Thursday, August 25, 2011

चौदहवाँ अध्याय-त्रिगुण योग

प्रकृति (ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति) के भिन्न भिन्न मात्रा में कार्य करने से गुण उत्पन्न होते हैं। इन्हें तीन भागों में विभाजित किया है। यह हैं सत्त्व, रज, तम। सत्त्व में ज्ञान शक्ति अधिक होती है, रज में क्रिया शक्ति अधिक होती है और तम में ज्ञान शक्ति लगभग लुप्त होती है, क्रिया शक्ति अति अल्प होती है।
हे अर्जुन, जिसे ब्रह्म कहा गया है वह ब्रह्म ही यह आत्मा (मैं हूँ) है। मैं आत्मा अमृत हूँ अर्थात परम विशुद्ध ज्ञान हूँ जिसका कभी नाश नहीं होता।

                                        वसंतेश्वरी भगवद्गीता 
                                   
                                                      
परम ज्ञान फिर से कहूँ जो ज्ञानों में श्रेष्ठ
जिसे जान मुनि मुक्त हों, परम सिद्धि को प्राप्त।।1।।

भगवान श्री कृष्ण चन्द्र अर्जुन से बोले- अब मैं तुझे ज्ञानों में भी सर्वश्रेष्ठ ज्ञान को फिर से बताता हूँ क्योंकि अर्जुन ने प्रभु का विराट स्वरूप देखने पर भी मनुज रूप देखने की इच्छा की, जिससे प्रभु समझ गए अभी इसके मोह और कर्म बन्धन पूर्ण रूपेण नष्ट नहीं हुए हैं अतः फिर से आत्म ज्ञान को यहाँ  बताते हैं जिसे जानकर माया के बन्धन से मुनि मुक्त हो जाते हैं और परम सिद्धि आत्मतत्व को पाते हैं।

जो आश्रित इस ज्ञान के मम स्वरूप को प्राप्त
सृष्टि आदि में जन्म नहिं और प्रलय में नाश।।2।।

इस ज्ञान को अपने अन्तःकरण में स्थित करके आत्म स्वरूप हुए मनुष्य सृष्टि के प्रारम्भ में जन्म नहीं लेते और प्रलयावस्था में व्याकुल नहीं होते हैं क्योंकि आत्मज्ञान हो जाने के कारण उनके कर्म बन्धन क्षय हो जाते हैं। यदि वह जन्म भी लेते हैं तो निज इच्छा से प्रकट होते हैं। जन्म मृत्यु के भय से वह सदा सदा के लिए मुक्त हो जाते हैं।

महत् ब्रह्म है योनि जग, मैं स्थापित बीज
जड़ चेतन संयोग से, सम्भव सब हैं भूत।।3।।

जिस प्रकार संसार में प्राणियों का जन्म स्त्री-पुरुष के संयोग से होता है उसी प्रकार यह मूल प्रकृति (महत् ब्रह्म) गर्भाधान का स्थान है और मैं परब्रह्म परमात्मा इस प्रकृति में गर्भ को स्थापित करता हूँ, तब जड़ और चेतन के संयोग से सब भूतों की उत्पत्ति होती है।

नाना योनि देह हैं, जन्म पार्थ संसार
महत् ब्रह्म जननी सकल, पिता बीज प्रद जान।।4।।

इस जगत में भिन्न भिन्न योंनियों में भिन्न भिन्न शरीर धारी उत्पन्न होते हैं। व्यक्त प्रकृति उन सब की गर्भधारण करने वाली माता है और मैं आत्मा उन सब में बीज स्थापित करने वाला पिता हूँ। आत्मा ही पति है, प्रकृति पत्नी और जगत संतान है।

प्रकृति जन्म हैं तीन गुण, सत्त्व रज तम हे पार्थ
अविनाशी इस देहि को, देते बांध शरीर।।5।।

