Wednesday, August 24, 2011

छठा अध्याय-आत्मसंयम योग



तू यह समझ ले कि तू ही परम ज्ञान स्वरूप शुद्ध  चैतन्य आत्मा है और तुझ में ही स्वयं सामर्थ है कि तू अपना उद्धार करे।
यह योग न बहुत खाने वाले का और न बिल्कुल खाने वाले का तथा न बहुत शयन करने वाले का न अधिक जागने वाले का सिद्ध होता है।
         

                                         वसंतेश्वरी भगवद्गीता  - प्रो बसन्त प्रभात जोशी
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                                                        छठा अध्याय-आत्मसंयमयोग

तजे अग्नि, नहिं अक्रिय, नहिं योगी सन्यास
तज आश्रय सब कर्म फल, कार्य कर्म स्वीकार।।1।।

श्री भगवान बोले:- हे अर्जुन! कर्म फल की इच्छा न करते हुए जो पुरुष कर्म करता है वह सन्यासी है तथा वही कर्म योगी है कर्म योगी और सन्यासी (ज्ञानी) एक ही हैं। केवल अग्नि का त्याग करने वाला अर्थात गृहस्थ धर्म को चूल्हा चौके के झंझट से छोड़ने वाला सन्यासी नहीं है और जिसने हठ पूर्वक क्रियाएँ अर्थात कर्तव्य कर्म छोड़ दिये हैं और मन से उनका स्मरण करता हुआ आडम्बर पूर्ण व्यवहार करता है वह कर्म योगी नहीं है।

वही योग है पार्थ सुन, कहलाता सन्यास
संकल्पों में लिप्त जन, योगी कभी न जान।।2।।

हे अर्जुन! जिसको सन्यास अथवा ज्ञान कहते हैं उसी को तू कर्म योग जान परन्तु जिसने संकल्प (इच्छाओं) का त्याग नहीं किया हो ऐसा कोई भी पुरुष योगी नहीं हो सकता है। जो कामना रहित है वही ज्ञानी है, वही अनासक्त होकर कर्म करता हुआ कर्म योगी है।

चढ़ना चाहे योग मुनि, कर्म हेतु तू जान
योग चढ़े मुनि के लिए, शम है कारण जान ।।3।।

जो पुरुष योगारूढ़ होना चाहता है उसके लिए बुद्धि द्वारा निरन्तर निष्काम होकर, कर्म हेतु हैं। योगारूढ़ होने के लिए विभिन्न साधन पद्धतियों में भिन्न भिन्न प्रकार के कर्म बताए हैं। महर्षि पातंजलि ने आष्टांग योग का विस्तार से वर्णन किया है। भगवान श्री कृष्ण चन्द्र जी ने योगारूढ़ होने के लिए कुछ विधान बताये हैं:-
1 - आसन न अधिक ऊँचा न नीचा।
2 - सिर गरदन और शरीर को एक सीध में रखते हुए अन्य दिशा को न देखते हुए नासिका के अग्रभाग को देखते रहना। इस प्रकार मन को शान्त करना।
3 - तत्पश्चात प्राणों को भौहों के मध्य ले जाना।
4 ऊँ ही परमात्मा का नाम है, व्यवहार में उसका स्मरण करना।
जब ऐसा अभ्यासी पुरुष योगारूढ़ हो जाता है तो उसके सभी संकल्पों का अभाव हो जाता है और उसके सभी संकल्पों का अभाव कल्याण का हेतु है।

इन्द्रिय भोग न कर्म में, अनासक्त जेहि काल
सर्व संकल्प सन्यासी, योगारूढ़ कहात।।4।।

हे अर्जुन! योगारूढ़ पुरुष के लक्षण सुन। जिस व्यक्ति को परम ज्ञान हो जाता है वह इन्द्रियों के  भोगों व कर्मों में आसक्त नहीं होता है संसार में उदासीन वत विचरता है, उसके सभी संकल्प समाप्त हो जाते हैं।

