Wednesday, August 24, 2011

सातवां अध्याय-ज्ञानविज्ञानयोग


मैं सभी भूतों का सनातन बीज हूँ। जब न सृष्टि रहती है न प्रकृति, उस समय विशुद्ध पूर्ण ज्ञान शान्त अवस्था में रहता है, जो सृष्टि का बीज है.
उत्पत्ति विनाश वाले पदार्थ जैसे शरीर, सृष्टि के तत्व अधिभूत हैं, जीवात्मा अधिदैव कहलाता है, परमात्मा अथवा विशुद्ध आत्मा अधियज्ञ है.            

                                    वसंतेश्वरी भगवद्गीता - प्रो बसन्त प्रभात जोशी
                                     
                                                  सातवां अध्याय-ज्ञानविज्ञानयोग

मुझमें आश्रित योगरत, मन से मम आसक्त
जान पार्थ समग्र मम, संशयरहित वो बात।।1।।

हे पार्थ! एक कामी की तरह जिनका मन सदा मुझमें आसक्त है; जिस प्रकार कामी को स्त्री प्यारी होती है और लोभी को धन प्यारा होता है, उसी प्रकार जो मुझमें अर्थात मेरे आत्म स्वरूप में आसक्त हैं तथा मेरे आश्रित होकर सदा मुझसे जुड़े रहते हैं, जिनका मन बुद्धि सदा आत्मरत है, वह आत्मा के सम्पूर्ण बल ऐश्वर्य विभूतिमय स्वरूप को किस प्रकार जानता है, उसे अच्छी प्रकार सुन।

कहूँ सहित विस्तार से, ज्ञान सहित विज्ञान
पार्थ तत्व को जान जग, नहीं शेष कोउ ज्ञान।।2।।

तू आत्मा की विभूति बल ऐश्वर्य को जानने वाले ज्ञान और विज्ञान को सुन जिसे जानकर इस संसार में कुछ भी जानने योग्य ज्ञान श्रेष्ठ नहीं रहता है।

यत्न करे सिद्धि का, नर सहस्त्र कोउ एक
जाने विरला तत्व से, यत्न सिद्ध हे पार्थ।।3।।

हजारों मनुष्यों में कोई एक पूर्व जन्म का योग भ्रष्ट पुरुष मेरी प्राप्ति आत्मतत्व के लिए यत्न करता है। उन यत्न करने वाले सिद्धों में भी कोई बिरला ही मेरे आश्रित होकर तत्व से आत्म स्वरूप को जानता है। शंकराचार्य कहते हैं, पहले मनुष्य जीवन दुर्लभ है, उसमें भी मुक्त होने की इच्छा (मुमुक्षत्व), उसमें भी सत् पुरुषों का संग। यह सब मिलने पर भी निरन्तर अभ्यास और वैराग्य से यत्न करते हुए सिद्ध योगियों में भी कोई बिरला ही आत्म स्वरूप में भली भांति स्थित हो पाता है।

भू जल अगिन वायु खम्, मन बुद्धि अहंकार
अष्ट तत्व बांटी हुयी, मम प्रकृति हे पार्थ ।।4।।
आठ तत्व अपरा प्रकृति, अपर परा है जान
सकल जगत धारण करे, जीव इसे तू जान।।5।

हे अर्जुन अब इस मार्ग के विज्ञान को मैं तुझे बताता हूँ। मेरी प्रकृति दो प्रकार की है अपरा और परा । अपरा प्रकृति के आठ भाग हैं:-
1- पृथ्वी, 2- जल, 3- अग्नि, 4- वायु, 5- आकाश, 6- मन, 7- बुद्धि और 8- अहंकार। इसे जड़ प्रकृति भी कहते हैं। दूसरी परा प्रकृति है जिससे यह सम्पूर्ण जगत धारण किया जाता है, परमात्मा की यह परा (जीव) प्रकृति सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त होकर सृष्टि को धारण किये हुए है।

जड़ चेतन के योग से, जनमत् हैं सब भूत
प्रलय प्रभव मैं जगत का, गूढ़ तत्व तू जान।।6।।