प्रकृति अर्थात ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति के भिन्न भिन्न मात्रा में कार्य करने से गुण उत्पन्न होते हैं। इन्हें तीन भागों में विभाजित किया है। यह हैं सत्त्व, रज, तम। सत्त्व में ज्ञान शक्ति अधिक होती है, रज में क्रिया शक्ति अधिक होती है और तम में ज्ञान शक्ति लगभग लुप्त होती है, क्रिया शक्ति अति अल्प होती है। यह तीनों गुण अविनाशी अव्यक्त आत्मतत्व परमात्मा को इस शरीर में मोहित कर बांधते हैं। प्रकृति के गुणों के कारण ही आत्मा में जीव भाव उत्पन्न होता है।

सत्त्वगुण अमल प्रकाश मय और रहित विकार
सुख संग बांधे ज्ञान संग जान तत्व निष्पाप।।6।।

हे अर्जुन! सुन, प्रकृति (माया) किस प्रकार अविनाशी आत्मा को अपने जाल में फंसाती है। सतोगुण सुख और ज्ञान के माध्यम से अविनाशी आत्मा को फंसाता है वह ज्ञान देता है और ज्ञान का अहंकार भी उत्पन्न करता है और ज्ञानी होने का अहंकार उसे मिथ्या सुख से भ्रमित कर देता है। वह सच्चे ज्ञान व सच्चे आनन्द को भूल जाता है।

तृष्णा से उत्पन्न हो राग रूप रज पार्थ
वह बांधे इस जीव को कर्म संग संसार ।।7।।

रजोगुण सदा आत्मा को बहलाता है क्योंकि राग रूप रजोगुण का जन्म कामना और आसक्ति से होता है और संसार के विभिन्न रूपों की कामना उनमें आसक्ति प्राप्त होने पर बढ़ती ही जाती है। पहले थोड़ा मिला उसका सुख उठाया, फिर ज्यादा की इच्छा हुयी, आसक्ति बढ़ी, उसके लिए कार्य बढ़े (कर्म की इच्छा बढ़ी) और फल से सम्बन्ध बढ़ा, इस प्रकार देह स्थित आत्मा को जीव भाव की प्राप्ति होती है और वह जीवात्मा शरीर से बंध जाता है।

सब मोहित कर देहि को तम जन्मे अज्ञान
वह बांधे इस देहि को, निद्रालस्य प्रमाद।।8।।

हे अर्जुन! तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न होता है, यह आत्मा को पूर्ण रूपेण भ्रम में डाल देता है, वह अपना स्वरूप पूर्णतया भूल कर जीव भाव को प्राप्त इस शरीर को ही अपना स्थान, अपना स्वरूप मान बैठती है। प्रमाद, आलस्य और नींद इस तमोगुण के हथियार हैं, इनके द्वारा मन मूढ़ बन जाता है, बुद्धि भ्रमित हो जाती है, कर्म की इच्छा नहीं होती। उसकी बुद्धि कुम्भकर्ण जैसी हो जाती है जिसने तपस्या का फल छह माह की नींद मांगी। नींद को ही वह जीवन की सर्वोत्तम निधि मानता है। इसी में आनन्द अनुभव करता है।

सत्त्व लगाता सुख में, रज लगाये कर्म
तम रत करे प्रमाद में, घेर ज्ञान को पार्थ।।9।।

हे अर्जुन! सतोगुण जीव में सुख का भाव उत्पन्न करता है। रजोगुण भी कामना और आसक्ति के माध्यम से सुख प्रदान करते हुए उसे अधिक-अधिक कर्म में लगाता है और तमोगुण उसके ज्ञान को ढक कर प्रमाद में लगाता है, उसे अज्ञान में सुख मिलता है। यह सभी मिथ्या सुख क्रमशः अहंकार, आसक्ति और अज्ञान वश उत्पन्न होते हैं।

रज तम दाबे सत्त्व बढ़े, सत्त्व तम दब रज जान
वैसे ही सत्त्व रज दबा, तम बढ़ता हे पार्थ।।10।।

हे अर्जुन! यदि रज और तम को दबा दिया जाय तो सतोगुण बढ़ता है। सतोगुण और तमोगुण को दबा कर रजोगुण बढ़ता है तथा सत्त्व और रज को दबाकर तमोगुण बढ़ता है।

सभी द्वार अरु देह में बाढ़े ज्ञान प्रकाश
गुडाकेश तेहि काल में, सत्व बढ़ा है जान।।11।।