कर स्वयं से उद्धार अपना, आप को तू ना गिरा
आप अपना मित्र है, आप अपना शत्रु  है।।5।।

तू यह समझ ले कि तू ही परम ज्ञान स्वरूप शुद्ध  चैतन्य आत्मा है और तुझ में ही स्वयं सामर्थ है कि तू अपना उद्धार करे। अपने को अधोगति की ओर न ले जा। अपने को शरीर मत समझ। अपने चिन्तन को शरीर और इन्द्रियों की ओर ले जाना अधोगति है। यह समझ ले तेरा चिन्तन ही तेरा शत्रु  है, तेरा चिन्तन ही तेरा मित्र है।

मन इन्द्रिय विजयी हुआ, आत्म उसी का मीत
देही जो ना जीतता, स्वयं उसी का शत्रु ।।6।।

जिस जीवात्मा ने मन बुद्धि चित्त अंहकार सहित इन्द्रियों व शरीर को जीत लिया है, जिसके वश में उसका मन व इन्द्रियाँ हैं, ऐसा अहंकार रहित आत्मा स्वयं अपना मित्र है परन्तु जो अनात्म वस्तुओं की ओर आसक्त है, मन इन्द्रियों सहित शरीर जिसके वश में नहीं है वह स्वयं अपने लिए शत्रु  के रूप में बरतता है। मैं शरीर हूँ यही स्थित भाव शत्रुता है, मैं आत्मा हूँ यही स्थित भाव मित्रता है। शरीर भाव से असीम सीमित हो जाता है। शरीर मैं सीमित हुआ आत्मा सभी दुःख सुख भोगता है और सदा काल के वश में हो जाता है।

सरदी गरमी, सुख-दुख, मान और अपमान
मन जीता चित शान्त हो, परमात्मा वह जान।।7।।

जिसने अपने मन को जीत लिया है, जिसकी वासनायें भलीभांति शान्त हो गयी हैं, जो परमात्मा में पूर्ण रूपेण स्थित हो चुका है, जिसे सभी कुछ ब्रह्ममय भासित होता है, ऐसे महात्मा पुरुष को सरदी गरमी, सुख दुख, मान अपमान आदि द्वन्द्व का आभास मात्र तक नहीं होता क्योंकि वह स्वरूप स्थिति में सदा निमग्न रहता है।

इन्द्री जय कूटस्थ जो, ज्ञान विज्ञान संतृप्त
माटी पत्थर स्वर्ग सम, युक्त योग सो जान।।8।।

स्वरूप स्थित योगी का अन्तः करण सदा ज्ञान विज्ञान से तृप्त रहता है, ऐसा इन्द्रिय जयी पुरुष जो विकार रहित है, उसके लिए मिट्टी, पत्थर, स्वर्ण सब एक समान हैं क्योंकि वह सदा ब्राह्मी स्थिति से युक्त है।

सुहृद, मित्र, मध्यस्थ, रिपु, बन्धु, द्वेष्य, निर्दोष
साधु और असाधु में, सम बुद्धि अतिश्रेष्ठ।।9।।

जो संसार के समस्त प्राणियों में चाहे वह सुहृद, मित्र, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेषी, बन्धु, धर्मात्मा या पापी हो, वह आत्म स्थित योगी जो सदा सम भाव रखता है, अत्यन्त श्रेष्ठ है। वह संसार को अपना स्वरूप समझता है। उसके लिए कौन मित्र और कौन बैरी। सभी को नारायण स्वरूप स्वीकार करते हुए वह स्वयं नारायण स्वरूप है।

आश रहित, संग्रह रहित योगी जो वश चित्त
एकाकी स्थित हुआ, आत्म निरन्तर चित्त।।10।।

भगवान श्री कृष्ण चन्द्र, अर्जुन को योग साधन का उपदेश देते हुए कहते हैं; अपने चित्त को वश में करके, सभी आशाओं का त्याग कर संग्रह रहित होकर योगी अकेला ही एकान्त स्थान में रहते हुए आत्मा में स्वयं को स्थित करे।