सभी भूत इन दोनों प्रकृतियों के आपस में मिलने से उत्पन्न होते हैं। जीव प्रकृति जब स्वेच्छा से जड़ प्रकृति से मिल जाती है तब प्राणियों का जन्म होता है। मैं विश्वात्मा सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति और प्रलय हूँ, सबका कारण मैं ही हूँ।

पार्थ अन्य मेरे सिवा परम न कारण कोई
मुक्ता सम गूंथा हुआ, मुझसे यह संसार।।7।।

हे अर्जुन! मैं विश्वात्मा ही इस सृष्टि और प्रकृति का परम कारण हूँ। सृष्टि प्रकृति से उत्पन्न होती है। सृष्टि और प्रकृति अलग अलग दिखाई देती हैं परन्तु अन्त में सृष्टि प्रकृति में समा जाती है और प्रकृति मुझमें समा जाती है। यह सम्पूर्ण सृष्टि और प्रकृति मुझमें उसी प्रकार गूंथी हुई है जिस प्रकार मणियां एक धागे में आपस में गुथी रहती हैं। संक्षेप में सम्पूर्ण सृष्टि ब्रह्म का ही विस्तार है। ब्रह्म ही सबका परम कारण है।

जल में रस हूं पौरुष नर में रवि शशि मध्य प्रकाश
खम् में शब्द ओंकार वेद में, पार्थ मुझे तू जान।।8।।
भू में पावन गन्ध मैं, तेज अग्नि में व्याप्त
जीवन सारे भूत में, तप तापस में जान।।9।।

सृष्टि सब ब्रह्म का ही विस्तार है और सृष्टि परा-अपरा प्रकृति से ओत प्रोत है, इसी को स्पष्ट करते हुए श्री भगवान कहते हैं; मैं जल में रस, सूर्य में प्रभा, सभी जानने योग्य विचारों में प्रणव (ज्ञान), आकाश में शब्द, मनुष्य में मनुष्यत्व, पृथ्वी में गन्ध, अग्नि में तेज, सभी प्राणियों में जीवन और तपस्वियों में तप हूँ। इस प्रकार जड़ और चेतन प्रकृति आपस में गूंथी हुई है। दूसरे रूप में देखें सभी कुछ ब्रह्म का ही विस्तार है।

बुद्धिमान की बुद्धि हूँ तेजवान का तेज
सकल भूत का बीज मैं, पार्थ सनातन जान।।10।।
रहित कामना राग से, बल हूँ मैं बलवान
सब भूतों में काम बल, पार्थ धर्म अनुकूल।।11।।

मैं सभी भूतों का सनातन बीज हूँ। जब न सृष्टि रहती है न प्रकृति, उस समय विशुद्ध पूर्ण ज्ञान शान्त अवस्था में रहता है, जो सृष्टि का बीज है। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि, तेजस्वियों का तेज, बलवानों में काम व राग रहित बल, समस्त प्राणियों में धर्म अनुकूल काम हूँ। संक्षेप में सभी कुछ भगवान का ही है, सभी कुछ भगवान ही हैं। ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या, जगत ब्रह्म का स्वरूप है, उसी से निकलता है उसी में समा जाता है। अतः ब्रह्म ज्ञान होने पर जगत का अस्तित्व नहीं रहता।

सत्त्व रज तम के भाव जो, मेरे से ही जान
मैं उनमें मुझ में नहीं, इस अचरज को जान।।12।।

हे अर्जुन! सत्त्व, रज, तम से उत्पन्न होने वाले जो भाव हैं उनका भी कारण मैं हूँ परन्तु उनमें मैं तथा वह मेरे में नहीं हैं क्योंकि परमात्मा गुणातीत हैं। परमात्मा गुणों के कारण हैं पर गुण उनमें नहीं हैं। अग्नि धुएं को जन्म देती है पर धुंए में अग्नि नहीं होती है।

तीन गुणों के भाव से मोहित सब संसार
मैं अविनाशी गुण रहित, जानत नहिं संसार।।13।।

त्रिगुणात्मक तीन भावों से जिसे माया कहते हैं यह सारा जीव जगत मोहित हो रहा है। यह त्रिगुणात्मक माया मेरे और जीव के बीच आ जाती है, इस कारण जीव माया के कारण भ्रमित हो जाता है और मुझ नाश रहित आत्मतत्व को नहीं जानता।