हे अर्जुन! सभी जीवों में तीनों गुण भिन्न भिन्न मात्रा में होते हैं। कर्म प्रारब्ध और परिस्थिति वश गुणों की मात्रा में अन्तर भी आता है। जब देह में समस्त इन्द्रियों और मन में ज्ञान और विवेकशक्ति उत्पन्न होती है तो सतोगुण बढ़ा होता है।

हे अर्जुन रज से बढ़े, प्रवृत्ति कर्म आरम्भ
विषय भोग की लालसा लोभ अशान्ति का जन्म।।12।।
हे अर्जुन जब तम बढ़े, अप्रकाश अप्रवृत्ति का जन्म
प्रमाद, मोह उत्पन्न हों, हे कुरुनन्दन श्रेष्ठ।।13।।

जब रजोगुण बढ़ा होता है तो उस समय लोभ और सकाम कर्म करने की इच्छा उत्पन्न होती है और जीव कर्म में लग जाता है। फिर इच्छा पूरी हुयी तो उसकी पूर्ति के लिए अधिक से अधिक कर्म और विषय भोग की लालसा भी उत्पन्न होती है और इच्छा पूरी नहीं हुयी या भोग प्राप्त नही हुए तो अशान्ति उत्पन्न होती है। तमोगुण के बढ़ने पर मन, बुद्धि में अज्ञान छा जाता है, कर्म करने की भी इच्छा नहीं होती। प्रमाद, आलस्य, निद्रा यह सब उत्पन्न होते हैं।

सत्त्व बढ़ा हो पार्थ जब, यह नर मृत्यु को प्राप्त
अमल लोक को प्राप्त हो, श्रेष्ठ कर्म रत प्राप्त।।14।।
बढ़े रजोगुण मृत्यु हो, कर्म संगिन में जन्म
मूढ़ योनि उत्पन्न हो, मरे तमोगुण काल।।15।।

हे अर्जुन! जब मनुष्य सत्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है जब देह त्यागता हैं तो ज्ञान में देह बुद्धि होने के कारण, श्रेष्ठ आचरण करने वाले विद्यावान और योगियों के घर में जन्म लेता है। योग भ्रष्ट पुरुष का जन्म इसी कारण होता है। रजोगुण की वृद्धि होने पर मति किसी खास कर्म अथवा उसके फल भोग आदि में होती है अतः मृत्यु के बाद वह आसक्ति वाले रजोगुणी परिवार में जन्म लेता है और तमोगुण के बढ़ने पर जब मृत्यु होती है तो घोर तमस (अज्ञान) के कारण मति मूढ़ हो जाती है अतः अगला जन्म मूढ़ योनियों में होता है।

श्रेष्ठ कर्म का फल सदा, सात्विक, निर्मल जान
राजस का फल दुःख है और तमस अज्ञान।।16।।

सतोगुण से सुकृत’ (श्रेष्ठ आचरण) का जन्म होता है परिणामतः ज्ञान और निर्मल फल की प्राप्ति होती है। रजोगुण से उत्पन्न कर्म का अन्तिम परिणाम अशान्ति और दुःख है और तमोगुण मूढ़ता को जन्म देता है।

सत्व देता ज्ञान को, रज गुण देता लोभ
तमगुण होत प्रमाद मोह अरु देता अज्ञान।।17।।

सत्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है विशुद्ध आत्मतत्व सतोगुण के पाश में बंधा जीवात्मा अहंकार युक्त रहता है रजोगुण लोभ को जन्म देता है और तमोगुण से प्रमाद, मोह और मूढ़ता उत्पन्न होते हैं ।

सत्व स्थित ऊर्ध्व गति राजस स्थित मध्य
जघन्य गुण रत तामसी अधम गती को प्राप्त।।18।।

सत्वगुण में स्थित पुरुष ऊर्ध्व गति को प्राप्त होते हैं। वह योगभ्रष्ट और विद्या विनय सम्पन्न घरों में जन्म लेता है। रजोगुण में स्थित पुरुष मध्य गति को प्राप्त होते हैं अर्थात सकामी, लोभी, सांसारिक लोगों के घर में जन्म लेते हैं और तमोगुणी पुरुष नीच गति को प्राप्त होते हैं और  मूढ़ योनियों में जन्म लेते हैं।