कुश मृगछाला वस्त्र को, शुद्ध  भूमि में राखि
अति नीचा ना ऊँच में, आसन स्थिर थापि।।11।।

साधना के लिए शुद्ध स्थान होना चाहिए। शुद्ध  स्थान से तात्पर्य है जहां के कम्पन अत्याधिक शुद्ध  और प्रभावशाली हो। यदि किसी योगी अथवा संत की तपस्थली रहा हो तो बहुत अच्छा। वैराग्य वहां स्वाभाविक रूप से जाग्रत हो जाता है। वहाँ कुश, मृगछाला अथवा गरम वस्त्र विछाये । वह स्थान न बहुत  ऊँचा हो न नीचा । वहाँ अपने आसन को स्थिर करके ध्यान के लिए बैठे।

क्रिया चित्त इन्द्रिय वशी, मन थिर आसन बैठ
अन्तःकरण की शुद्धि को, करे योग अभ्यास।।12।।

वहाँ स्थित होकर आसन में बैठकर चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में करते हुए मन को एकाग्र करे। इस प्रकार अन्तःकरण की शुद्धि के लिए योगाभ्यास करे।

काया ग्रीवा शीश को, थिर सम कर थिर होय
दृष्टि अग्र में नासिका, दिशा ज्ञान नहि होय।।13।।

शरीर, सिर और गले को एक सीध में अचल रूप से स्थित रक्खे और नासिका के अग्र भाग में द्रष्टि जमाये तथा किसी भी दिशा और जगह में अपनी द्रष्टि न डाले।

ब्रह्मचारी, भय रहित, युक्त सदा मन शान्त
स्थित निज चित मोर में, तत्पर वह मेरे सदा।।14।।

ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित होकर अर्थात जिसका मन विषयों की और न जाए, भय रहित शान्त अन्तःकरण वाला योगी पुरुष मन को रोककर मुझमें अपना चित्त स्थापित करते हुए स्वरूप स्थिति में स्थित होए।

वश में जिसका चित्त है, स्वयं आत्म थिर जान
परम शान्ति निर्वाण को, योग सिद्ध है प्राप्त।।15।।

जिसका मन उसके वश में है ऐसा योगी आत्मा को अपने स्वरूप में स्थित करता हुआ, परमात्म लाभ से प्राप्त होने वाली परम शान्ति को प्राप्त होता है।

जो भोजन बहु खात है, अरु भोजन नहिं खात
निद्रा जाग्रति बहु अधिक, होय सिद्ध नहिं योग।।16।।

यह योग न बहुत खाने वाले का और न बिल्कुल खाने वाले का तथा न बहुत शयन करने वाले का और न अधिक जागने वाले का सिद्ध होता है। साधक का सोना जागना, खाना पीना नियमित होना चाहिए तभी योग का अधिकारी होता है।

युक्ताहार विहार है युक्त चेष्टा कर्म
उचित जागरण बोध है, योग प्राप्ति दुख हानि।।17।।

जिसका आहार-विहार, चेष्टाएं, कर्म, जागना और सोना सभी यथा योग्य हैं, ऐसे संयमित पुरुष का दुखों का नाश करने वाला योग सिद्ध होता है।

वशी चित्त जेहि काल में, स्थित हो निज आत्म
भोग रहित, स्पृहा रहित, योग युक्त तेहि काल।।18।।

लगातार साधना से वश में किया हुआ चित्त जब स्वरूप में स्थित हो जाता है उस समय सभी विषय वासनाओं से योगी उदासीन हो जाता है। उसमें कोई कामना नहीँ रहती, वह आत्म तृप्त हुआ आत्म स्थित रहता है।

चंचल होता दीप नहिं, जहाँ वायु गतिहीन
ऐसी उपमा सो यती, आत्म स्थिर जेहि चित्त।।19।।

योगी जिसने अपने चित्त को आत्मा के साथ तदाकार कर लिया है, उसका चित्त फिर चंचल नहीं होता। वह उस दीपक की तरह स्थिर हो जाता है, जिसकी लौ वायु रहित स्थान में अचल रहती है। संसार की विषय वासनाएं उसके चित्त को चंचल नहीं कर पाती हैं।