अति अद्भुत अरु गुणमयी, माया मोरि दुरूह
जो भजे मुझको सदा तरते माया पार।।14।।

यह त्रिगुणात्मक माया अलौकिक है और इसे पार कर पाना अत्यन्त कठिन है। रजोगुण मन में विकारों को जन्म देता है, तमोगुण भ्रम पैदा करके असत् पदार्थों को सत् समझता है, सत्त्व यद्यपि शुद्ध  है परन्तु रज, तम मिलने से वह पुरुष की प्रवृत्ति का कारण होता है। इसमें प्रतिविम्बित होकर आत्मविम्ब, परम शुद्ध ज्ञान जड़ पदार्थों को प्रकाशित करता है। ऐसी परम अलौकिक और दुस्तर माया को; जो मनुष्य निरन्तर आत्मरत हैं, आत्म स्थित हुए सदा आत्म स्वरूप मुझे भजते हैं वह इस माया को पार कर जाते हैं।

ज्ञान हरण माया किया, आश्रित आसुर भाव
नीच, मूढ़ दुष्कर्म रत, भजन न मोर सुहाव।।15।।

जिन मुनष्यों का ज्ञान माया के द्वारा हरण कर लिया गया है ऐसे असुर स्वभाव धारण किए हुए अहंकारी अधम मनुष्य जो विकर्म में रत हैं,!! बुरे कर्म करने वाले, स्वभाव के विरूद्ध चलने वाले मुझको (आत्मतत्व) अनुभव नहीं करते। असुर उन्हें कहते हैं जो दृष्ट प्रयोजन वाले ज्ञान और दृष्ट प्रयोजन वाले कर्म से युक्त हैं। ऐसे असुर स्वभाव वाले मुझ परमात्मा को नहीं भजते हैं। मेरा अनुभव नहीं कर पाते।

चार प्रकार के पुण्य जन, सदा भजे मोहि पार्थ
आर्त, चाह जो अर्थ को अरु ज्ञानी, जिज्ञासु।।16।।

हे अर्जुन! चार प्रकार के उत्तम कर्म करने वाले, अर्थार्थी अर्थात धन सम्पदा पद प्रतिष्ठा चाहने वाले, आर्त (दुखी) जिज्ञासु और ज्ञानी मुझ विश्वात्मा को भजते हैं, मेरा अनुभव करते हैं।

उन भक्तों में ज्ञानि मोहि, नित्य युक्त एक भक्ति
तत्व ज्ञानि को प्रिय सदा, ज्ञानी प्रिय है मोहि।।17।।

इन चार प्रकार के भक्तों में अनन्य प्रेम से जो मुझ परमात्मा की भक्ति करता है अर्थात सदा आत्मरत हुआ आत्म सुख अनुभव करता है ऐसा ज्ञानी भक्त अति उत्तम है। क्योंकि ज्ञानी मुझे तत्व से जानता है। इसलिए आत्म स्थित मुझे यथार्थ से जानने के कारण सदा मुझसे प्रेम करता है और वह सदा मुझे प्रिय है। वास्तव में हम दोनों एक ही हैं। ज्ञानी मेरा ही साक्षात स्वरूप है।

भक्त सभी उदार हैं, ज्ञानी है मम रूप
युक्त आत्मा मोर मैं, उत्तम गति मम रूप।।18।।

सभी मेरे भक्त चाहे वह आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु हों; सभी विशाल हृदय वाले धैर्यवान हैं परन्तु ज्ञानी साक्षात मेरा स्वरूप है क्योंकि वह निष्काम कर्मरत होकर मुझे तत्व से जानता है। सदा मुझमें आत्म रूप में स्थित रहता है। उसका मन, बुद्धि सदा मुझमें लगी रहती है। वह मुझसे जुड़ा रहता है। इसलिए उसकी गति उत्तम है क्योंकि वह सर्वत्र मुझे ही देखता है। वह मेरा स्वरूप हुआ सदा मेरे में स्थित है। कबीर कहते हैं 'ब्रहम बड़ा कि ब्रहम जे जानिया' उत्तर में वह चुप रहते हैं तात्पर्य है ब्रहम को जानने वाला ब्रहम हो जाता है