कर्ता गुण, नहिं अन्य कोउ, दृष्टा दरसे काल
तीन गुणों से अति परे परम तत्व को ज्ञात ।।19।।

जिस समय मनुष्य दृष्टा भाव से स्थित रहता है और सत्त्व, रज, तम इन तीन गुणों को कर्ता देखता है, उस समय साक्षी भाव से कर्मों के कर्तापन से निर्लिप्त अर्थात अहंकार से मुक्त होकर परम स्थिति को तत्व से जानता है।

देही तरता तीन गुण, जो कारण हैं देह
जन्म मृत्यु जर दुःख मुक्त हो, पाता परमानन्द।।20।।

उस समय इस शरीर की उत्पत्ति के कारण इन तीनों गुणों का; साक्षी भाव से स्थित पुरुष, तत्व को जानते हुए उसका उल्लंघन कर जाता है तब जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था सब उसके लिए खेल हो जाते हैं। देह उसके लिए सांप की केंचुली के समान हो जाता है। अतः देह भाव से निर्लिप्त वह मेरे स्वरूप (आत्म तत्त्व) को प्राप्त होता है।

तीन गुणों से अति परे, किन लक्षण से युक्त
केहि विधि त्रिगुणातीत हो, कैसा हो आचार।।21।।

अर्जुन बोले, हे भगवन! ऐसा साक्षी भाव से तत्व में स्थित मुक्त पुरुष किन किन लक्षणों से युक्त होता है और उसका आचार विचार किस प्रकार का होता है और किन उपायों से वह तीन गुणों से मुक्त हो जाता है?

प्रकाश प्रवृत्ति अरु मोह पा, करे नहीं जो द्वेष
उभय जबहिं निवृत्त हो, नहिं इच्छा हो शेष।।22।।

हे अर्जुन! आत्म स्वरूप में स्थित, सदा साक्षी भाव से देखता हुआ सतोगुण रूपी ज्ञान और उसके अहंकार, रजोगुण की कार्य प्रवृत्ति और तमोगुण के भ्रम व मूढ़ता भाव यदि आते हैं तो उनमें यदि प्रवृत्त होता है तो बिना किसी आसक्ति और द्वेष के और यदि उन त्रिगुण भावों से अलग होता है तो उनकी कोई कामना नहीं करता क्योंकि उसे कर्म का अथवा अपने गुणों का कोई अभिमान नहीं होता, वह समुद्र के जल की तरह स्थित रहता है।

साक्षी स्थित वह पुरुष, नहि विचलित गुण माहि
गुण गुण में हीं बरतते, थिर मति स्थित एक।।23।।

वह उदासीनवत् अर्थात सुख-दुःख, हानि-लाभ में समान रहता हुआ किसी भी गुण से विचलित नहीं किया जाता है क्योंकि वह जानता है कि प्रकृति के गुण ही, गुण और कर्म का कारण हैं, वह यह जानकर गुणों के खेल को देखता रहता है। जिस प्रकार आकाश, वायु से प्रभावित नहीं होता उसी प्रकार वह आत्मरत पुरुष गुणों से प्रभावित नहीं होता और सदा आत्म स्थित रहता है और इस परम स्थिति से कभी भी विचलित नहीं होता है ।

सुख दुःख सम प्रिय अप्रिय सम, निन्दा स्तुति एक
आत्मरती ज्ञानी वही, सम है कंचन धूल।।24।।

हे अर्जुन! मुझमें स्थित पुरुष सम्पूर्ण जगत को ब्रह्ममय देखता है इसलिए वह सुख और दुःख को समान समझता है। उसके लिए मिट्टी पत्थर सब एक समान हो जाते है, प्रिय अप्रिय कोई नहीं रहता। वह सदा समभाव में स्थित रहता है। कोई उसकी निन्दा करे अथवा स्तुति उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। उसकी बुद्धि सदा आत्म स्थित रहती है।