निरुद्ध चित्त उपराम हो, जेहि काल योगाभ्यास
सूक्ष्म धी से देख आत्म, आत्म में संतुष्ट हो।।20।।

योग के अभ्यास वश में किया हुआ चित्त जिस समय आत्मा में अच्छी प्रकार स्थित होता है उस समय सभी कामनाओं से मुक्त इच्छा रहित योगी पुरूष आत्म स्थित हो जाता है। चित्त स्वयं आत्म रूप हो जाता है और सदा स्वरूप स्थिति में निमग्न रहता है।

इन्द्रिय परे जो परम सुख है, शुद्ध  बुद्धि जानता
प्राप्त कर योगी अवस्था, तत्व से विचलित नहीं।।21।।

यहाँ श्री भगवान अर्जुन को उपदेश देते हुए परम उत्तम रहस्य बताते हैं। आत्मतत्व केवल सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा ही जाना जा सकता है। बुद्धि के अलावा परमात्मा को पाने का अन्य कोई उपाय नहीं है। यदि अन्य उपाय जो बताये जाते हैं वह सभी बुद्धि के सहारे ही बढ़ते हैं। यह बुद्धि जो इन्द्रियों से अत्याधिक बलशाली है जब सूक्ष्म होकर निश्चित हो जाती है तब वह स्वयं महाबुद्धि में विलीन हो जाती है। वह महाबुद्धि ही अत्यन्त आनन्द है। महाबुद्धि को प्राप्त योगी स्वरूप स्थित होकर विचलित नहीं होता है।

प्राप्त कर जिस लाभ को, अपर उससे नहिं अधिक
प्राप्त कर योगी अवस्था, भारी दुख विचलित नहीं।।22।।

स्वरूप स्थिति को पाकर वह परम लाभ को प्राप्त हो जाता है। फिर उससे अधिक इस सृष्टि में दूसरा लाभ उसे कुछ भी नहीं दिखायी देता। आत्मतत्व स्थित योगी बड़े से बड़े दुःख से विचलित नहीं होता क्योंकि सुख दुःख उसके लिए समान हो जाते हैं।

संयोग वियोग दुःख है नहीं, जान उसको योग
विचलित जाका चित्त नहिं, साधे तब वह योग।।23।।

योग को अवश्य जानना चाहिए। योग ही ऐसा माध्यम है जो दुख रूपी संसार के संयोग से रहित है। यह योग निश्चय पूर्वक करना चाहिए। योग धैर्य रखते हुए करना चाहिए, उकताया हुआ चित्त विचलित हो जाता है, अतः धैर्य परम आवश्यक है।

संकल्प जन्मी कामना को, पूर्णता से त्याग कर
मन द्वारा निग्रह करे, सब इन्द्रिय सब ओर।।24।।

साधक संकल्प के प्रभाव से उत्पन्न होने वाली सभी कामनाओं को पूर्ण रूप से त्यागकर मन के द्वारा सभी इन्द्रियों को सब ओर से अच्छी प्रकार रोके।

क्रम से कर अभ्यास को
उपरति को हो प्राप्त
धृति धी से मन आत्म में
सब चिन्तन को त्याग।।25।।

इस क्रम से अभ्यास करता हुआ जब मन विषयों से स्वतः उपराम हो जाता है और विषयों की ओर भागना बन्द कर देता है तब धैर्य युक्त होकर बुद्धि द्वारा मन को आत्मा में स्थित कर कुछ भी चिन्तन न करे।

चंचल मन स्थित नहीं, डोलत विषय बाजार
रोक सभी विषयन इसे, कर निरुद्ध निज आत्म।।26।।

यह स्थित न रहने वाला चंचल मन जिस विषय में जाता है वहाँ से बार बार इसे हटा कर, स्वरूप चिन्तन में लगाये मन अपने स्वभाव व रुचि के कारण विषय की ओर भागता है। बार-बार आत्म चिन्तन में लगाने से उसका स्वभाव व रुचि विषय में से हटकर आत्म चिन्तन की ओर लग जाती है अतः निरन्तर दृष्टा होकर अभ्यास करना है।

