना है। इसके लिए निरन्तर परमात्मा के नाम “ऊँ“ का सदा व्यवहार में स्मरण करना; मन, बुद्धि, चित्त को सदा प्रयत्न
करके परमात्मा में लगाना, सदा उसका चिन्तन करना, उसी के लिए कर्म करना भक्ति है। हमेशा
जाग्रत भाव से संसार और समस्त क्रियाओं का देखना, साक्षी भाव से हमेशा परमात्मा को अनुभव करना
आदि जिस किसी माध्यम से स्वरूप अनुभूति हो वह
भक्ति है ।
अनावृत्ति, आवृत्ति को, योगी करते प्राप्त
देह त्याग जिस काल में, पार्थ जान तू काल।।23।।
यहाँ मृत्यु के बाद जीव की गति का रहस्य
बताते हुए भगवान श्री कृष्ण चन्द्र,
अर्जुन
से कहते हैं, जिस काल में शरीर
त्याग कर योगी ब्रह्म स्वरूप होकर आवागमन से मुक्त हो जाते हैं अर्थात माया के और
बन्धन को तोड़ डालते हैं और जिस काल में फिर से माया के चक्र में फंसे कर्म
बन्धनों के फलस्वरूप वापस लौटते हैं, उन
दोनों स्थितियों को मैं तुझे बताता हूँ।
ज्योति, अगिन, अहः, शुक्ल, षड मास उत्तर अयन के
प्राप्त ब्रह्म को
ऐहि विधि, विज्ञ ब्रह्म हे
पार्थ।।24।।
जो योगी ज्योति, अग्नि, दिन, शुक्ल पक्ष, उत्तरायण, के छह माह में देह त्यागते हैं अर्थात
जिन पुरूषों और योगियों में आत्म ज्ञान का प्रकाश हो जाता है, वह ज्ञान के प्रकाश से ज्योर्तिमय, अग्निमय, शुक्ल पक्ष की चांदनी के समान प्रकाशमय और उत्तरायण के
छह माहों के समान परम प्रकाशमय हो जाते हैं। यहाँ आत्मज्ञानी के ज्ञान की तुलना प्रकाश की मात्रा से की है।
ऐसे आत्मवान विश्वात्मा परमात्मा हुए पुरुष, अव्यक्त हो जाते हैं। स्वयं परम ब्रह्म
हो जाते हैं। यहाँ बोध
की भिन्न भिन्न मात्रा को प्रकाश की भिन्न भिन्न की मात्रा से बताया गया है साथ ही
यह भी बताया है कि बोध प्राप्त योगियों की स्थिति भी प्रकाश की मात्रा की तरह
भिन्न भिन्न होती है।
धूम, रात्रि तथा कृष्ण, षड
मास दक्षिण अयन के
ज्योति चन्द्र की
प्राप्त कर आवृत्ति को हो प्राप्त।।25।।
धुंआ, रात्रि, कृष्ण पक्ष एवं दक्षिणायन के छह माहों
में जो देह त्यागते हैं, वह चन्द्रमा की
ज्योति को प्राप्त करके पुनः लौटते हैं अर्थात जिन पुरुषों व योगियों को आत्म
ज्ञान नहीं होता उनके अन्दर अज्ञान की स्थिति धुएं, रात्रि, कृष्ण पक्ष एवं दक्षिणायन के छःमाह जैसी
तमस युक्त (अज्ञान मय) होती है। वह तमस के कारण अन्ध लोकों अर्थात अज्ञान में भटकते
रहते हैं, कालान्तर में उनके
सतकर्मों के कारण जो उन्हें चन्द्र ज्योति (ज्ञान) का प्रकाश मिलता है उसके
परिणाम स्वरूप इस संसार में पुनः जन्म लेते हैं। यहाँ अज्ञान की मात्रा को
अन्धकार की भिन्न भिन्न की मात्रा से बताया गया है साथ ही यह भी बताया है जिन पुरुषों व
योगियों को आत्म ज्ञान नहीं होता उनमें अज्ञान की
स्थिति अन्धकार की मात्रा की तरह भिन्न भिन्न होती है तदनुसार लौट कर उन्हें कर्म फल भोगने पड़ते हैं.
.
होय जगत में आदि से, शुक्ल कृष्ण गति
ज्ञात
एक गये आवृत्ति हो, अन्य अनावृत्ति जान।।26।।
इस जगत में दो प्रकार के मार्ग हैं, पहला, शुक्ल
मार्ग अर्थात ज्ञान मार्ग जहाँ ज्ञानी देह
छोड़ने से पहले आत्म स्थित हो जाता है और दूसरा, कृष्ण मार्ग जहाँ सकामी योगी व पुरुष
शुभ और अशुभ कर्मों के कारण अज्ञान के मार्ग में जाता है तथा ज्ञान का अंश प्राप्त
होने पर कर्मानुसार पुनः इस संसार में जन्म लेता है।
तत्व जान इस मार्ग का, योगी मोह न होय
सम धी अर्जुन काल सब, योग युक्त तू होय।।27।।
इस प्रकार इन दोनों ज्ञान और अज्ञान
(आसक्त कर्म) के मार्ग तत्व से जानकर योगी भ्रमित नहीं होता तथा हे अर्जुन, सभी स्थितियों में बुद्धि द्वारा परमात्मा
से सदैव जुड़ा रहता है और आत्मरत रहता है। इस प्रकार पूर्ण ज्ञान को स्वतः ही
उपलब्ध हो जाता है।
वेद, यज्ञ, तप, दान के, पुण्य अल्प हैं पार्थ
जान तत्व योगी पुरुष, परमधाम को प्राप्त।।28।।
योगी पुरुष ज्ञान और अज्ञान के मार्ग को
तत्व से जानकर तथा अध्यात्म, अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ को भली प्रकार समझते हुए परम
अव्यक्त दिव्य पुरूष को जानकर, वेद, शास्त्र, ईश्वर निमित्त कर्म, तप, दान आदि के जो पुण्य फल हैं उन सबका उल्लंघन
उसी प्रकार कर जाता है जैसे अपार जलाषय
मिलने पर छोटी बावड़ी का प्रयोजन लगभग बेकार हो जाता है, सूर्योदय होने पर दीपक की ज्योति का कोई
प्रयोजन नहीं रहता है और परम सनातन स्थिति को प्राप्त होता है
.....................................
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