दम्भ अर्थात वास्तविकता छिपाकर मिथ्या रूप दिखाना, ईश्वर भक्ति का गर्व पूर्वक बाजार में प्रचार करना, दर्प, सबको नीचा दिखाने की आदत, आधा जल भरा हुआ गागर जिस प्रकार छलकता है उसी प्रकार जो प्रभुता को नहीं पचा पाता, अभिमान अर्थात अपने को, अपने ज्ञान को श्रेष्ठ मानना, क्रोध, कठोर वाणी से दूसरे को जलाना, अपमान करना, मूढ़ता जो शुभ और अशुभ में फर्क नहीं कर सकता, आसुरी सम्पदा को लेकर उत्पन्न पुरुष के लक्षण हैं।
शुद्ध चित्त अरु भय रहित, ज्ञान योग आरूढ़
दान यज्ञ इन्द्रिय
दमन, तप आर्जव स्वाध्याय।।1।।
यहाँ श्री भगवान कृष्ण चन्द्र अर्जुन को दैवी
सम्पदा प्राप्त पुरुषों के लक्षण बताते हैं। दैवी सम्पदा प्राप्त पुरुषों में भय
का अभाव हो जाता है, जीव भाव नष्ट होने से
मनुष्य जन्म मृत्यु जरा दुःख के भय से मुक्त हो जाता है। उसकी बुद्धि शुद्ध हो
जाती है। संकल्प विकल्प जन्म नहीं लेते। सूक्ष्म हुयी बुद्धि आत्म आनन्द का अनुभव
करने लगती है। ज्ञान योग से मेरे में जिसकी स्थिति द्रढ़ हो गयी है, जो आत्मस्थित
हो गया है, परहित के लिए निसंकोच
भाव से सर्वस्व दान करने वाले अथवा दूसरों की सेवा में बिना प्रत्युपकार के लगे
हुए, जिसकी इन्द्रियां
उसके वश में हैं, स्वभाव में स्थित रहना,
परमात्मा के निमित्त कर्म करना, निरन्तर शास्त्र
वचनों का चिन्तन मनन करना, तप (जप कहाँ से आ रहा
है इसे देखना तप है) में लगा हुआ, मन से सरलता बालक के समान सरल जो मिट्टी सोने, अच्छे बुरे को समान समझता है।
सत्य अहिंसा क्रोध
नहिं, त्याग अपैशुन शान्ति
अनासक्ति ह्री भूत
दया, कोमल हृदय अचापलम ।। 2।।
मन वाणी कर्म से किसी को दुख नहीं देना, सत्य; जिसके संशय और अज्ञान नष्ट
होकर ज्ञान की प्राप्ति हो गयी है। त्याग; अहं बुद्धि का त्याग, देह भावना का त्याग विशुद्ध ज्ञान की स्थिति
(जहाँ शान्ति और आनन्द होता है),
किसी
की निन्दा न करना, किसी के दोष न देखना, सब प्राणियों में बिना इस विचार के कि
वह अच्छा है या बुरा, सभी की बिना स्वार्थ
के भलाई करना, किसी भी विषय का
संयोग होने पर उसमें आसक्ति नहीं होना, जो
संसार के हित के लिए अपने हृदय में कोमलता रखते हैं, अपने गुणों की चर्चा होने पर जो लजा
जाते हैं, जिनमें व्यर्थ चेष्टा
का अभाव हो गया है, जिसने मन को वश में करके इन्द्रियों को अपाहिज सा बना
दिया है।
तेज क्षमा अद्रोह
धृति, शौच नहीं अभिमान
देव संपदा जन्म जेहिं, लक्षण उसके पार्थ।।3।।
तेज, आत्मा की ओर मन की गति से जो
भाव उत्पन्न होता है वह तेज है,
क्षमा; अपने प्रति अपराध करने वाले को भी अहंकार
हुए बिना अभय देना, धृति; दैहिक, दैविक, भौतिक कष्ट आने पर भी धैर्य धारण करना, शान्त रहना, जो बाहर भीतर से शुद्ध हो, जो किसी भी प्राणी से शत्रु भाव न रखे
तथा सभी प्राणियों का हित चाहने वाला हो, अपने
में पूज्यता के अभिमान का अर्थात पूज्यता से जिनमें संकोच होता है; यह 26 गुण दैवी सम्पदा को लेकर जन्मे
पुरुष में होते हैं।
दम्भ दर्प अरु मूढ़ता, पारुष्य क्रोध, अभिमान
असुर सम्पदा जन्म
जेहि, लक्षण उसके पार्थ।।4।।
हे अर्जुन! दम्भ अर्थात वास्तविकता छिपाकर मिथ्या