जिसका मन प्रशान्त है, जिसका रज है शान्त
पाप रहित ब्रह्म भूत वह, उत्तम सुख को प्राप्त ।।27।।

इस प्रकार जिसके मन का भटकना बन्द हो गया है अर्थात चित्त स्थिर होकर शान्त हो गया है, ऐसे योगी को अक्षय आनन्द प्राप्त होता है। स्वरूप स्थित ऐसे योगी के सभी कर्म क्षय हो जाते हैं। वह मन के शान्त होते ही अनासक्त हो जाता है। यही नहीं मन शान्त होते ही उसका रजोगुण शान्त हो जाता है और सहज समाधि का वह अनुभव करता है।

सदा ब्रह्म रत आत्मा, वह योगी निष्पाप
अति सुख अनुभव सो करे, ब्रह्म प्राप्ति आनन्द।।28।।

जिसके सभी कर्म क्षय हो गये हैं ऐसा स्वरूप स्थित योगी स्वयं ब्रह्म लाभ करते हुए ज्ञान को प्राप्त होता है। परम ज्ञान को प्राप्त कर वह स्वतः परम शान्ति, परम आनन्द का अनुभव करता है।

सम दृष्टी सब में सदा, योग युक्त है आत्म
लख भूतों में आत्मा, आत्मा में सब भूत।।29।।

जो आत्मा से एक रूप हो चुका हो ऐसा स्वरूप स्थित योगी सभी में समभाव रखता हुआ सभी प्राणियों में स्वयं को स्थित देखता है तथा सभी प्राणियों को स्वयं में स्थित देखता है, इस प्रकार सभी भूतो से तदाकार हुआ तत्काल ब्रह्म स्वरूप हो समस्त सृष्टि में व्याप्त हो जाता है।

मुझको देखे सब जगह, सब जग मुझ में देख
ताहि अदृश्य न मैं रहूँ, वह नहिं मुझे अदृश्य।।30।।

विश्वात्मा हुआ वह योगी सभी में आत्म रूप से स्थित मुझे देखता है और सभी को मुझ विश्वात्मा के अन्दर समाहित देखता है। आत्म रूप हुए ऐसे योगी के लिए मैं विश्वात्मा अदृश्य नही हूँ और वह मुझ विश्वात्मा के लिए अदृश्य नहीं है हम दोनों एक हो जाते हैं। वह आत्म स्थित योगी ही विश्वात्मा हो जाता है। यहीं अन्तिम ब्राह्मी स्थिति है। यही योग का अन्तिम फल है।

सब भूतन स्थित मुझे, भजे जो एकीभाव
सब प्रकार वर्तमान वह, योगी वरते पार्थ।।31।।

जो योगी एकीभाव से स्थित होकर सभी प्राणियों में मुझ विश्वात्मा का दर्शन करता है, मुझे स्मरण करता है वह योगी शरीर में होते हुए भी देह और कर्म बन्धन से मुक्त हुआ स्वयं विश्वात्मा बन जाता है।

निज समान सम देखता, सब भूतन में पार्थ
सुख दुख को सम देखता, वह योगी अति श्रेष्ठ।।32।।

जो सभी भूतों को अपने समान ही मानता है क्योंकि सभी में वह स्वरूप स्थिति के ही दर्शन करता है। संसार के सभी सुख दुख को समान समझता है, वह योगी परम श्रेष्ठ है। उसमें और मुझमें कुछ भी अन्तर नहीं रहता क्योंकि वह विश्वात्मा हो जाता है।