बहुत जन्म के अन्त में तत्व ज्ञान को प्राप्त
वासुदेव सर्वस्व मम, जग दुर्लभ अस संत।।19।।

अनेक जन्मों से अभ्यास, वैराग्य द्वारा यत्न करता हुआ, अनेक बार योग भ्रष्ट होकर जन्म लेकर अन्त के जन्म में परम विशुद्ध ज्ञान को प्राप्त पुरुष समझ जाता है कि सब कुछ आत्मा ही है, सभी कुछ भगवान ही हैं। इस प्रकार सृष्टि के कण कण में व्याप्त वह ज्ञानी स्वयं को स्वयं से देखता हुआ मुझे भजता है, ऐसा महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।

देव जिन्हें श्रद्धा सहित
भजते कामी भक्त
ज्ञान हरे निज प्रकृति वश
नियम धरें बहु भिन्न।।20।।

हे अर्जुन! इस संसार में सकामी पुरुष जो अनेक भोग और इच्छाओं के वशीभूत हैं, जिनका ज्ञान माया द्वारा हर लिया गया है, अपने अपने स्वभाव के वशी भूत हो भिन्न भिन्न नियमों का पालन करते हुए अर्थात पूजा विधि, पूजा सामग्री आदि से देवी देवताओं का भजन पूजन करते हैं।

श्रद्धानत जिस देव का पूजे भक्त सकाम
थिर करता श्रद्धा वही, उसी देव के नाम।।21।।

जो जो सकामी भक्त जिस जिस देवी देवता के स्वरूप का श्रद्धा से भजन पूजन करना चाहता है उस उस भक्त की श्रद्धा मैं उसी देवी देवता के प्रति स्थिर कर देता हूँ।

श्रद्धानत उस देव का पूजन करें सकाम
प्राप्त भोग उस देव से, मैंने किया विधान।।22।।

वह सकामी भक्त श्रद्धा से युक्त होकर उस देवी देवता का भजन पूजन करते हैं और उस देवता से मेरे द्वारा ही विधान किए इच्छित भोगों को प्राप्त करते हैं जिस फल की इच्छा वे रखते हैं, मेरे बनाये नियमानुसार उन्हें वह फल उस देव पूजन से प्राप्त होता है।

देव भजें अल्पज्ञ जो, नाशवान फल प्राप्त
पूज देव हों देवमय, मम पूजें मम प्राप्त।।23।।

परन्तु यह सकामी सभी भक्त अल्प बुद्धि के हैं तथा इनको देव पूजन से मिलने वाला फल भी नाशवान है। क्योंकि संसार की सभी वस्तु मरण धर्मा हैं। ये देव पूजन करने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं परन्तु जो मेरे भक्त हैं उन्हें मेरी पूजा का फल मैं अर्थात आत्मज्ञान प्राप्त होता है।

नाश रहित उत्तम परम, भाव नहीं संज्ञान
व्यक्ति समझ अव्यक्त को, उनमें धी नहिं जान।।24।।

फल की इच्छा रखने वाले बुद्धिहीन मनुष्य मेरे परम उत्तम अविनाशी परम भाव को नहीं जानते हैं। इसी कारण मैं आत्म रूप जो मन बुद्धि इन्द्रियों से परे हूँ, को व्यक्ति भाव को प्राप्त हुआ देह धारी समझते हैं अर्थात योगमाया के आश्रित ईश्वर के स्वरूप को न समझने वाले सामान्य जन उन्हें मनुष्य ही समझते हैं क्योंकि उनके यथार्थ स्वरूप को समझने की न उनकी योग्यता होती है न दृष्टि। इसी प्रकार आत्मज्ञानी को भी जान पाना अत्यन्त कठिन है, उसके प्रति भी लोग व्यक्तिभाव ही रखते हैं।