रूप दिखाना, ईश्वर भक्ति का गर्व
पूर्वक बाजार में प्रचार करना, दर्प, सबको नीचा दिखाने की आदत, आधा जल भरा हुआ गागर जिस प्रकार छलकता
है उसी प्रकार जो प्रभुता को नहीं पचा पाता, अभिमान अर्थात अपने को, अपने ज्ञान को श्रेष्ठ मानना, क्रोध, कठोर वाणी से दूसरे को जलाना, अपमान करना, मूढ़ता जो शुभ और अशुभ में फर्क नहीं कर
सकता, आसुरी सम्पदा को लेकर
उत्पन्न पुरुष के लक्षण हैं।
दैव सम्पदा मुक्ति दे, आसुर बांधे भूत
अर्जुन तू ना शोक कर, दैव सम्पदा जन्म।।5।।
दैवी सम्पदा कर्म बन्धन, अज्ञान बन्धन, माया बन्धन से मुक्ति के लिए है। दैवी
सम्पदा परम ज्ञान को उपलब्ध कराती है, आसुरी
सम्पदा लोहे की जंजीर है जो जीव को अपनी बेडि़यों में जकड़ लेती है। हे अर्जुन! तू मत घबरा क्योंकि तू दैवी सम्पदा लेकर
जन्मा है।
दो प्रकार के भूत जग, दैव असुर हे पार्थ
दैव प्रकृति वर्णन
बहुत, असुर प्रकृति को
जान।।6।।
श्री भगवान् अर्जुन से कहते हैं- इस
संसार में दो अनादि मार्ग हैं, आसुरी प्रकृति और
दैवी प्रकृति। दैवी प्रकृति के बारे में मैं तुझे विस्तार से बता चुका हूँ अब तू
आसुरी प्रकृति के बारे में सुन।
आसुर जन जाने नहीं, प्रवृत्ति निवृत्ति
हे पार्थ
नहीं शौच, आचार है नहीं सत्य
आधार।।7।।
आसुरी स्वभाव वाले नहीं जानते कि किस
कर्म को करना चाहिए किस कर्म से दूर रहना चाहिए, किस कार्य से स्वयं उनकी हानि होगी तथा
किसी कार्य से उन्हें फायदा होगा इस विषय में वह मूढ़ होते हैं क्योंकि अत्याधिक
तम और रज का प्रभाव उनमें होता है। न उनका अन्तःकरण शुद्ध होता है न वह शारीरिक
रूप से पवित्र होते हैं, उनका कोई आचरण
श्रेष्ठ नहीं होता, वह दूसरे को अपमानित
करने वाले, कष्ट देने वाले गलत
मार्ग में डालने वाले होते हैं। सत्य से कोई प्रीति अर्थात अज्ञान का नष्ट करने के
लिए उनका कोई कार्य नहीं होता, ज्ञान के लिए वह कभी
लालायित नहीं रहते।
वे कहते यह जग सदा, असत् अनीश्वर
अप्रतिष्ठ
जन्म परस्पर भोग से, कारण इसका काम।।8।।
वे आसुरी वृत्ति वाले जगत को आश्रय रहित, असत्य और बिना ईश्वर के मानते है। यह
संसार स्त्री पुरुष के संयोग से उत्पन्न हुआ है और काम ही इसका कारण है, इसके सिवा और कुछ भी नहीं है। वह यह
मानकर चलते हैं जो आज है वही सब कुछ है। भोग ही उनका जीवन है। शास्त्र उनके लिए
मिथ्या है। दैवी सम्पदा मूर्खता है। देह ही उनके लिए सर्वोपरि है। उनके अनुसार
पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक, ज्ञान, ईश्वर सब कल्पना है।
लिए सहारा दृष्टि यह, नष्ट आत्म मति मंद
क्रूर कर्म, अपकार रत, जगत नाश को जन्म।।9।।
इस प्रकार मिथ्या दृष्टि को आधार मानकर
चलने वाले जिनका ज्ञान नष्ट हो गया है, जिन
की बुद्धि अल्प है, ऐसे आसुरी वृत्ति के
लोग सबका अपकार करने वाले कठोर और निन्दनीय कर्म (विकर्म) में लगे रहते हैं। ऐसे मनुष्य
से जड़ चेतन सभी त्रास पाते है। जगत के अहित के लिए ही इनका जन्म होता है।
आस असंभव आसरे, दम्भ मान मद युक्त
असत ज्ञान धारण करें, भ्रष्ट आचरण पार्थ।।10।।
ये दम्भ, मान, मद से युक्त मनुष्य किसी भी प्रकार से