समत्व भाव योग यह, मधुसूदन मुझसे कहा
वह स्थिर स्थित नहीं, मन चंचल बलवान।।33।।

महात्मा अर्जुन श्री भगवान से कहते हैं:-
हे मधुसूदन! जो आपने यह समत्व योग मुझे बताया है इसे मैं मन की चंचल स्थिति होने के कारण इसकी नित्य स्थिति (इसका ठहरना) नहीं देखता हूँ क्योंकि यह इन्द्रियों को बहा ले जाता है, बुद्धि को भ्रम में डाल देता है, यह एक प्रेत की तरह है जो हर समय हर दिशा में दौड़ता है।

मन अति चंचल कृष्ण है, द्रढ़ प्रमथन बलवान
वायु सम दुष्कर कठिन, इसका निग्रह जान।।34।।

इसी क्रम में अर्जुन कहते हैं:-
यह मन बहुत ही चंचल है, ताकतवर है, बड़ा हठी है, अत्यन्त बलवान है और कोई इसकी बात न माने उसे यह बड़ा दुखी कर देता है। ऐसे मन को रोकना मैं वायु रोकने के समान कठिन मानता हूँ।

निःसन्देह निग्रह कठिन, मन चंचल बलवान
अभ्यास और वैराग्य से, पार्थ होय वश जान।।35।।

श्री भगवान बोले:- हे अर्जुन! जो तूने मन के विषय में कहा वह निश्चय ही सत्य है। यह मन निसंदेह चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है परन्तु यदि कोई विषय वासनाओं से वैराग्य का अभ्यास करे अथवा इसके भटकने की आदत को रोकने का अभ्यास करे तो यह वश में आ जाता है।

जिसका मन वश में नहीं, उसे सुलभ नहिं योग
सहज सुलभ मन वश किया,यत्न पुरूष को होय।।36।।

जिस पुरुष के अन्दर वैराग्य नहीं है, जो निरन्तर अभ्यास नहीं करता है, उसका मन कभी भी वश में नहीं आ सकता है और जिसका मन वश में नहीं है उसे योग की प्राप्ति नहीं हो सकती है। जिसने निरन्तर अभ्यास और वैराग्य से अपने मन को वश में कर लिया है उस प्रयत्नशील मनुष्य के लिए साधन से योग प्राप्त होना सहज है।

श्रद्धा है संयम नही, चित विचलित हो योग
योग सिद्धि नहिं प्राप्त कर,कृष्ण कौन गति होय।।37।।

अर्जुन बोले हे देव! जो मनुष्य योग में श्रद्धा रखता है अर्थात आत्म ज्ञान चाहता है, अभ्यास करता है परन्तु संयमी नहीं है, इस कारण योग से जिसका मन विचलित हो गया है, वह स्वरूप स्थिति (योग सिद्धि) को न पाकर किस गति को प्राप्त होता है ?

छिन्न भिन्न आश्रय रहित, ज्यों बादल हो नष्ट
मोहित चित आश्रय रहित, योग भ्रष्ट हो नष्ट।।38।।

क्या आत्म ज्ञान के मार्ग से मोहित मन के द्वारा भटकाया गया वह पुरुष दोनों ओर से भ्रष्ट तो नहीं हो जाता? क्योंकि न वह संसार को पूर्ण रूपेण भोग पाता है और न उसे परमार्थ ही प्राप्त होता है। कहीं वह आश्रय रहित बादल की तरह दोनों ओर से नष्ट तो नहीं हो जाता?

करो नष्ट संशय मम, कृष्ण तुम्हीं इस योग्य
नहिं कोऊ संसार में, कर संशय को नष्ट ।।39।।

हे भगवन, मेरे इस संशयको केवल आप ही नष्ट कर सकते हैं क्योंकि आप कि सिवाय दूसरा कोई भी इस संशयको नष्ट करने वाला मिलना सम्भव नहीं है। योग मार्ग में अभ्यास और वैराग्य के साथ समर्थ गुरु अथवा शास्त्र निर्देश आवश्यक हैं। शास्त्र निर्देश को सही रूप से जानना जरूरी है अन्यथा साधक द्विविधा ग्रस्त ही रहता है।