जो सब मानपमान में, शत्रु मित्र सम जान
कर्तापन से रहित जो गुणातीत वह जान।।25।।

कोई उस व्यक्ति का अपमान करे, अपशब्द कहे या उसकी महात्मा, ज्ञानी, ईश्वर समझकर पूजा करे, वह दोनों स्थितियों में सम रहता है। मित्र और वैरी उसके लिए समान हैं, दोनों में वह आत्म स्वरूप को देखता है और शरीर में स्थित गुणों के कार्यों को देखकर मुस्कुराता है। उसकी अहं बुद्धि समाप्त हो जाती है अतः वह सदा कर्तापन के भाव से रहित होता है। सदा साक्षी भाव से स्थित रहता हुआ वह तीनों गुणों का उल्लंघन कर जाता है।

जो भजे मुझको सदा एक भक्ति से पार्थ
तीन गुणों को पार कर ब्रह्म भूत हो जाय।।26।।

जो न भटकने वाली बुद्धि से मुझमें एकत्व रखता है, सदा मुझ आत्मतत्व में रत रहता है, स्वरूप, अनुभूति में निमग्न रहता है, वह तीन गुणों के प्रभाव से मुक्त हो जाता है। वह भुना हुआ बीज हो जाता है जिससे अंकुर नहीं फूटता है। इसी प्रकार उसके अन्दर अहं और आसक्ति का भाव कभी नहीं आता है। इस प्रकार परमात्मा से एकत्व रखने वाला पुरुष उसी परमतत्व, परमगति को प्राप्त होता है।

मैं अविनाशी ब्रह्म का और अमृत का पार्थ
नित्य धर्म आनन्द का, अखण्ड एक का वास।।27।।

हे अर्जुन! जिसे ब्रह्म कहा गया है वह ब्रह्म ही यह आत्मा (मैं हूँ) है। मैं आत्मा अमृत हूँ अर्थात परम विशुद्ध ज्ञान हूँ जिसका कभी नाश नहीं होता। मैं ही स्वभाव (धर्म) का आश्रय हूँ। मुझे प्राप्त कर योगी परम आनन्द परम शान्ति को प्राप्त होता है। तू यह निश्चय पूर्वक जान ले कि उस परम शान्ति और आश्रय का घर मैं आत्मा हूँ। यही अन्तिम स्थिति है।
                  
                                  ..................................

3 comments:

  1. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  2. VERY VERY NICE SIR JI AAP NE BAHUT HI ACCHA PRYAAS KIYA HE....AAJ KE YUG ME LOGO KO KARM KARNE KE GYAAN KI JARURAT HE.....APNE BHARAT KI PAWAN BHUMI PAR AK BAAR FIR SE GEETA KE GYAAN KO DOHRAYA JAYEGA....AANE WALE SAMAY ME 31 DEC SHANIWAR KO RATRI 12 BAJE BHARAT KI PAWAN BHUMI PAR RAJASTHAN PRANT KE AADHYATMIK WAGAD ANCHAL KI DHARMIK NAGRI BANSWARA ME KALKI VAVTAR KA BHAVYA GYAAN SWROOP AVTAARAN HOGA OR ISI KE SATH BHARAT KI PAWAN BHUMI PAR ANTARRASTRIY KALKI SATYUGI VISHV AHINSA PARMODHARM KI STHAPNA HO JAYEGI JIS SE AANE WALE SAMAY ME DHARTI PAR DHARM KE NAAM PAR SARE KARMKAND OR RUDIWADIYA MIT JAYEGI OR LOGO KO DHARM KELIYE SATKARM OR SEVA KA MARG BATAYA JAYEGA.....DHARTI PAR SATYUGI DHARM KI STHAPNA SE PURI DHARTI PAR DHAR SAMPRADAY OR JATI VIWAD JAD SE MIT JAYEGA OR SATYUGI DHARM SE LOGO KE SAT KARM SE DHARTI SWARG BAN JAYEGI KISI KO MAR KAR SWARG NAHI JANA PADEGA......JAI AHINSA ...................... VISHVA DHARM RAKSAK MOHAN MEDAWAT 09602604410

    ReplyDelete