पूर्ण न होने वाली कामनाओं का आश्रय लेकर संसार में विचरते हैं। यही नहीं उनमें
अज्ञान के कारण अनेक भ्रान्ति पूर्ण बातें मस्तिष्क में भरी रहती है, जिसके कारण उनका आचरण भ्रष्ट रहता है। जगत
के प्राणियों को पीड़ित करने वाले,
उन्मत्त
मनमाना पापाचरण करते हैं।
नाना चिन्ता आश्रिता
प्रलय रात्रि तक पार्थ
काम भोग रत नर सदा
इतना ही सुख मान।।11।।
उनका केवल एक ही विचार रहता है, कैसे ही भोग करें, कैसे सुख मिले। इसके लिए कुछ भी करना
पड़े, इस कारण मृत्यु होने
तक अनेक चिन्ताओं को पाले रखते हैं। कैसे भी जमीन जायदाद बढ़ानी है, ऐशो-आराम की वस्तुएं जुटानी हैं, भोग करना है, इस व्यक्ति को नष्ट करना है आदि आदि सदा
विषय भोग में लगे, उसे ही सुख मानने
वाले होते हैं।
काम क्रोध आधीन नर, बंधे आश के पाश
काम भोग के हेतु को, संचय धन अन्याय।।12।।
विभिन्न आशाओं के जाल में फंसे हुए
आसुरी वृत्ति के मनुष्य सदा काम और क्रोध में रहते हैं। नित नई कामना करते हैं। हर
कामना पूरी नहीं हो सकती और कामना में विघ्न होने से क्रोध उत्पन्न होता है। विषय
भोग ही इनका जीवन है जिसके लिए अन्याय पूर्वक धन आदि का संग्रह करने का प्रयत्न
करते हैं।
आज मुझे यह सब मिला, इस आसा को प्राप्त
इतना धन मम प्राप्त
है, फिर होगा यह पास।।13।।
अपने समाज में यह कहते फिरते हैं मैंने
यह प्राप्त कर लिया है, अब इस मनोरथ को
प्राप्त कर लूंगा जैसे एक कारखाना लगा दिया है, दो और लगाने हैं, इस साल इतना कमाना है अगले वर्ष दुगना
करना है, मेरे पास इतना धन है
फिर इतना हो जायेगा।
मैंने मारा शत्रु यह, और अपर भी हन्य
मैं ईश्वर भोगी सुखी, परम सिद्ध बलवान।।14।।
इस शत्रु को मैंने मार डाला है या नष्ट
कर दिया कल दूसरे को भी मटियामेट कर दूंगा मैं मालिक हूँ, मैं ही ईश्वर हूँ, मैं ही बलवान हूँ, मैं ही सिद्ध हूँ, मैं ही भोगने वाला हूँ, सब मेरे आधीन हैं, मैं ही पृथ्वी का राजा हूँ, यह सब मेरा ही ऐश्वर्य है आदि।
मम सम दूजा कौन है, धन कुबेर बहु पूत
यज्ञ, दान अरु मोद करूंगा, मोहित है अज्ञान।।15।।
चित्त भ्रमित बहु
भांति से, मोह जाल आवृत्त
विषय भोग आसक्त अति, घोर नरक में जात।।16।।
मैं बड़ा धनी हूँ, कुबेर से ज्यादा धन मेरे पास है, मैं बड़े कुटुम्ब वाला हूँ, मेरे समान दूसरा कोई नहीं है। जो हूँ
मैं ही हूँ, मैं यज्ञ करूंगा, दान दूँगा, आमोद प्रमोद करूंगा, ऐसी कभी खत्म नहीं होने वाली कामनाओं को
लिए हुए रहते हैं। इनका हृदय सदा जलता रहता है। इनकी बुद्धि अज्ञान से मोहित व
भ्रमित रहती है। यह जमीन, धन, परिवार, झूठी प्रतिष्ठा के मोह से घिरे रहते हैं।
सदा विषय भोग में लगे अत्यन्त कामी आसुरी वृत्ति के यह लोग घोर नरक को प्राप्त
होते हैं अर्थात मूढ़ योनियों को प्राप्त होते हैं। आत्मा की अधोगति नरक है और
उर्ध्वगति स्वर्ग है।
स्वयं श्रेष्ठ दर्पी
पुरुष, धन मान मद युक्त
शास्त्र रहित पाखण्ड
से, करे नाम का यज्ञ।।17।।
यह सदा दूसरों से अपने को हर बात में
श्रेष्ठ मानने वाले घमण्डी पुरुष धन और झूठे मान मद से युक्त होकर दिखावे का यज्ञ
पूजन करते हैं और जिसमें शास्त्र की बतायी विधि का पालन नहीं किया जाता केवल अपनी