ऐसे जन का नाश नहिं, इह लोक परलोक
करे कर्म कल्याण का, पार्थ न दुर्गति होत।।40।।

श्री भगवान अर्जुन से कहते हैं, योग युक्त पुरुष न इस लोक में न परलोक में विनाश को प्राप्त होता है क्योंकि जो भी आत्म ज्ञान के कल्याणकारी मार्ग में चल पड़ा वह कोई भी मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता क्योंकि ब्रह्म बीज और उसका पौधा कभी भी नष्ट नहीं होता। वह एक बार पड़ गया तो जमेगा अवश्य और बढ़ेगा भी जरूर।

योग भ्रष्ट बहु काल तक, शुभ लोकन कर वास
लेते जन्म अति शुचिन के, अरु लक्ष्मी घर वास।।41।।

योग भ्रष्ट जीवात्मा देह त्याग के पश्चात  पुण्यवानों के लोक में जाता है और वहाँ दीर्घकाल तक निवास कर पुनः शुद्ध आचरण करने वाले श्रीमान पुरुषों के घर में जन्म लेता है।

अथवा जनमत ज्ञानि के, अरु योगी संसार
निसंदेह दुर्लभ परम, अस जन्म संसार।।42।।

अथवा बुद्धिमान योगियों के घर में वह योग भ्रष्ट जीवात्मा जन्म लेता है। इस प्रकार का जन्म इस संसार में निसंदेह दुर्लभ है।

पूर्व देह संग्रह किया, पाता धी संयोग
सोइ पार्थ प्रभाव से, करे सिद्धि का योग।।43।।

योग भ्रष्ट पुरुष के पिछले जन्म के योग संस्कार कभी धीरे धीरे, कभी शीघ्र  स्वतः प्रकट होने लगते हैं और उनके प्रभाव से वह आत्म ज्ञान की ओर बढ़ता है। पूर्वजन्म से अधिक अभ्यास और वैराग्य द्वारा वह मन को रोकने का और अधिक प्रयत्न करता है क्योंकि ब्रह्म बीज का कभी नाश नहीं होता।

पूर्व देह के ज्ञान से, अवशी भी आकृष्ट
अस जिज्ञासु योगी तजे, वेद आस सब कर्म।।44।।

वह योग भ्रष्ट पुरुष इस नवीन जन्म में माता पिता, परिवार, समाज से पराधीन हुआ भी पूर्व जन्म के अभ्यास से उसकी बुद्धि आत्म ज्ञान की ओर स्वभाववश आकर्षित होती है। वह योग का जिज्ञासु, अभ्यास एवं वैराग्य द्वारा शब्द ब्रह्म का उलंघन कर जाता है अर्थात पूर्ण ज्ञान को प्राप्त हो स्वरूप में स्थित हो जाता है।

पूर्व जन्म फल से करे, यत्न सहित अभ्यास
सकल पाप से रहित हो, योगी ब्रह्म में वास।।45।।

अपने पूर्व जन्म एवं स्वभाव के कारण प्रयत्न पूर्वक योग अभ्यास करता हुआ सम्पूर्ण कर्म बन्धनों से छुटकारा प्राप्त कर परम स्थिति अर्थात स्वरूप स्थिति को प्राप्त होता है।

योगी तापस से अधिक, योगी ज्ञानी श्रेष्ठ
योगी श्रेष्ठ सकाम नर, योगी तू हो पार्थ ।।46।।

निष्काम कर्म योगी जो सदा आत्मरत है वह तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्र ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ है और सकाम कर्म योगियों से भी श्रेष्ठ है। अतः हे अर्जुन! तू योगी हो।

मम अनुरागे चित्त से, भजे मोहि दिनरात
योगी श्रद्धावान वह, परम श्रेष्ठ है मान्य ।।47।।

निष्काम कर्म योगियों में भी जो परम श्रद्धा से युक्त होकर अनन्य रूप से सदा स्वरूप स्थिति में स्थित होकर, मुझे भजता है वह मेरे विश्वात्मा स्वरूप से तदाकार कर लेता है, वह योगी मुझे परम श्रेष्ठ मान्य है।
          

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