योगमाया में छिपा मैं, सबके नहीं प्रत्यक्ष
अज्ञानी नहिं जानते, अज अविनाशी पक्ष।।25।।

योगमाया ज्ञान का हरण कर लेती है इसलिए मैं योगमाया के कारण छिपा रहता हूँ। प्रत्यक्ष मेरा मानव शरीर होता है, मेरे दिव्य स्वरूप आत्मतत्व को वह नहीं जान पाते। ऐसे अज्ञानी मुझ अविनाशी, जन्म रहित परमेश्वर को जन्म लेने वाला, मरने वाला समझते हैं। यही कारण था भगवान श्री कृष्ण चन्द्र को उनके काल में कई राजा-प्रजा आदि उन्हें अपनी तरह का मानव समझते थे तथा यहीं विकार आज भी कई मनुष्यों में है।

मैं जानत सब भूत का, भूत आज अरु कल
पर कोई नहिं जानता, हे अर्जुन मम ज्ञान।।26।।

मैं विशुद्ध पूर्ण ज्ञान, नित्य होने के कारण पूर्व में व्यतीत हुए वर्तमान में स्थित तथा आगे होने वाले सभी भूतों को जानता हूँ परन्तु मुझे कोई भी ऐसा व्यक्ति जिसे स्वरूप अनुभूति नहीं हुयी हो, नहीं जानता।

उपजे इस संसार में, वश इच्छा अरु द्वेष
पार्थ द्वन्द्व के मोह ने, हरा भूत का ज्ञान।।27।।

हे अर्जुन इस संसार में इच्छा और द्वेष का कारण मनुष्य का शरीर ओर अहंकार है। इसी इच्छा और द्वेष के कारण संसार में सुख और दुख हैं और सभी संसार के लोग इनके पीछे पागल हुए दौड़ रहे हैं क्योंकि यह मनुष्य की बुद्धि को भ्रमित कर देते हैं और मनुष्य कभी भी अपने श्रेय को नहीं प्राप्त कर पाता है।


पाप नष्ट जिन पुरुष का, पुण्यकर्म रत पार्थ
द्वन्द्व मोह से मुक्त वे, मुझे भजे दृढ़ भक्त।।28।।

परन्तु जिन योगभ्रष्ट पुरुषों का पूर्व जन्म के संस्कारों के कारण पुण्योदय हुआ वे कर्म बन्धन से मुक्त स्वाभाविक रूप से राग द्वेष से मुक्त हो जाते हैं और दृढ़ निष्चयी होकर सूक्ष्म बुद्धि द्वारा मुझे अनुभव करते हैं, मुझे भजते हैं।

मम आश्रित करते जतन, जन्म मृत्यु से मोक्ष
ऐसे ज्ञानी जानते, ब्रह्म कर्म अध्यात्म् ।।29।।

जो मनुष्य मेरी शरण आकर वृद्धावस्था, जन्म, मृत्यु से छूटने का यत्न करते हैं वह यत्न करते हुए ब्रह्म को, स्वभाव को, और सम्पूर्ण कर्म को जान जाते हैं। कर्म स्वभाव और ब्रह्म को जानकर अपना लक्ष्य ब्राह्मी स्वरूप को प्राप्त करने स्थित करते हुए सतत् यत्न करते हैं।

चित आश्रित मुझमें सदा, जानत हैं मुझ आत्म
अन्त काल वे जानते, अधिभूत, दैव, अधियज्ञ।।30।।

जो पुरुष मुझे अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ सहित अन्त काल में भजते हैं, जानते हैं; उत्पत्ति विनाश वाले पदार्थ जैसे शरीर, सृष्टि के तत्व अधिभूत हैं, जीवात्मा अधिदैव कहलाता है, परमात्मा अथवा विशुद्ध आत्मा अधियज्ञ है, जो इस बात का अनुभव कर लेता है वह सदा मुझ आत्म स्वरूप अधियज्ञ में अपना चित्त स्थापित कर लेते हैं क्योंकि हर मनुष्य परम श्रेय को पाना चाहता है और आत्मा ही परम श्रेय है। अतः तत्व से मुझे जान कर आत्मरत रहते हैं।

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