वाहवाही के लिए पाखण्ड पूजन आदि करते हैं।
दर्प कामना क्रोध बल
और अहं मन माहि
निन्दा रत कर द्वेष
मम, स्वयं अन्य बस देह।।18।।
यह आसुरी वृत्ति के पुरुष अहंकार, बल, घमण्ड, कामना, क्रोध आदि के आश्रित रहते हैं। सदा
दूसरों की निन्दा करते हैं, इस प्रकार अपने शरीर
में तथा दूसरे के शरीर में स्थित परमात्मा से अहंकार और मूढ़ भाव के कारण द्वेष
करते हैं।
ऐसे द्वेषी नराधम, क्रूर अशुभ रत कर्म
बार बार मैं डालता, अशुभ योनि में
पार्थ।।19।।
अपने आत्मतत्व से द्वेष करने वाले मूढ़
पापाचारी क्रूर कर्मी अधममनुष्यों को मैं इस संसार में बार-बार अशुभ योनि यथा अंग
भंग शरीर, असाध्य जन्मजात बीमारी लिए एवं मूढ़ मनुष्यों के रूप में डालता हूँ।
मुझे न पाते मूढ़ नर, असुर योनि बहु जन्म
फिर पाते अति नीच गति
और नीच से नीच।।20।।
हे अर्जुन! वे मूढ़ (अज्ञानी) पुरुष मुझ आत्मा
स्वरूप परमात्मा को नहीं जानते हैं,
इस
कारण उनकी ज्ञान की ओर वृत्ति पैदा नहीं होती और जन्म जन्मान्तर आसुरी (मूढ़) योनि
को प्राप्त होते हैं। कर्मानुसार घोर क्रूर कर्म होने के कारण नीच से भी नीच मूढ़ योनि
को प्राप्त होते हैं।
तीन नरक के द्वार हैं, काम क्रोध अरु लोभ
आत्म नाश करते यही, त्याग इन्हें तू
पार्थ।।21।।
काम, क्रोध और लोभ यह तीन नरक के द्वार हैं
अर्थात जहाँ काम क्रोध और लोभ होगा वहाँ मूढ़ता की अधिकता होगी और मूढ़ता (तमस)
नीच से नीच योनि की ओर ले जाती है। इन तीनों से आत्मा का स्वरूप आच्छादित हो जाता
है। जीव अपनी स्वरूप स्थिति को पूर्णतया भूल जाता है और अधोगति की ओर चल देता है।
अतः आत्म स्वरूप को विस्मृत करने वाले इन तीनों मूढ़ता के स्वजनों को हमेशा के लिए
त्याग देना चाहिए।
मुक्त पुरुष तम द्वार
त्रय, करे आत्म कल्याण
वह पाता है परमगति और
मुझी को प्राप्त।।22।।
हे अर्जुन! इन तीन काम, क्रोध और लोभ नरक के द्वार से मुक्त पुरुष
ही ज्ञान आचरण कर अपना कल्याण कर पाता है क्योंकि इनके रहते ज्ञान का दीप नहीं जलता। इन तीनों के
नष्ट होने पर ही सहज वैराग्य और ज्ञान हो जाता है और साधक परमगति आत्मतत्व
को प्राप्त होता है।
त्याग शास्त्र विधि
जो चले, निज इच्छा अनुसार
नहीं सिद्ध को
प्राप्त हो, नहीं परम गति
प्राप्त।।23।।
जो पुरुष शास्त्र विधि को त्याग कर अपनी
इच्छा से अपनी कामना और लोभ संतुष्टि के लिए मनमाना आचरण करता है, वह इन्द्रियों से पराजित हुआ कभी भी
सिद्धि को प्राप्त नहीं होता। परमगति तो बहुत दूर की बात है फिर सुख, आनन्द, ज्ञान, शान्ति उसे कैसे प्राप्त हो सकती है।
जान शास्त्र प्रमाण
तू कार्य अकार्य प्रभेद
विधि सम्मत जो कर्म
हैं, वही कर्म हैं योग्य।।24।।
अतः क्या कर्तव्य हैं और कौन से
अकर्तव्य हैं इसमें शास्त्र को प्रमाण मानना चाहिए। जिन कर्मों का शास्त्र निषेध
करते हैं उन्हें नहीं करना चाहिए। जिन्हें शास्त्र अनुमति देते हैं वही कर्म करने योग्य
हैं क्योंकि शास्त्र समस्त नियम मुमुक्ष जनों के बनाये हैं। इसे जान कर हे अर्जुन! तू शास्त्र सम्मत कर्म कर।
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